धर्म-परिवर्तन रोकने हेतु प्रभावी उपाय !


जिहादी ‘लव जिहाद’के माध्यमसे राष्ट्रको खोखला बना रहे हैं, तो एक ओर ईसाई धर्म-परिवर्तनके द्वारा हिंदु धर्मको खोखला बना रहे हैं तथा धर्मशिक्षा न मिलनेके कारण धर्माभिमानशून्य हिंदु समाज बडी मात्रामें इसका बली बन रहा है । धर्म-परिवर्तनको रोकने हेतु प्रभावी उपाय करने आवश्यक हैं, यह इस लेखद्वारा हम अवगत होंगे ।

 

१. हिंदुओंको धर्मशिक्षा देना

वनवासी क्षेत्रोंके ही नहीं; अपितु सर्व स्तरोंके हिंदुओंका धर्म-परिवर्तन होनेका मुख्य कारण है, धर्मके विषयमें अनभिज्ञता । यह अनभिज्ञता दूर करनेके लिए सर्वत्रके हिंदुओंको धर्मशिक्षा देनेकी व्यवस्था प्रत्येक नगर, देवालय और विद्यालयमें की जानी चाहिए । धर्मशिक्षा मिलने से हिंदु स्वधर्मके अनुसार आचरण करेंगे और उन्हें स्वधर्मकी श्रेष्ठताकी अनुभूति होगी । अनुभूति होनेपर धर्माभिमानी हिंदु, धर्म-परिवर्तनकी बलिवेदीपर नहीं चढेंगे ।

 

२. बच्चोंपर बचपनसे ही धार्मिक संस्कार करना

हिंदुओंको अपने बच्चोंपर बचपनसे ही प्रतिदिन नियमितरूपसे रामरक्षास्तोत्र, हनुमानचालीसा तथा ‘कराग्रे वसते लक्ष्मी..’, ‘शुभं करोती…’ इत्यादि आचारपालनसे संबंधित श्लोक सिखाने चाहिए । उन्हें रामायण एवं महाभारत धर्मग्रंथोंकी कथा सुनाकर धर्मप्रेमी बनाना चाहिए । बच्चोंको स्वाभिमानी बनानेवाले संस्कार बाल्यावस्थामें न अंकित किए जाएं, तो बडे होनेपर हिंदु ये नहीं सीखते । किंतु ऐसे हिंदु, धर्म-परिवर्तनके पश्चात् ‘नमाज’ अथवा ‘प्रेअर’ कट्टरतासे करने लगते हैं ।

 

३. हिंदुओंमें व्यापक स्तरपर जाग्रति करना

अहिंदुओंके सांस्कृतिक और धार्मिक आक्रमणोंका विकृत इतिहास, धर्मांतरितोंकी कालांतरमें होनेवाली दुर्दशा और धर्म-परिवर्तनसे होनेवाली समाज, राष्ट्र और धर्म की हानि इत्यादि सूत्रोंके विषयमें हिंदु समाजमें व्यापक जागृति करना भी धर्म-परिवर्तन रोकनेका एक महत्त्वपूर्ण मार्ग है । हिंदुजागृतिका यह कार्य आगे दिए अनुसार किया जा सकता है –

अ. समाचार-पत्रोंमें धर्म-परिवर्तनसे होनेवाली हानिके विषयमें पत्र लिखना, लेख लिखना आदि माध्यमोंसे जाग्रति करना

आ. विद्यालयों, महाविद्यालयों, कार्यालयों, महिला-मंडलों, जाति संस्थाओं, व्यावसायिक केंद्रों; धार्मिक यात्राओं (मेलों) इत्यादिमें कार्यक्रम, जागृतिप्रद-पत्रक, पुस्तिका; भित्ति-पत्रक आदिके माध्यमसे संकटके विषयमें जनजागरण करना

इ. हिंदुओंके धर्मांतरणके उद्देश्यसे आयोजित ‘प्रार्थना-सभा’, ‘आशीर्वाद-सभा’ इत्यादि कार्यक्रमोंमें सम्मिलित न होनेके विषयमें जाग्रति करना

ई. धर्म-परिवर्तनके इच्छुक हिंदुओंसे प्रत्यक्ष मिलकर धर्म-परिवर्तन न करनेके विषयमें उन्हें समझाना

 

४. धर्म-परिवर्तनके उद्देश्यसे आयोजित
कार्यक्रमोंका वैधानिक मार्गसे विरोध करना !

धर्म-परिवर्तनका कृत्य समाजविरोधी, राष्ट्रविरोधी एवं धर्मविरोधी है । इसका सर्वत्रके हिंदुओंको संगठित होकर वैध मार्गसे विरोध करना चाहिए । यह विरोध आगे दिए अनुसार किया जा सकता है –

अ. हिंदुओंका धर्म-परिवर्तन करनेके उद्देश्यसे अहिंदुओंद्वारा ‘प्रार्थना-सभा’, ‘आशीर्वाद-सभा’, ‘इस्लाम परिचय’ इत्यादि कार्यक्रमोंका आयोजन अनेक स्थानोंपर किया जाता है । ऐसे कार्यक्रमोंके माध्यमसे धर्म-परिवर्तनके लिए दबाव डाले जानेपर उस विषयमें निकटके पुलिस थानेमें परिवाद लिखवाना, वैध मार्गसे आंदोलन करना आदि माध्यमोंसे विरोध करें !

आ. अपने क्षेत्रमें अहिंदु धर्मप्रचारकोंके आनेकी सूचना मिलते ही, उनकी धर्म-परिवर्तन संबंधी गतिविधियोंपर संगठितरूपसे दृष्टि रखें । उन्होंने हिंदुओंका धर्म-परिवर्तन करनेका प्रयत्न किया, तो उन्हें संगठितरूपसे फटकारें !

इ. छल-कपटसे, लालच देकर अथवा बलपूर्वक हिंदुओंका धर्म-परिवर्तन करनेका प्रयत्न करनेवालोंके विरुद्ध पुलिस थानेमें परिवाद लिखवाएं !

 

५. अन्य पंथियोंके विद्यालयों-महाविद्यालयोंका बहिष्कार करें !

ईसाई (‘कॉनवेंट’) विद्यालयोंमें ऐसी शिक्षा दी जाती है जिससे छात्रोंका पूर्णतः ईसाईकरण हो । जबकि मदरसों, अंजुमन आदि इस्लामी विद्यालयोंमें छात्रोंको मुसलमान बनानेके लिए शिक्षा दी जाती है । अन्य धर्मीय विद्यालय-महाविद्यालय हिंदु छात्रोंको स्वधर्मसे दूर करते हैं और परधर्मके अनुसार आचरण करना सिखाते हैं । इसीलिए ऐसे विद्यालय-महाविद्यालयोंसे हिंदुओंकी भावी पीढीके लिए धर्मांतरणका बडा संकट खडा हो गया है । अतः प्रत्येक हिंदुको अन्य धर्मीय विद्यालय-महाविद्यालयों का बहिष्कार कर, अपने बच्चोंको हिंदु विद्यालय-महाविद्यालयोंमें भेजना चाहिए !

 

६. शुद्धीकरण अभियान चलाना

इसके बारेंमें अधिक जानकारी हेतु यहां ‘क्लिक’ करें !

 

७. अहिंदुओंमें हिंदुओंका
धर्म-परिवर्तन न करनेके लिए भय उत्पन्न करना

‘हिंदुओंके तीव्र गतिसे होनेवाले धर्म-परिवर्तनको रोकनेके लिए धर्मांतरित हिंदुओंका शुद्धीकरण करना, यह एक उपाय तो है ही; किंतु हिंदुओंका धर्म-परिवर्तन करनेवालोंपर प्रतिबंध लगे, इसके लिए संगठित होना, यह भी इस समस्यापर अधिक प्रभावी उपाय है ।’ – (प.पू.) डॉ. जयंत बाळाजी आठवले (हिंदु जनगाजृति समितीके प्रेरणास्रोत)

 

८. केंद्रीय शासनके स्तरपर किए जानेवाले उपाय !

८ अ. नियोगी आयोगकी अनुशंसाके
आधारपर (परामर्शपर) केंद्रीय स्तरपर अविलंब कार्यवाही होना आवश्यक !

‘वर्ष १९५६ में मध्यप्रदेश सरकारने ईसाई मिशनरियोंकी गतिविधियोंकी जांचके लिए न्यायमूर्ति भवानीशंकर नियोगीकी अध्यक्षतामें समिति गठित की थी । इस समितिने अपने एक सहस्र पृष्ठोंके प्रतिवेदनमें निम्नांकित अनुशंसाएं की हैं ।

१. मिशनरियोंका उद्देश्य है धर्मांतरण करना, इसलिए उन्हें किसी प्रकारकी छूट न दें ।

२. हिंदुस्थानकी ईसाई संस्थाएं अपना विदेशी संबंध तोड दें ।

३. धर्मांतरणमें सहायक हो, ऐसा कोई भी सेवाकार्य पादरियोंको न करने दें ।

४. ईसाइयोंद्वारा अनाथालयोंके संचालनपर रोक लगाएं ।

५. ईसाई अपनी सर्वोच्च संस्था निश्चित करें । यह संस्था ‘धर्मप्रचारके रूपमें कौन-सा कार्य करेगी’, यह शासनको पूर्वसूचित करे । यह धर्मप्रचार भारतीय विचारधाराके प्रतिकूल नहीं होना चाहिए ।

६. धर्मप्रचारका अधिकार केवल भारतीय वंशके नागरिकोंको प्राप्त हो ।

७. सर्व आधुनिक वैद्यों और परिचारिकाओंको (‘नर्स’को) धर्मप्रचार करनेसे प्रतिबंधित किया जाए ।

८. धर्मप्रचारका साहित्य सरकारकी अनुमतिके बिना वितरित नहीं किया जाना चाहिए ।

९. वनवासी क्षेत्रमें ईसाइयोंको कोई भी सेवाकार्य करनेसे प्रतिबंधित किया जाए ।

१०. ईसाई मिशनरी उन्हें दी गई स्वतंत्रताका अनुचित लाभ न उठाएं, इस हेतु उनपर दृष्टि रखनेके लिए एक स्वतंत्र शासकीय विभाग बनाएं ।

वर्ष १९५६ की तुलनामें धर्मांतरणकी आजकी परिस्थिति भीषण है । इस कारण नियोगी आयोगद्वारा की गई अनुशंसा आज भी पूर्णतः लागू है । इन अनुशंसाओंपर केंद्रशासनके स्तरपर तत्काल कार्यवाही होना आवश्यक है ।’

– श्री. अरविंद विठ्ठल कुळकर्णी, ज्येष्ठ पत्रकार, मुंबई.

८ आ. केंद्रशासनके स्तरपर
धर्मांतरण प्रतिबंधक कठोर दंडविधान (कानून) बनाना आवश्यक

हिंदुस्थानके अतिरिक्त अन्य देशोंमें वहांके मुख्य उपासना पंथ और दंडविधान परस्परपूरक हैं । वहां अल्पसंख्यक बहुसंख्यकोंका धर्म-परिवर्तन कर ही नहीं सकते । हिंदुस्थानमें स्थिति इसके विपरीत है । हिंदुस्थान के मध्यप्रदेश, उडीसा, अरुणाचल प्रदेश, तमिलनाडु और गुजरात राज्योंको छोडकर अन्य राज्योंमें धर्म-परिवर्तनका विरोध करनेवाला दंडविधान ही नहीं है । हिंदुस्थानमें सर्वत्र हिंदुओंके धर्म-परिवर्तनकी बढती गतिको देखते हुए केंद्रशासनके स्तरपर धर्म-परिवर्तन प्रतिबंधक सक्षम दंडविधान तत्काल बनानेकी आवश्यकता है ।

‘गुजरातमें बनाए धर्म-परिवर्तन प्रतिबंधक दंडविधानके अनुसार, धर्मांतरित होनेवाले व्यक्तिको ‘धर्म छोडनेका कारण और वर्तमान धर्ममें कितने वर्षोंसे है’, इस प्रकारकी जानकारी शासनको देनी पडती है । अन्यथा, उसे अपराधी मानकर उसपर अभियोग चलाया जाता है । केंद्रशासनके स्तरपर धर्म-परिवर्तनके लिए प्रतिबंधक दंडविधान बनाते समय उपरोक्त प्रावधानका भी उसमें समावेश करना आवश्यक है ।’

८ इ. केंद्रशासनको, धर्म-परिवर्तनके विरुद्ध
कठोर भूमिका अपनानेवाले निम्न राष्ट्रोंसे सीखना चाहिए !

८ इ १. श्रीलंका : ‘इस देशने पोप जॉन पॉलको बिशपोंकी सभाका आयोजन करनेकी अनुमति नहीं दी थी । ‘धर्म-परिवर्तनके कारण समाज विभाजित होता है । देशमें गृहयुद्ध होनेके कारण धर्म-परिवर्तन द्वारा यहांपर एक और शत्रु नहीं बढाना है’, यह श्रीलंकाकी भूमिका है ।’ – ग.ना. कापडी, पर्वरी, गोवा. (दैनिक ‘गोमन्तक’, ११.११.१९९९)

८ इ २. चीन : इस साम्यवादी राष्ट्रमें धर्म-परिवर्तन रोकनेके लिए कठोर दंडविधान हैं । यद्यपि चीन धर्म नहीं मानता, तथापि चीनकी सरकारका कहना है, ‘धर्म-परिवर्तनके कारण समाज परस्परविरोधी गुटोंमें विभाजित हो जाता है और इसका राष्ट्रके जीवनपर विपरीत परिणाम होता है ।’ वहां सरकारकी मान्यताका पंजीकरण कराए बिना चर्चका निर्माण नहीं किया जा सकता । चर्चके लिए विदेशोंसे आर्थिक सहायता लेना प्रतिबंधित है । चीनने वैटिकनके साथ कोई भी संबंध नहीं रखे । वैटिकनके किसी भी प्रतिनिधिको चीनी प्रदेशमें प्रवेशकी अनुमति नहीं है । विदेशी लोगोंका चीनमें धर्मप्रचार करना प्रतिबंधित है ।

८ इ ३. जापान : ‘यहां धर्म-परिवर्तनके विषयमें कठोर नियम हैं । जापानी नागरिक यदि किसी भी कारणसे धर्म-परिवर्तन करे, तो उसे और उसका धर्म-परिवर्तन करवानेवालेको कठोर दंड दिया जाता है । यदि विदेशी नागरिकने ऐसा किया, तो शासन कुछ घंटोंमें ही उसे जापान छोडनेका आदेश देता है ।’ – मासिक ‘सावरकर टाइम्स’ (जुलाई २०१०)

८ इ ४. इजराइल : इस एकमात्र यहूदी देशमें ईसाई पंथीय धर्म-परिवर्तनका प्रयत्न करते हैं, इस कारण यहांकी संसदने धर्म-परिवर्तनको प्रतिबंधित करनेवाला कठोर दंडविधान बनानेका निर्णय लिया है । यह दंडविधान न बने, इस हेतु भयभीत ईसाई मिशनरियोंने इजराइलमें परिपत्र जारी कर, यहूदियोंका धर्म-परिवर्तन करनेका कार्य बंद करनेका वचन दिया ।

भविष्यमें स्थापित होनेवाले
धर्माधिष्ठित हिंदुराष्ट्रमें हिंदुओंके धर्म-परिवर्तनपर प्रतिबंध रहेगा !

हिंदुस्थानमें आजकी प्रचलित लोकतांत्रिक प्रणालीमें धर्म-परिवर्तनके विरुद्ध कठोर दंडविधान बनानेकी मांग करनी पड रही है; किंतु भविष्यमें राष्ट्रप्रेमियों और धर्मप्रेमियोंके नेतृत्वमें स्थापित होनेवाले हिंदुराष्ट्रमें हिंदुओंका धर्म-परिवर्तन प्रतिबंधित करनेवाला दंडविधान (कानून) होगा । हिंदुओंकी घटती जनसंख्या, ‘धर्म-परिवर्तन अर्थात् राष्ट्रांतर’, धर्मांतरित हिंदुओंका आध्यात्मिक उन्नतिसे वंचित रह जाना इत्यादि सूत्रोंको ध्यानमें रखते हुए नए दंडविधानके अनुसार हिंदुओंके धर्म-परिवर्तनपर पूर्णतः प्रतिबंध होगा । धर्मांतरितोंको हिंदु धर्ममें पुनर्प्रवेश करने तथा अहिंदुओंको शीघ्र आध्यात्मिक उन्नति हेतु हिंदु धर्म अपनानेकी छूट दंडविधान देगा । संक्षेपमें, हिंदुराष्ट्रमें हिंदुहितके लिए धर्म-परिवर्तनपर पूर्णतः प्रतिबंध रहेगा !

संदर्भ : हिंदु जनजागृति समितीद्वारा समर्थित ग्रंथ ‘धर्म-परिवर्तन एवं धर्मांतरितोंका शुद्धिकरण’

राष्ट्र एवं धर्म रक्षा के लिए कार्यरत
हिन्दू जनजागृति समिति को
दिया गया धर्मदान ‘सत्पात्र दान’ होगा !