धर्म-परिवर्तन अनुचित क्यों है ?


हिंदुओंको यह ध्यानमें रखना चाहिए कि ‘जिस प्रकार पानीमें रहनेवाली मछली घीमें गई, फिर भी उसका मरण निश्चित है, उसी प्रकार स्वधर्म छोडकर अन्य धर्ममें जाना भी मृत्युके निकट जानेके समान ही है’ । प्रस्तूत लेखद्वारा ‘धर्म-परिवर्तन अनुचित क्यों है’ इसका ‘भारतीय संविधान’ तथा ‘अध्यात्म’की दृष्टीसे अभ्यास किया गया है ।

 

१. संविधानका २५ वां अनुच्छेद और धर्म-परिवर्तन

१ अ. संविधानका २५ वां अनुच्छेद

इसका नाम है – ‘Freedom of conscience and free profession, practice and propagation of religion’ अर्थात्, ‘सद्सद्विवेकबुदि्धकी स्वतंत्रता और धर्मका मुक्त प्रकटीकरण, आचरण एवं प्रचार ।’

१ आ. किसी भी देशके संविधानमें न समाविष्ट और ईसाइयोंके लिए

अनुकूल ‘प्रपोगेट’का (प्रचार करनेका) अधिकार भारतके संविधानमें होना

‘संविधान लिखते समय धार्मिक स्वतंत्रतासे संबंधित अनुच्छेदमें ‘प्रपोगेट’ (प्रचार) यह शब्द  घुसाया गया । संविधान समितिके सभासद और प्रसिद्ध विधि विशेषज्ञ श्री. कन्हैयालाल मुन्शीने संविधान समितिकी ओरसे बोलते हुए कहा था, ‘धार्मिक स्वतंत्रतामें प्रचारका अधिकार समाविष्ट करनेके लिए ईसाई समाज आग्रही था । ईसाई समाजका कहना था, ‘धर्मप्रचार ईसाइयोंके धर्माचरणका प्रमुख भाग है ।’ प्रख्यात विधिज्ञ अलादीकृष्ण अय्यरने भी इस संदर्भमें स्पष्ट किया था कि धर्मप्रचारके अधिकारके विषयमें अल्पसंख्यक समुदाय अत्यंत आक्रामक था । किसी भी देशके संविधानमें यह नहीं लिखा है, ‘धार्मिक स्वतंत्रताका अधिकार रखनेवालोंको ‘प्रपोगेट’, अर्थात् ‘प्रचार’ करनेका भी अधिकार है’ ।

१ इ. ‘प्रपोगेट’ शब्दका अनुचित अर्थ लगाकर

‘धर्म-परिवर्तन करना, संविधानप्रदत्त अधिकार है’, यह तर्क करनेवाले ईसाई !

डॉ. दुर्गादास बसु लिखित ‘दी कॉन्स्टीट्यूशन ऑफ इंडिया’ नामक पुस्तकमें पृष्ठ ११७ पर ‘ऑपरेशन’ (प्रचार) और ‘कन्वर्जन’ (धर्म-परिवर्तन) के संबंधमें लेखकने अपने विचार प्रस्तुत किए हैं । वे कहते हैं, ‘ईसाई नेतागण यह तर्क करते हैं कि, संविधानके ‘प्रपोगेट’ (प्रचार) शब्दके अनुसार उन्हें किसी भी मार्गसे दूसरोंका धर्म-परिवर्तन करनेका असीमित संवैधानिक अधिकार प्राप्त है; किंतु उनका यह मानना पूर्णतः असत्य है ।’ – प्रा. स.म. गोलवलकर

१ ई. ‘संविधानके अनुच्छेद २५ (१) के अनुसार धार्मिक स्वतंत्रताका

अर्थ दूसरोंका धर्म-परिवर्तन करना नहीं है’, यह सर्वोच्च न्यायालयका निर्णय !

‘वर्ष १९९७ में मध्यप्रदेश शासनने धर्म-परिवर्तनके विरुद्ध कानून बनाया । उसके विरोधमें रेव. स्टेनिस्लॉस सर्वोच्च न्यायालयमें गए । उनकी याचिकापर सुनवाई करते समय न्यायमूर्ति ए.एन्. रायकी अध्यक्षतामें नियुक्त पांच सदस्यीय पीठने सर्वसम्मतिसे निर्णय देते हुए कहा, ‘धारा २५ (१) सर्व नागरिकोंको अपने विवेकसे आचरण करनेकी स्वतंत्रता देती है । धारा २५ (१) में कहीं भी किसीको भी उसके अपने धर्मसे दूसरे धर्ममें ले जानेकी स्वतंत्रता नहीं है । धार्मिक स्वतंत्रता केवल स्वधर्मके संदर्भमें नहीं, अपितु दूसरोंके धर्मके संदर्भमें भी लागू होती है । इसीलिए ‘इस अनुच्छेदके अनुसार दूसरेको अपने धर्ममें लानेका (उसका धर्मांतरण करनेका) मूलभूत अधिकार हमें मिला है’, इस भ्रममें कोई न रहे । इसके अतिरिक्त ‘धर्मप्रसारकी स्वतंत्रताका अर्थ, अन्य व्यकि्तको अपने धर्ममें खींचनेकी स्वतंत्रता है’, यह भी नहीं हो सकता ।’

‘प्रत्येक व्यक्तित अपनी इच्छासे धर्मांतरण कर सकता है । किंतु, उसपर मानसिक दबाव डालकर या उसका विश्वासघात कर धर्मांतरण करना, अवैध होगा । धर्मांतरण हेतु अनियंति्रत छूट देनेपर प्रत्येक धर्म अपने प्रचारका आंदोलन चलाएगा और सर्व प्रकारके अवैध मार्गोंसे धर्मांतरण करवानेके लिए प्रयत्नशील रहेगा । ऐसी अनिष्ट प्रथाओंको प्रतिबंधित कर ऐसे कृत्योंमें सम्मिलित व्यक्तियोंको दंडित करनेका राज्यशासनको पूर्ण अधिकार होगा । ऐसा न्यायालयने इस समय कहा ।’

 

२. आध्याति्मक दृषि्टसे भी धर्म-परिवर्तन करना अनुचित !

२ अ. स्वधर्म पालनका महत्त्व

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुषि्ठतात् ।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ।।

– श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ३, श्लोक ३५

भावार्थ : अन्योंके कर्मोंका (धर्मका) उत्तम रीतिसे पालन करनेकी अपेक्षा अपने नियत कर्मोंका (धर्मका), भले ही वे दोषयुक्त हों, पालन करना अधिक श्रेयस्कर होता है । अपना कर्म करते हुए (स्वधर्मका आचरण करते हुए) यदि किसीका विनाश होता है, तब भी अन्योंका कर्म करनेकी अपेक्षा (परधर्मका आचरण करनेकी अपेक्षा) अपना धर्म ही श्रेयस्कर है; क्योंकि दूसरोंके मार्गका (धर्मका) अनुकरण करना भयावह होता है ।

‘स्वधर्मे निधनं श्रेयः’ यह श्रीमद्भगवद्गीताका तत्त्वज्ञान ज्ञात होनेके कारण हिंदुओंने कभी भी अपना धर्म दूसरोंपर लादनेका प्रयास इतिहासमें कभी नहीं किया ।

२ आ. धर्म-परिवर्तनसे संभावित आध्याति्मक हानि !

धर्म-परिवर्तन करनेसे व्यष्टि (व्यक्तिगत) और समष्टि (सामाजिक) पाप लगता है ।

२ आ १. व्यष्टि पाप

अ. परधर्म अपनानेपर (स्व)धर्मकी, अर्थात् ईश्वरकी सहायता नहीं मिलती ।

आ. धर्मांतरण करनेसे कुलोपासना रुक जाती है । परिणामतः कुलदेवता अप्रसन्न होते हैं तथा उनके माध्यमसे होनेवाला कुलका उद्धार भी अवरुद्ध हो जाता है ।

इ. स्वधर्माचरण न होनेसे उसके माध्यमसे होनेवाली आध्याति्मक प्रगति रुक जाती है ।

ई. स्वधर्म त्यागकर परधर्मकी साधना करनेसे आध्यात्मिक स्तर घटता है और अनेक जन्मोंमें की हुई साधनाकी हानि होती है ।

उ. ‘एक बार हिंदु धर्मका त्याग करनेपर पुनः इस धर्ममें आने हेतु ३०० जन्म लेने पडते हैं ।’ – गुरुदेव डॉ. काटेस्वामीजी

२ आ २. समष्टि पाप

अ. धर्म-परिवर्तन करनेपर अनायास ही अन्योंके सामने परधर्म अपनानेका आदर्श निर्माण होता है । इस प्रकार, अन्योंको स्वधर्मसे दूर करनेपर धर्मद्रोहका पाप लगता है ।

आ. धर्म-परिवर्तनके पश्चात् हिंदु धर्मकी हानि करना पापदायी !

धर्म-परिवर्तन करनेके पश्चात् परधर्मका आचरण अधिक कट्टरतासे किया जाता है । इससे मूल धर्म एवं धर्मियोंकी अपरिमित हानि होती है और उसका पाप भोगना पडता है । काला पहाड नामक हिंदुने इस्लाम धर्म स्वीकारनेके पश्चात् ‘मूर्तियोंका भंजन करो’ और ‘काफिरोंको मार डालो’, इस्लामकी इस शिक्षाका कट्टरतासे आचरण किया । उसने कोणार्कका सूर्यमंदिर उद्ध्वस्त किया (तोडा) एवं असंख्य हिंदुओंको मार डाला । ऐसे विध्वंसक एवं हिंसक कृत्य पापदायी होते हैं ।

संदर्भ : हिंदु जनजागृति समितीद्वारा समर्थित ग्रंथ ‘धर्म-परिवर्तन एवं धर्मांतरितोंका शुदि्धकरण’

हिन्दू राष्ट्र की स्थापना हेतु
सप्तम ‘अखिल भारतीय हिन्दू अधिवेशन’

२ जून से ८ जून के उद्बोधन सत्र अवश्य देखें