व्रत

व्रतों का महत्त्व एवं आधारभूत शास्त्र

मनुष्यको अपने जीवनके उदात्त ध्येयका स्मरण रहे, इसलिए हमारे ऋषिमुनियोंने जीवनका आध्यात्मीकरण करनेके विविध मार्ग बताए हैं, व्रत उन्हींमें एक है । व्रत एक महत्त्वपूर्ण धार्मिक कृत्य है ।

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व्रतों के लाभ एवं प्रकार

व्रतोंकी परिकल्पना ही मनुष्यके ऐहिक अर्थात व्यावहारिक एवं पारमार्थिक कल्याणहेतु की गई है । व्रतोंका पालन करनेसे मनुष्यको विविध प्रकारके लाभ होते हैं ।

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व्रत करते समय व्रताचार के संदर्भ में ध्यान रखने योग्य बातें

कोई भी व्रत अत्यंत सावधानीसे अपनाया जाना चाहिए । व्रतोंका पालन यथार्थ शास्त्रमें बताए अनुसार ही होना चाहिए । व्रतके नियम कठिन होते हैं; परंतु उनका पालन करना अनिवार्य होता है ।

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हरितालिका

पार्वतीने यह व्रत रखकर शिवजी को प्राप्त किया था । इसलिए इच्छानुसार वर मिलने के लिए, उसी प्रकार अखंड सौभाग्य प्राप्त करने के लिए स्त्रियां यह व्रत रखती हैं ।

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ऋषिपंचमी

‘जिन ऋषियोंने अपने तपोबल से विश्‍व के मानव पर अनंत उपकार किए हैं, जीवन को उचित दिशा दी है । उन ऋषियों का इस दिन स्मरण किया जाता है ।

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ज्येष्ठा गौरी

श्री महालक्ष्मी गौरीने भाद्रपद शुक्ल पक्ष अष्टमी के दिन असुरों का संहार कर शरण में आईं स्त्रियों के पतियों को तथा पृथ्वी के प्राणियों को सुखी किया । इसीलिए अखंड सुहाग की प्राप्ति हेतु स्त्रियां ज्येष्ठा गौरी का व्रत करती हैं ।

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अनंत चतुर्दशी

यह व्रत मुख्यतः खोया हुआ वैभव पुनः प्राप्त करने के लिए किया जाता है । इस व्रत के मुख्य देवता अनंत अर्थात श्रीविष्णु हैं, शेष एवं यमुना दोनों गौण देवता हैं । इस व्रत की अवधि चौदह वर्ष की है । इस व्रत का आरंभ किसी के कहने पर अथवा अनंत का डोरा सहजता से मिलने पर करते हैं ।

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सूर्य षष्ठी (छठ) पूजा

छठ पर्वकी परंपरामें बहुत ही गहरा विज्ञान छिपा हुआ है, षष्ठी तिथि (छठ) एक विशेष खगौलीय अवसर है । उस समय सूर्यकी पराबैगनी किरणें (ultra violet rays) पृथ्वीकी सतहपर सामान्यसे अधिक मात्रामें एकत्र हो जाती हैं । उसके संभावित कुप्रभावोंसे मानवकी यथासंभव रक्षा करनेका सामर्थ्य इस परंपरामें है ।

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वटसावित्री व्रत एवं व्रतका उद्देश्य

सावित्रीको अखंड सौभाग्यका प्रतीक माना जाता है । सावित्री समान अपने पतिकी आयुवृद्धिकी इच्छा करनेवाली सुहागिनोंद्वारा यह व्रत किया जाता है । यह एक काम्यव्रत है । किसी कामना अथवा इच्छापूर्तिके लिए किया जानेवाला व्रत काम्यव्रत कहलाता है ।

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