व्रत

हरितालिका

पार्वतीने यह व्रत रखकर शिवजी को प्राप्त किया था । इसलिए इच्छानुसार वर मिलने के लिए, उसी प्रकार अखंड सौभाग्य प्राप्त करने के लिए स्त्रियां यह व्रत रखती हैं ।

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ऋषिपंचमी

‘जिन ऋषियोंने अपने तपोबल से विश्‍व के मानव पर अनंत उपकार किए हैं, जीवन को उचित दिशा दी है । उन ऋषियों का इस दिन स्मरण किया जाता है ।

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ज्येष्ठा गौरी

श्री महालक्ष्मी गौरीने भाद्रपद शुक्ल पक्ष अष्टमी के दिन असुरों का संहार कर शरण में आईं स्त्रियों के पतियों को तथा पृथ्वी के प्राणियों को सुखी किया । इसीलिए अखंड सुहाग की प्राप्ति हेतु स्त्रियां ज्येष्ठा गौरी का व्रत करती हैं ।

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अनंत चतुर्दशी

यह व्रत मुख्यतः खोया हुआ वैभव पुनः प्राप्त करने के लिए किया जाता है । इस व्रत के मुख्य देवता अनंत अर्थात श्रीविष्णु हैं, शेष एवं यमुना दोनों गौण देवता हैं । इस व्रत की अवधि चौदह वर्ष की है । इस व्रत का आरंभ किसी के कहने पर अथवा अनंत का डोरा सहजता से मिलने पर करते हैं ।

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सूर्य षष्ठी (छठ) पूजा

छठ पर्वकी परंपरामें बहुत ही गहरा विज्ञान छिपा हुआ है, षष्ठी तिथि (छठ) एक विशेष खगौलीय अवसर है । उस समय सूर्यकी पराबैगनी किरणें (ultra violet rays) पृथ्वीकी सतहपर सामान्यसे अधिक मात्रामें एकत्र हो जाती हैं । उसके संभावित कुप्रभावोंसे मानवकी यथासंभव रक्षा करनेका सामर्थ्य इस परंपरामें है ।

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वटसावित्री व्रत एवं व्रतका उद्देश्य

सावित्रीको अखंड सौभाग्यका प्रतीक माना जाता है । सावित्री समान अपने पतिकी आयुवृद्धिकी इच्छा करनेवाली सुहागिनोंद्वारा यह व्रत किया जाता है । यह एक काम्यव्रत है । किसी कामना अथवा इच्छापूर्तिके लिए किया जानेवाला व्रत काम्यव्रत कहलाता है ।

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महाशिवरात्रि

पृथ्वी एवं देवता इनके कालमान में एक वर्ष का अंतर होता है । शिवजी रात्री एक प्रहर विश्राम करते हैं । उनके इस विश्राम के काल को ‘महाशिवरात्रि’ कहते हैं । महाशिवरात्रि के दिन शिवतत्त्व नित्य की तुलना में १००० गुना अधिक कार्यरत रहता है । शिव तत्त्व का अधिकाधिक लाभ प्राप्त करने हेतु महाशिवरात्रि के दिन शिव की भावपूर्ण रीति से पूजा-अर्चा करने के साथ ‘ॐ नमः शिवाय ।’ यह नामजप अधिकाधिक करना चाहिए ।

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प्रदोष व्रत

प्रत्येक माहकी शुक्ल एवं कृष्ण त्रयोदशीपर सूर्यास्त उपरांतके तीन घटकोंके कालको प्रदोष कहते हैं । ‘प्रदोषो रजनीमुखम् ।’ इस तिथिपर दिनभर उपवास एवं उपासना कर, रातको शिवपूजा उपरांत भोजन करें ।

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शिवमुष्टि व्रत

विवाहके उपरांत पहले पांच वर्ष सुहागिनें क्रमसे यह व्रत करती हैं । इसमें श्रावणके प्रत्येक सोमवार एकभुक्त रहकर शिवलिंगकी पूजा करनेकी और चावल, तिल, मूंग, अलसी एवं सत्तू (पांचवा सोमवार आए तो) के धान्यकी पांच मुट्ठी देवतापर चढानेकी विधि है । शिवमुष्टि व्रतविधि शिवजीके देवालयमें जाकर की जाती है ।

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