भारत की प्रगत प्राचीन कलाकौशल का उत्कृष्ट नमुना : मोहेंजोदडो शहर !

mohenjodaro

        आधुनिक विज्ञान के इस युग के चमचमाते शहरों को भी आश्‍चर्यचकित करेगी, ऐसी सुपरक्लास सिटी सहस्रो वर्षपूर्व भारत में थी और वह थी मोहेंजोदडो ! इतिहास के पुस्तक से जानकारी मिलती है कि सिंधु संस्कृति के मोहेंजोदडो शहर में हडाप्पा संस्कृति के अवशेष प्राप्त हुए हैं; परंतु इससे भी अधिक विशेषताएं मोहेंजोदडो में प्रत्यक्ष में थी । सहस्रो वर्षपूर्व के इस शहर का निर्माण नियोजनपूर्णता से किया था । मुंबई की ट्रॅफिक जॅम और गढ्ढोंवाली सडकों को भी लज्जा आएगी, ऐसी विशाल सडकें मोहेंजोदडो में थी । पूर्व-पश्‍चिम और दक्षिण-उत्तर दिशा में फैली ९ मीटर चौडी सडकें एवं उन्हें जोडनेवाले ५ मीटर चौडे उपमार्ग, मोहेंजोदडो की विशेषता थी । पीने के पानी के लिए नदियों के अतिरिक्त प्रत्येक घर के सामने एक अतिरिक्त कुआं, धनिकों की कोठियों के साथ श्रमिक वर्ग के लिए भी विशेष बस्ती, ऐसी अनेक विशेषताएं मोहेंजोदडो में थी । ड्रेनेज लाईन, ईटों से व्यवस्थित पद्धति से ढकी नालियां, व्यापारी, उद्योजकों के लिए भिन्न विभाग, ऐसा योजनाबद्ध और सर्व सुविधाआें से युक्त यह शहर वर्ष १९२७ में उत्खनन के उपरांत विश्‍व के सामने आया । नगररचना, वास्तुरचना, आधारभूत सुविधाएं और कृषि उद्योग आदि सभी क्षेत्रों में सुनियोजित इस शहर का आदर्श विश्‍व के किसी भी देश के लिए सामने रखने जैसा ही है; क्योंकि उस समय का वैज्ञानिक कलाकौशल आज के अतिप्रगत देशों को भी आश्‍चर्यचकित करनेवाला है ।

आधुनिक विज्ञान के इस युग के चमचमाते शहरों को भी आश्‍चर्यचकित करेगा, ऐसा शहर सहस्रो वर्षपूर्व भारत में था – मोहेंजोदडो ! मोहनजोदड़ो सिंधी भाषा का शब्‍द है, जिसका अर्थ है ’मुर्दों का टीला। इसे ’मुअन जो दड़ो’ भी कहा जाता है। चार्ल्‍स मैसन ने सर्वप्रथम हड़प्‍पा के विशाल टीलों की ओर ध्‍यान आकृष्ट किया था । दया राम साहनी ने 1921 में हड़प्‍पा की आधिकारिक खोज की थी तथा इसमें एक अन्‍य पुरातत्‍वविद माधो सरूप वत्‍स ने उनका सहयोग किया था। १९४७ में भारत के विभाजन के बाद पाकिस्‍तान में स्थित मोहनजोदड़ो सिंधु घाटी सभ्‍यता का एक नगर है जो विशालकाय टीलों से पटा हुआ है। यह नगर सिंधु घाटी के प्रमुख नगर हड़प्‍पा के अंतर्गत आता है।

सिंधु नदी के किनारे के दो स्‍थानों हड़प्‍पा और मोहनजोदड़ो (पाकिस्‍तान) में की गई खुदाई में सबसे प्राचीन और पूरी तरह विकसित नगर और सभ्‍यता के अवशेष मिले। सहस्रो वर्षपूर्व के मोहेंजोदडो शहर का निर्माण नियोजनपूर्णता से किया था ।

  • मुंबई जैसे शहरों को भी लज्‍जा आएगी, ऐसी विशाल सडकें मोहेंजोदडो में थी । पूर्व-पश्‍चिम और दक्षिण-उत्तर दिशा में फैली ९ मीटर चौडी सडकें एवं उन्‍हें जोडनेवाले ५ मीटर चौडे उपमार्ग, मोहेंजोदडो की विशेषता थी ।
  • पीने के पानी के लिए नदियों के अतिरिक्‍त प्रत्‍येक घर के सामने एक अतिरिक्‍त कुआं था ।
  • धनिकों की कोठियों के साथ श्रमिक वर्ग के लिए भी विशेष बस्‍ती, ऐसी अनेक विशेषताएं मोहेंजोदडो में थी ।
  • ड्रेनेज लाईन, ईटों से व्‍यवस्‍थित पद्धति से ढकी नालियां, व्‍यापारी, उद्योजकों के लिए भिन्‍न विभाग था ।

ऐसा योजनाबद्ध और सर्व सुविधाओं से युक्‍त यह शहर वर्ष १९२७ में उत्‍खनन के उपरांत विश्‍व के सामने आया । नगररचना, वास्‍तुरचना, आधारभूत सुविधाएं और कृषि उद्योग आदि सभी क्षेत्रों में सुनियोजित इस शहर का आदर्श विश्‍व के किसी भी देश के लिए सामने रखने जैसा ही है; क्‍योंकि उस समय का वैज्ञानिक कलाकौशल आज के अतिप्रगत देशों को भी आश्‍चर्यचकित करनेवाला है । मोहनजोदड़ो हड़प्‍पा सभ्‍यता का सबसे प्रसिद्ध पुरास्‍थल है। ऐसा माना जाता है कि ये 200 हेक्‍टयर क्षेत्र में फैला था । मोहनजोदेड़ो के विशाल स्नानागार को सबसे महत्‍वपूर्ण सार्वजनिक स्‍थल कहते हैं और विशाल स्नानागार के निकट विशाल कक्ष 20 स्‍तम्‍भों पर आश्रित है। यहां आठ फीट गहरा, 23 फीट चौड़ा और 30 फीट लंबा कुंड भी है। इसमें वॉटरप्रूफ ईंटें भी लगाई हुई है। ऐसा माना जाता है कि इसका इस्‍तेमाल नहाने के लिए किया जाता था। मोहनजोदड़ों से प्राप्‍त विशाल स्नानागार में जल के रिसाव को रोकने के लिए ईंटों के ऊपर जिप्‍सम के गारे के ऊपर चारकोल की परत चढ़ाई गई थी, जिससे पता चलता है कि वे चारकोल के संबंध में भी जानते थे। इस नगर की सड़कों और गलियों में आज भी घूमा जा सकता है।

१. बरतन

        मोहेंजोदडो में हड्डप्पन विज्ञान प्रगत था । ईसापूर्व ५ सहस्र वर्षपूर्व भी मिट्टी के बरतनों का प्रयोग होता था । काली, लाल मिट्टी, हड्डप्पा गेरू आदि से ये बरतन बनाए जाते थे । बरतन को आकार देने के लिए कुम्हार उस समय भी चक्के/पहिए का उपयोग करते थे । इन बरतनों को सेकने के लिए ६ x ४ फुटों के भट्टे भी उस समय होते थे । इसके प्रमाण भी उत्खनन से मिले हैं ।

२. अलंकार

        मिट्टी के बरतनों के साथ सिरॅमिक से बनाई वस्तुएं, कंगन तथा शंख-सीपों से बनाए आभूषण भी सहस्रो वर्षपूर्व उपयोग में लाए जाते थे ।

३. धातुआें का अतिप्रगत उपयोग

        सोना, चांदी, तांबा, जस्ता, लोहा आदि के संदर्भ में शोधकार्य भारत में हुआ । धातुआें के शुद्धिकरण की प्रक्रिया भी सर्वप्रथम भारत को सहस्रो वर्षों से ज्ञात है; इसीलिए पहले मिट्टी, लकडी और धातु का शोध लगनेपर उसका उपयोग चलनी सिक्कों के लिए होने लगा ।

३ अ. तांबा : राजस्थान, उत्तरप्रदेश इन राज्यों में ५ से ६ सहस्र वर्षपूर्व भी तांबे का प्रयोग बडी मात्रा में किया जाता था । १ सहस्र ८३ अंश सेंटिग्रेडतक कच्चे धातु को तपाकर उससे शुद्ध तांबा प्राप्त करने की कला तब कारीगरों को अच्छे से अवगत थी । इसी प्रकार १ सहस्र ६३ अंश सेंटिग्रेड की उष्णता देकर सोनेपर शुद्धिकरण की प्रक्रिया की जाती थी । ईटों से बना लोहे का भट्टा उस समय विशेषकर उपयोग में लाया जाता था ।

३ आ. जस्ता : जस्ता, इस धातु का उपयोग उस समय भी किया जाता था । हिंदुस्थान जंक लिमिटेड, ब्रिटीश म्युजियम और बडोदा के विश्‍वविद्यालय ने राजस्थान के जावर मेंे संयुक्त तत्त्वावधान में उत्खनन किया । तब उन्हें जस्ते का एक भट्टा  मिला था । इस भट्टे में प्रतिदिन २० से २५ किलो जस्तेपर प्रक्रिया की जाती थी । इससे इस गुट ने अनुमान लगाया कि पांचवी और छठी शताब्दि के आसपास ६० सहस्र टन जस्ते का उपयोग किया गया ।

३ इ. धातुआें से मूर्ति बनाना : मूर्ति बनाने के लिए सामान्यतः मोम के सांचे का उपयोग किया जाता था । मोम से मूर्ति बनाकर उसपर रेती और मिट्टी का मिश्रण डालकर सांचा बनाया जाता था । इस सांचे में धातु डालकर मूर्तियां बनायी जाती थी । सेकने तथा पॉलिशिंग का काम भी उस समय होता था । इसी प्रकार केवल १ से २ प्रतिशत कार्बन से युक्त उच्च श्रेणी का लोहा (स्टील) भारत में बनता था । चीन और भारत के कुछ पूर्वी देशों से भारतीय लोह के लिए (स्टील के लिए) विशेषकर वूटज स्टील को बडी मात्रा में मांग होती थी । इराण के लिए भारत कपास और कपडों का बडा हाट (बाजार) था । इसी कपास के कारण इराणसहित अन्य देशों के व्यापारी उस समय भारत में आने लगे । सामग्री की आयात-निर्यात के लिए पर्याप्त यातायात की व्यवस्था भारत के पास थी ।

४. चक्के (पहिए) का शोध

        इसका शोध लगनेपर उसका विविध प्रकार से उपयोग भारत में प्रारंभ हुआ । लकडी से चौखट बनाकर उसे चक्का लगाकर बैलगाडी, घोडागाडी बनायी गई । इसी प्रकार कुएं से पानी निकालने के लिए रहँट बनाए गए । ईसापूर्व ३५० में भारत में पानी खींचने के लिए रहँट का प्रयोग किया जाता था ।

५. आटे की चक्की

        कश्मीर, हिमाचल प्रदेश में जलप्रपात से तेजी से बहनेवाले पानी का उपयोग कर धान पीस ने की चक्की बनायी गई । इसकी जानकारी देते समय केनेड ने कहा, पत्थर खोदकर उस का दांतवाला चक्का बनाया जाता था । उस में वृक्ष का बडा तना अटकाकर उपर चक्की खडी की जाती थी । अर्थात इसके लिए निकट की दो बडी चट्टानों का आधार लिया जाता था । पानी के वेग से पत्थर का चक्का घूम जानेपर, चक्की के पत्थर घूमा करते थे । यह विश्‍व की पहली आटे की चक्की थी ।

६. वजन

        सिंधु संस्कृति में नाप-तोल (वजन-मापांचा) कर भी उपयोग होता था । १.७, ३.४, १३.६ और १३६ ग्रॅम के वजन तब थे ।

७. अत्याधुनिक शल्यचिकित्सा

        शल्यचिकित्सा (ऑपरेशन) अंग्रजों से भारतियों को मिली देन है, ऐसी अनेकों की अनुचित धारणा है । सुश्रुताचार्य के सुश्रुतसंहिता नामक ग्रंथ में ही शल्यचिकित्सा की जानकारी मिलती है । इतना ही नहीं, किंतु युद्धप्रसंगों में घायल योद्धाआेंपर आवश्यकता पडेनपर शल्यचिकित्सा की जाने की जानकारी इतिहास के बखरों में मिल रही है । ४ से ५ सहस्र वर्षपूर्व भी भारत में वैद्योंद्वारा शल्यकर्म किया जाता था । ३०० से अधिक प्रकार के शल्यकर्म शरीरपर होते थे ।

७ अ. शल्यकर्मों के लिए आवश्यक उपकरण : घाव, दुर्घटना आदिपर उस समय भी शल्यकर्म होते थे । इसके लिए आवश्यक यंत्र, उपकरण उस समय बनाकर लिए जाते थे । ये उपकरण प्राणियों के मुख, पक्षियों की चोंच तथा धातुआें से बनाए जाते थे ।

७ आ. प्लास्टिक सर्जरी : किसी अवयवपर प्लास्टिक सर्जरी भी की जाती थी । गाल की त्वचा निकालकर नाक, ठोडी अथवा भालपर जोडकर मुखमंडल सुंदर करने का कौशल कुछ वैद्यों के पास था । इसलिए इस बात की पुष्टि हो रही है कि प्लास्टिक सर्जरी के जनक भारत में थे ।

८. सुगंधी द्रव्य

        सुंदरता के साथ सुगंध का भी मानवी जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान होता है । इस महत्त्व की पहचान भारतियों को सहस्रो वर्षपूर्व ही थी । अब हाट में (बजार में) विदेशी बनावट के महंगे परफ्युम्स मिलते है, किंतु सुगंधी द्रव्य की धरोहर को भारत ने आरंभ से ही संजोया है । त्वचारक्षक पदार्थों की निर्मिति करते समय सुगंधी फूल, वनस्पती आदि से सुगंधी द्रव्य निर्मित होने लगे । सुगंधी तेल, चूर्ण (पाऊडर) एवं सुगंधी द्रव्य के लिए कन्नौज नामक तत्कालीन शहर विख्यात था । सुगंधी द्रव्य तब भी एक कुटिरोद्योग था ।

– श्री. नीलेश करंजे (संदर्भ : मासिक चित्रलेखा, ८ जनवरी २००७)