भक्तिमती शबरीमैया

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        भारतीय जीवनका सबसे महत्त्वपूर्ण अंग है, व्रत, पर्व, उत्सव तथा त्योहार, यहां प्रतिदिन कहीं-न-कहीं, कोई-न-कोई आनंदपर्व अवश्य मनाया जाता है । यहां सृष्टि भी नित्य नए रूपोंमें अपना शृंगार करती है । इस शृंगारका एक मनभावन रूप है, ‘वसंतपंचमी’ । इसी पावनपर्वपर प्रभु श्रीरामचंद्रजीके चरणकमल उस पवित्र आश्रमकी ओर बढे, जहां एक भक्तिरत्ना अपनी किशोरावस्थासे लेकर वृद्धावस्थातक प्रतिदिन, प्रतिपल उन चरणोंकी आस लगाए बैठी थी । जबसे उसने श्रीगुरुमुखसे भगवान् श्रीरामके आनेकी वार्ता सुनी थी, तबसे उसी उत्साह, उसी उमंगसे वह अपने जीवनका पल-पल प्रभुकी मार्गप्रतीक्षामें व्यतीत करती थी ।

        रत्नगर्भा वसुंधराका एक अंश इस देवभूमि भारतके, गर्भसे न जाने कितने अनमोल रत्नोंका उदय हुआ है । जीवनके प्रत्येक क्षेत्रमें उनके नाम और कार्यके बलपर युगो-युगोंसे इस भूमिकी पवित्रता अक्षुण्ण रही है । ऐसा ही एक भक्तिरत्न है, ‘शबरी’, जिसकी जीवनचर्या आज भी हमें हिन्दू धर्मकी महानताका, श्रीगुरुके चैतन्यमय वचनपर दृढ श्रद्धाका तथा भगवद्भक्तिका पाठ पढाती है । आइए, वसंतपंचमीके इस पावनपर्वपर भक्तिरत्ना शबरीमैयाके श्रीचरणोंमें कोटी-कोटी नमन करते हुए, प्रार्थना करें कि, हे शबरीमैया, आप जैसी दृढ भक्ति आप ही हमसे करवा लें ।

शबरीमैयाका जीवन भगवत्प्रेमसे ओत-प्रोत रहा, वह मातंगऋषिकी शिष्या थी । किशोरावस्थासे ही वह आश्रमसेवामें मगन रहती थी । गुरुआज्ञाका पालन तो मानो उसका धर्म ही था, इसलिए श्रीगुरु उसकी सेवासे अत्यंत प्रसन्न रहते थे ।

        एक दिन मातंगऋषिने शबरीमैयाको बुलाया और कहा – ‘अब मेरे देहत्यागका समय आ गया है; परंतु मेरे पश्चात तुम इसी आश्रममें रहना । भक्तवत्सल भगवान् श्रीराम अपने अनुज लक्ष्मणसहित इस आश्रममें पधारेंगे । भगवान् श्रीरामका दर्शन ही तुम्हारी सेवाका सर्वोत्तम फल होगा । रावणद्वारा सीता-हरणके पश्चात श्रीराम उसको ढूंढते हुए यहां आएंगे; तुम उनको सुग्रीवका स्थान बता देना । वही तुमपर कृपा करेंगे’, इतना कहकर मातंगऋषिने योग-विधिसे अपनी देह त्याग दी ।

        शबरीमैया अपने श्रीगुरुकी आज्ञानुसार प्रतिपल भगवान् श्रीरामका नाम लेते हुए उनकी बाट जोहने लगी । उसकी दिनचर्यामें आश्चर्यजनक परिवर्तन हो गया, वह प्रतिदिन कुटियाके साथ-साथ झाडू लगाकर मार्ग भी निर्मल करती । नहा-धोकर शीतल जलकी गगरिया भरके रखती, ऋृतुके अनुसार फल-फूल ढूंढकर लाती, और उन फूलोंसे प्रभुके लिए सुंदर आसनके साथ मार्ग भी सजाती, प्रभुके लिए माला बनाती और पूरे समय मार्गकी ओर देखते बैठ जाती ।

        उसकी अपने श्रीगुरुके वचनपर दृढ श्रद्धा थी, एक ही विचार उसके मनमें समाया था कि, प्रभु श्रीराम आएंगे, प्रभु कब आ जाएंगे, यही सोचकर वह दिन-रात सचेत रहती थी । धीरे-धीरे उसका मन रामस्वरूप हो गया ।

        शबरीमैयाके तन-मनकी गति ऐसी हो गई थी कि तनिक-सी आहट होनेपर अथवा वृक्षके पत्तोंके खडखडानेपर भी वह कुटियाके बाहर आकर माथेपर हाथ धरकर दूर-दूरतक देखती कि, कहीं प्रभु तो नहीं आ गए ? उसने श्रद्धा-भक्ति और प्रीतिके साथ अपने मनकी डोर प्रभु श्रीरामसे बांध रखी थी । दिन बीतते गए, ऋृतु आते-जाते रहे; परंतु उसकी उमंग, उत्साह तथा दिनचर्या वैसी ही हर्षोल्लाससे भरी रही, अब तो वह वृद्धा हो गई थी ।

        भगवान् श्रीरामके अतिथ्य-सत्कारकी सिद्धता करना ही उसका कर्मयोग, उनके विचारोंमें मगन रहना यही उसका ध्यानयोग, अतिप्रीतिसे उनका नामसंकीर्तन करना यही उसका ज्ञानयोग । वह सहजयोगसे ही भक्तियोग पथपर अग्रसर हो गई ।

        शबरीमैयाकी ऐसी दिनचर्या देखकर उस वनके अन्य जन-लोग प्रायः कहते थे कि, भला तत्त्ववेत्ता, तपस्वी एवं सिद्ध पुरुषोंके आश्रमोंको छोडकर प्रभु श्रीराम उसकी कुटियापर क्यों आएंगे ? परंतु शबरीमैयाको इन बातोंका कभी दुःख नहीं होता; क्योंकि वह समत्व योगकी स्थितिमें पहुंच चुकी थी । उसका निंदा-स्तुति, हानि-लाभ, सिद्धि-असिद्धि तथा जीवन-मृत्युसे कोई संबंध ही नहीं रहा । उसका चित्त केवल प्रभुके आनेकी ओर लगा था ।

        एक दिन शबरीमैयाने देखा कि वनवासी वस्त्र धारण किए धनुर्धारी प्रभु श्रीराम अपने अनुजसहित उसके आश्रमकी ओर आ रहे हैं, प्रभुको देखते ही वह आत्मविभोर होकर दौडी और उनके श्रीचरणोंपर गिर गई । वह पूजा, अर्चना, विनती तथा स्वागत-सत्कार करना सबकुछ एक क्षणमें ही भूल गई । प्रभुने उसको उठाकर अपने हृदयसे लगा लिया, अपने हाथोंसे उसके प्रेमाश्रु पोंछे ।

        शबरीमैयाने हाथ जोडकर कहा- ‘प्रभु ! मैं पूजा-पाठ, मंत्र-जप तथा योग-विधि कुछ भी नहीं जानती हूं, मेरे गुरुदेव मातंगऋषिने अपनी देहत्यागके समय मुझसे कहा था कि एक दिन इसी आश्रममें प्रभु श्रीराम अपने अनुजसहित आएंगे, मैं उसी दिनसे आपकी बाट जोह रही थी । आज आप आ गए प्रभु, मैं आपके दर्शन करके धन्य हो गई ।’

श्रीराम बोले- ‘हे भामिनि ! मैं तो केवल भक्तिका नाता मानता हूं और तुममें तो भक्तके समस्त गुण हैं ।’ कह रघुपति सुनु भामिनि बाता । मानउं एक भगति कर नाता ।।

        इसके पश्चात भगवान् श्रीरामने शबरीमैयाको नवविधा भक्तिका उपदेश देते हुए कहा – ‘पहली भक्ति संतोके सान्निध्यमें रहना, अर्थात् सत्संग करना है । मेरे कथा-प्रसंगोंमें प्रेम होना यह दूसरी भक्ति है । अहंकार रहित होकर श्रीगुरुके चरणकमलोंकी सेवा करना तीसरी भक्ति है । कपट त्यागकर मेरा गुण-गान करना चौथा भक्ति है । पांचवीं भक्ति है, मुझमें दृढ श्रद्धा रखकर मेरे नामका जप करना, यह भक्ति वेदोंमें भी प्रसिद्ध है । इंद्रियोंका निग्रह, शील-स्वभाव, कर्मसे वैराग्य तथा निरंतर धर्माचरणमें लगे रहना छठी भक्ति है । जगत्को समान भावसे मुझमें ओत-प्रोत देखना तथा मुझसे भी अधिक संतोंको अपना मानना सातवीं भक्ति है । जो कुछ प्राप्त हो जाए उसीमें संतोष करना तथा सपनेमें भी दूसरोंके दोष न देखना यह आठवीं भक्ति है तथा भक्तिका नववां प्रकार है निष्कपट होकर सबसे सरलतासे व्यवहार करना तथा हृदयमें मेरे प्रति दृढ श्रद्धा रखकर हर्ष-खेद रहित जीवनयापन करना ।’

श्रीरामचरितमानसमें इसका बहुत ही सुंदर शब्दावलीमें इस प्रकार वर्णन है-

नवधा भगति कहउं तोहि पाहीं । सावधान सुनु धरु मन माहीं ।।

प्रथम भगति संतन्ह कर संगा । दूसरी रति मम कथा प्रसंगा ।।

गुरु पद पंकज सेवा तीसरी भगति अमान ।

चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान ।।

मंत्र जाप मम दृढ बिस्वासा । पंचम भजन सो बेद प्रकासा ।।

छट दम सील बिरति बहु करमा । निरत निरंतर सज्जन धरमा ।।

सातवं सम मोहि मय जग देखा । मोतें संत अधिक करि लेखा ।|

आठवं जथालाभ संतोषा । सपनेहुं नहिं देखइ परदोषा ।।

नवम सरल सब सन छलहीना । मम भरोस हियं हरष न दीना ।।

        भगवान् श्रीरामने शबरीमैयाको समझाया कि हे भामिनि ! जिस स्त्री-पुरुष अथवा जड-चेतनमें इन नौ प्रकारकी भक्तियोंमेंसे एक भी भक्ति होती है, वह मुझे प्रिय होता है और तुम तो सभी प्रकारकी तथा दृढ भक्तिकी मूरत हो । मेरे दर्शनका यह अनुपम फल होता है कि जीव अपने सहज स्वरूपको प्राप्त हो जाता है । अतः जो गति योगियोंको भी दुर्लभ है, वही गति आज तुम्हारे लिए बहुत सुलभ हो गई है । नव महुं एकउ जिन्ह कें होई । नारि पुरुष सचराचर कोई । सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरें । सकल प्रकार भगति दृढ तोरें ।। जोगि बृंद दुरलभ गति जोई । तो कहुं आजु सुलभ भइ सोई ।। मम दरसन फल परम अनुपा । जीव पाव निज सहज सरूपा ।।

        भगवान्के पूछनेपर शबरीमैयाने उन्हें सुग्रीवका स्थान बताकर उनसे मित्रता करनेको कहा । भक्तिमती शबरीमैयाने प्रभुका दर्शन कर उनके चरणकमलोंको हृदयमें धारण किया और प्रभुके समक्ष ही योगाग्निसे अपनी देह त्याग दी । शबरीमैयाने वह पद प्राप्त किया, जहांसे संसारमें लौटना नहीं पडता । शबरीमैयाकी भक्तिमयी जीवनचर्या युगों-युगोंसे प्रभु-भक्तोंको प्रेरणा प्रदान करती आई है । भगवान् श्रीरामने शबरीमैयाके माध्यमसे नवविधा भक्तिका उपदेश प्रदान कर भक्तिपथपर अग्रसर साधकको मानो अमृत पिलाया है ।

        शबरीमैयाके प्रभुको प्रेममें पगे जूठे बेर खिलानेकी कथाको रामकथाके सभी पाठक-गायक अपने-अपने ढंगसे प्रस्तुत करते हैं । दंडकारण्य क्षेत्रके गुजरातके डांग मंडलमें वह स्थान है, जहां शबरीमैयाका आश्रम था । उस क्षेत्रके वनवासी आज भी एक शिलाको पूजते हैं, जिसके बारेमें उनकी श्रध्दा है कि, प्रभु श्रीराम आकर यहीं बैठे थे, वहांपर शबरीमैयाका मंदिर भी है ।

संदर्भ : कल्याण, गीताप्रेस गोरखपुर