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तीर्थ एवं प्रसाद ग्रहण करना

देवता का चैतन्य ग्रहण करने हेतु हम सभी देवालय में देवता की परिक्रमा करने के उपरांत तीर्थ तथा प्रसाद ग्रहण करते हैं । यदि हम अपने शास्त्रों में बताए गए आध्यात्मिक दृष्टि से उचित पद्धति का पालन कर प्रसाद तथा तीर्थ ग्रहण करें, तो हम इससे सर्वाधिक लाभ ले सकते हैं । आगे नामजप करते हुए प्रसाद तथा तीर्थ ग्रहण करने का अध्यात्मशास्त्र बताया गया है ।

१. तीर्थ

अ. तीर्थग्रहण करने की क्रिया और उसका अध्यात्मशास्त्रीय आधार

तीर्थग्रहण की क्रिया

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१. ‘तीर्थ लेते समय दाएं हाथ की तर्जनी (अंगूठेके पासकी उंगली) आधे पर मोडकर अंगूठे का सिरा तर्जनी के मूलसे बाहर की ओर से सटाकर हथेली पर गड्ढा बनाएं । इस मुद्रा को ‘गोकर्ण मुद्रा’ कहते हैं ।

२. इस मुद्रा में पुजारी / पुरोहित के हाथ से तीर्थ लें । अपने हाथ से तीर्थ ले रहे हों, तो बाएं हाथ में तीर्थपात्र और दार्इं हथेली पर तीर्थ न लें । क्योंकि, बाएं हाथ के स्पर्श से तीर्थ उच्छिष्ठ (जूठा) हो जाता है । परंतु, द्विमुखी (दो मुखवाले) पात्र, उदा. कमण्डलु आदि इस नियम के अपवाद हैं; क्योंकि इनके जल को जूठा होने का दोष नहीं लगता ।

३. तीर्थप्राशन के समय हथेली को कलाई से मुंहकी ओर थोडा-सा मोड दें । इससे तर्जनी के सिरे माथे से स्पर्श नहीं होंगे । तीर्थ बैठकर पीना चाहिए । (देवता के गर्भगृह की सात्त्विकता बचाए रखने के लिए वहां तीर्थ न पीएं ।)

४. तीर्थ पीते समय निम्नांकित श्लोक बोलें । ऐसे में अलग से प्रार्थना करने की आवश्यकता नहीं पडेगी; क्योंकि ये श्लोक प्रार्थना रूप में हैं ।

अ. अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम् ।
देव (टिप्पणी १) पादोदकं तीर्थं जठरे धारयाम्यहम् ।।

अर्थ : अकालमृत्यु का हरण करनेवाले, सर्व व्याधियों का नाश करनेवाले देवता के चरणों का तीर्थ मैं उदर में ग्रहण करता हूं ।

टिप्पणी १ – ‘देव’ शब्द के स्थान पर जिस देवता का तीर्थ आप ग्रहण कर रहे हैं, उस देवता के नाम का उच्चारण करें ।

५. कृतज्ञता व्यक्त करें । तीर्थप्राशन के पश्चात गीला हाथ सिरपर न पोंछें, पानी से धो लें । (हाथ धोना असंभव हो, तो कपडे से पोंछ लें ।)’
– वेदमूर्ति केतन शहाणे, अध्यापक, सनातन साधक-पुरोहित पाठशाला

आ. तीर्थप्राशनसे दर्शनार्थीको प्राप्त सूक्ष्म-स्तरीय लाभ दर्शानेवाला चित्र

‘चित्र में अच्छे स्पंदन : ४ प्रतिशत’ – प.पू. डॉ. जयंत आठवले

‘सूक्ष्म-ज्ञानसंबंधी चित्र में स्पंदनों की मात्रा

स्पंदन तीर्थ में विद्यमान तत्त्व
(प्रतिशत)
तीर्थ प्राशन करने पर होनेवाला लाभ
(प्रतिशत)
देवतातत्त्व
आनंद १.२५
चैतन्य १.२५
शक्ति

अन्य सूत्र

अ. तीर्थ आपतत्त्व से संबंधित है । इसलिए उस में चैतन्य एवं शक्ति की मात्रा अधिक होती है ।

आ. तीर्थ पीने से तीर्थ के माध्यम से चैतन्यकण रक्त में प्रवाहित होते हैं । इससे देह को शक्ति मिलती है । देवता के तीर्थ में ५ पवित्र नदियों की (गंगा, कृष्णा, गोदावरी, तुंगभद्रा, कावेरी) सात्त्विक शक्ति होती है ।

ई. प्रसाद की अपेक्षा तीर्थ में शक्ति की मात्रा अधिक होती है; क्योंकि तीर्थ, देवता के स्नान का जल होने से वह प्रत्यक्ष देवता की देह से स्पर्शित होता है, जबकि प्रसाद नैवेद्य के रूप में देवता को अर्पित किया हुआ होता है । इसलिए तीर्थ में सात्त्विकता अधिक मात्रा में होती है ।

  • १. तीर्थ में देवता के सगुण-निर्गुण तत्त्व आ जाते हैं ।
  • २. ऐसा तीर्थ पीने से देह की आंतरिक शुद्धि होती है ।

उ. गोकर्णमुद्रा में तीर्थ लेकर पीने से देह में देवता के तत्त्व संक्रमित एवं कार्यरत होते हैं । साथ ही, उनका वातावरण में अल्प मात्रा में प्रक्षेपण होता है ।’

तीर्थ को अंजुलि में लेकर प्राशन कर हाथ आंखों को लगाने के उपरांत मस्तक, ब्रह्मरंध एवं गर्दनतक ले जाते हैं । प्रसाद-ग्रहण में ऐसा क्यों नहीं करते ?

प्रसाद पृथ्वीतत्त्व से संबंधित है । आपतत्त्व की तुलना में पृथ्वीतत्त्व में सात्त्विकता ग्रहण कर प्रक्षेपित करने की क्षमता न्यून होती है । अतएव सात्त्विकता से लाभान्वित होने हेतु तीर्थ प्राशन कर हाथ आंखों, मस्तक, ब्रह्मरंध एवं गर्दन पर ले जाते हैं । यही क्रिया प्रसाद लेते समय करने पर अधिक लाभ नहीं होता; अत: ऐसा नहीं करते ।

२. प्रसाद

अ. प्रसाद में देवत्व के लिए आधारित घटक

घटक मात्रा (प्रतिशत) घटकोंके विषयमें विवेचन
१. ‘प्रसाद ग्रहण करनेवाले जीव का भाव ७० प्रसाद ग्रहण करनेवाले जीव का भाव अधिक हो, तो प्रसाद में व्याप्त (व्यापक कार्य करनेवाला) ईश्वरीय तत्त्व
जीव की भावऊर्जा के माध्यम से जागृत होकर क्रियाशील रहता है ।
२. प्रत्यक्ष सगुण मूर्ति में व्याप्त देवत्व २० मूर्ति से प्रक्षेपित व्याप्त सगुण तरंगें प्रसाद की ओर संक्रमित होती हैं और प्रसाद देवत्व से पुष्ट होता है, उदा.
सिद्धिविनायक, महांकालेश्वर के प्रसाद में देवत्व अधिक समयतक रहता है । इसके विपरीत कनिष्ठ देवताओं के
प्रसाद में देवत्व अल्प मात्रा में प्रविष्ट होता है ।
३. प्रसाद के पदार्थ १० विशिष्ट देवता की तरंगों का कोष ग्रहण करने हेतु विशिष्ट पदार्थों का उपयोग आवश्यक है । इससे प्रसाद में देवत्व
अधिक समयतक बना रहता है । साथ ही पदार्थ सात्त्विक हो तो देवत्व और अधिक मात्रा में बना रहता है ।
कुल १००

आ. प्रसाद सदैव दाहिने हाथ से लेते हैं, इसका क्या कारण है ?

‘प्रसाद में उस विशिष्ट देवता से संबंधित तत्त्वों का समावेश है । इस तत्त्वरूपी आशीर्वाद को दाहिने हाथ में लेने का अर्थ है अपनी क्रिया-शक्ति को जागृत कर, उसके आधार पर देवताओं से तत्त्वरूपी आशीर्वाद लेना । दाहिने हाथ में प्रसाद लेने से उसकी सात्त्विकता का ह्रास नहीं होता तथा वह जीवद्वारा ग्रहण होता है । इसके

विपरीत बाएं हाथ में प्रसाद लेने से चैतन्य को साकार करने हेतु आवश्यक क्रियाशक्ति के अभाव में जीव को प्रसाद में विद्यमान देवता का तत्त्व १० प्रतिशत घट जाता है । साथ ही दाहिने हाथ से प्रसाद लेने से व्यक्ति की सूर्यनाडी जागृत होती है और उसका भाव जागृत होता है ।

दाहिने हाथ में प्रसाद लेने के सूक्ष्म-स्तरीय लाभ दर्शानेवाला चित्र

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अन्य सूत्र

  • १. प्रसाद अमृतसमान होता है ।
  • २. प्रसादमें देवताका तत्त्व आकर्षित हो जाता है ।
  • ३. दाएं हाथमें प्रसाद लेनेसे जीवकी सूर्यनाडी कार्यरत होती है तथा भाव भी जागृत होता है ।’

इ. प्रसाद लेते समय नम्रता से झुकने पर देह में देह की सात्त्विकता में वृद्धि होना

प्रसाद लेने हेतु नम्रतापूर्वक झुकने से शरीर की विशिष्ट आकृति का निर्माण होता है तथा जीव के शरीर में विद्यमान रज-तम कण कुछ मात्रा में प्रतिबंधित होकर देह की सात्त्विकता बढती है । इस विशिष्ट आकार के कारण प्रसाद लेनेवाले जीव को चैतन्य का लाभ २-३ प्रतिशत अधिक होता है ।

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र्इ. देवता के समक्ष बैठकर नामजप करना

देवता की परिक्रमा कर प्रसाद ग्रहण करने के उपरांत न्यूनतम तीन मालाएं अथवा पंद्रह मिनट नामजप देवता के समक्ष बैठकर करें । इससे जीव को निम्नलिखित लाभ होते हैं ।

१. देवता से प्रक्षेपित चैतन्य-तरंगें कार्यरत होती हैं एवं जीव को उनका लाभ मिलता है । उसी प्रकार देवता के चैतन्य के लाभ से उनकी कृपादृष्टि भी यथाशीघ्र होती है ।

२. देवालय का वातावरण सात्त्विक होने से घर में नामजप करने की अपेक्षा देवालय में नामजप अधिक गुणवत्तापूर्ण हो सकता है, इसीलिए जैन लोग देवालय में जाते समय अपने साथ जपमाला लेकर जाते हैं और नामजप करते हैं ।

उ. प्रसाद बैठकर ग्रहण करने का अध्यात्मशास्त्रीय आधार क्या है ?

देवालय में बैठने का अर्थ है स्वयं को प्रत्यक्ष क्रियात्मक कर्म से विलग कर अप्रत्यक्ष क्रिया से संलग्न कर्म करना । प्रत्यक्ष क्रियात्मक कर्म करने के लिए जीव में रज-तम निरंतर जागृत एवं प्रवाहित रहते हैं । अत: जीवद्वारा ग्रहण किए गए प्रसाद में प्रत्यक्ष क्रियात्मक कर्म ऊर्जा से निर्मित रज-तम के कारण सात्त्विकता का ह्रास होता है तथा रज-तम बढने की आशंका होती है । इसके विपरीत अप्रत्यक्ष क्रिया से संलग्न कर्म में जीव के रज-तम पर सत्त्वगुण का आधिपत्य होता है तथा जीव में सत्त्वगुण जागृत होता है । इसलिए अप्रत्यक्ष क्रिया से संलग्न कर्म करते हुए (अर्थात बैठे रहने से) सात्त्विकता का ह्रास न्यून होता है ।

ऊ. प्रसाद तत्काल ग्रहण करने का अध्यात्मशास्त्र

कलियुग में रजतम की मात्रा अधिक होने से प्रसाद जैसे प्रत्यक्ष ईश्वरीय तेज से घनीभूत पदार्थ भी रज-तम के आक्रमण से नहीं बच पाता । कलियुग के जीव में अधिक भाव नहीं रहता, इसलिए प्रसाद में व्याप्त देवत्व दीर्घकालतक नहीं टिकता । प्रसाद में विद्यमान ईश्वरीय तत्त्व का लाभ होने हेतु उसे शीघ्रातिशीघ्र ग्रहण करें ।

ए. देवालय की सात्त्विकता के कारण प्रसाद पर अनिष्ट शक्तियों का आक्रमण न्यून होना

अन्य स्थानों की तुलना में देवालय में सात्त्विकता अधिक होती है । वहां प्रसाद ग्रहण करने से उस पर अनिष्ट शक्तियों के आक्रमण की आशंका न्यून होती है । इसके विपरीत अन्य स्थानों में विद्यमा न रज-तम का लाभ उठाकर अनिष्ट शक्तियां प्रसाद पर आक्रमण कर उसके माध्यम से जीव की देह में स्थान उत्पन्न कर सकती हैं । इसलिए जहांतक संभव हो, देवालय में ही प्रसाद ग्रहण करें ।

एे. प्रसाद पर अनिष्ट शक्तियों के आक्रमण को रोकने के लिए उसे घर ले जाते समय स्वच्छ वस्त्र में लपेटकर ले जाना

प्रसाद घर ले जाना, जीव के भाव पर निर्भर करता है । घर के किसी सदस्य के लिए देवालय जाना संभव न हो, तो उसके लिए प्रसाद घर ले जाना उचित है; उसे स्वच्छ वस्त्र में अवश्य लपेटकर ले जाएं । इससे उस पर अनिष्ट शक्तियों का आक्रमण होने की मात्रा १० प्रतिशत घटेगी ।

संदर्भ – सनातन-निर्मित ग्रंथ ‘देवालयमें दर्शन कैसे करें ? (भाग १)‘ एवं ‘देवालयमें दर्शन कैसे करें ? (भाग २)