देवालयमें प्रवेश करनेसे पूर्व आवश्यक कृत्य एवं उनका धर्मशास्त्र

        मंदिरमें जाकर देवताका भावपूर्ण दर्शन करते समय हमें कुछ आचारोंका पालन सतर्क रहकर करना चाहिए । उदाहरणार्थ, चप्पल-जूते उतारना, मंदिरके सामने खडे होकर मंदिर के कलश को नमस्कार करना इत्यादि । अनेक बार हमारी बुद्धिमें प्रश्न उठ सकते हैं कि ये कृत्य क्यों करने चाहिए । हिन्दू धर्मग्रंथों के आधार पर ऐसे कुछ प्रश्नोंके उत्तर आगे दे रहे हैं –

१. देवालयमें प्रवेशसे पूर्व पहनी हुई चमडे की वस्तुएं क्यों उतार कर बाहर रखनी चाहिए ?

        ‘प्राणियोंके रज-तमात्मक चमडेसे निर्मित वस्तुओंसे प्रक्षेपित होनेवाली तरंगोंसे जीवकी देहके सर्व ओर रज-तमात्मक तरंगोंका आवरण निर्मित होता है । इस आवरणसे जीवकी, देवालयमें व्याप्त सात्त्विकता ग्रहण करनेकी क्षमता घटती है । इसलिए, उसे देवालयकी सात्त्विकतासे अल्प लाभ होता है । अतः, यथासंभव, चमडेसे बनी वस्तुएं (उदा. पैंटका पट्टा) पहन कर देवालयमें प्रवेश न करें ।’

२. देवालयमें प्रवेश करनेसे पूर्व जूते-चप्पल क्यों उतारें ?

अ. जूते-चप्पल रज-तमात्मक होनेसे ऐसी वस्तुएं पहनकर देवालयमें जानेपर वहां, पातालसे

भूमिकी ओर गमन करनेवाली तरंगोंका प्रवेश होना, इससे वहांकी सात्त्विकता न्यून अथवा नष्ट होना

        देवालय सामूहिक उपासनाके केंद्र होते हैं । यहांसे प्रक्षेपित चैतन्यसे अधिकाधिक लाभ पाने के लिए जूते-चप्पल जैसी रज-तमात्मक एवं धूलि-कणोंसे मलिन वस्तुएं पहनकर देवालयमें प्रवेश नहीं करना चाहिए । इसके अतिरिक्त, जूते-चप्पलके कारण पातालकी प्रवाही तरंगें भूमिकी सतहको भेदकर मंदिरमें प्रवेश करती हैं । इससे वहांकी सात्त्विकता घट अथवा नष्ट हो सकती है । देवालयकी बाह्य कक्षामें सूक्ष्म स्तरपर पातालसे अधिक संबंधित तरंगोंका प्रादुर्भाव बढ जाता है, जिससे वहां एक प्रकारका सूक्ष्म-स्तरीय पाताललोक बननेकी आशंका रहती है । इसलिए, यथासंभव देवालयमें ऐसी वस्तुएं पहनकर न जाएं ।

        जूते-चप्पल देवालय-परिसरमें भी न उतारें; क्योंकि वहां देवताओंकी तरंगें एवं गण (विशेषतः शिवालयमें शिवजीके गण) विचरण करते हैं । इस परिसरमें जूते-चप्पल उतारनेसे देवताकी मूर्तिसे प्रक्षेपित तरंगोंपर रज-तम कणोंका आवरण आ जाता है तथा वहांकी सात्त्विकता घट जाती है । इससे जीवको मंदिरके वातावरणसे सात्त्विकताका लाभ नहीं मिलता । इसके अतिरिक्त, यदि किसी गणको क्रोध आ जाए तो उससे श्रद्धालुको हानि हो सकती है तथा कुछ मात्रामें उसकी आध्यात्मिक अधोगति भी होती है ।

        उपर्युक्त हानि न हो, इसके लिए देवालय-परिसरके बाहर ही जूते-चप्पल उतारें । यदि ऐसा करना संभव न हो अथवा देवालय किसी मार्गपर बना हो, तो देवतासे क्षमा मांगकर ही मन्दिरमें प्रवेश करें ।

आ. जूते पहनकर देवालयमें दर्शन करनेके सूक्ष्म-स्तरीय दुष्परिणाम दर्शानेवाला चित्र

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  1. जूते तमोगुणी पदार्थोंसे बने होने के कारण उनकी ओर वातावरणके तमोगुणी स्पंदनोंका तुरंत आकर्षित होना : जूते, रबड तथा चमडेसमान तमोगुणी पदार्थोंसे बने होते हैं । इससे वातावरणके तमोगुणी स्पंदन उनकी ओर तुरंत आकर्षित होते हैं । यह उसी प्रकार होता है, जैसे समान स्वभावके दो व्यक्ति एक दूसरेकी ओर आकर्षित होते हैं ।

  2. जूतोंमें धूलिकण (रजः) होते हैं । इसलिए, उनमें वातावरणकी अनिष्ट शक्तियां आकर्षित होती हैं ।

  3. जूते पहननेसे उनमें स्थित कष्टदायी शक्तिका देहमें निरंतर संक्रमण होता है । इससे व्यक्ति, देवतासे प्रक्षेपित होनेवाले स्पंदन नहीं ग्रहण कर पाता । फलस्वरूप उस व्यक्तिको देवतादर्शनसे लाभ नहीं होता ।

  4. जूते पहनकर दर्शन करनेवाले व्यक्तिमें वैसे भी देवताके प्रति भाव नहीं होता । इसीलिए, वह ऐसा कृत्य करता है । व्यक्तिको अपने ऐसे अनुचित कृत्यसे पाप लगता है ।

  5. नंगे पैर दर्शन करनेवाले व्यक्तिको देवालय-परिसरके भूमितत्त्व एवं पवित्र तरंगोंसे भी लाभ होता है ।’

इ. मंदिरके प्रांगणमें नंगे पैर चलनेसे देहमें भूमितरंगें आकर्षित होकर देहकी उष्णता घटना 

        तीर्थक्षेत्रोंमें, देवालयके परिसरमें एवं संतोंके दर्शन हेतु जानेपर, वहांकी भूमिमें कार्यरत अत्युच्च सात्त्विक एवं चैतन्यदायी भूमितरंगें, तलुओंके माध्यमसे हमारी देहमें सहजतासे प्रवेश करती हैं । उपर्युक्त स्थानोंपर पदत्राण पहननेसे जीवके तलुओंका भूमिसे सीधा संपर्क नहीं होता, जिससे उसे भूमितरंगें नहीं मिलतीं एवं उसकी सात्त्विकता नहीं बढती । तीर्थक्षेत्रकी पवित्र भूमिमें चैतन्य होता है एवं भूमिमें शीतलता होती है । तलुओंको भूमिकी शीतल तरंगोंका स्पर्श होनेसे, देहमें शीतल तरंगें आकर्षित होकर, पूरे देहमें समा जाती हैं एवं देहकी उष्णता न्यून होनेमें सहायता मिलती है । इसलिए तीर्थक्षेत्रमें, देवालय परिसरमें एवं संतोंके दर्शन हेतु नंगे पैर जानेका विधान धर्मशास्त्रमें है ।

ई. देवालय के सामने जूते न उतारें

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        अनेक लोग देवालयके सामने जूते-चप्पल उतारते हैं । परिणामस्वरूप, देवालयसे प्रक्षेपित होनेवाला चैतन्य, जूते-चप्पलोंसे प्रक्षेपित होनेवाले रज-तमसे निर्मित सूक्ष्म भीतद्वारा आगे बढनेसे रोक दिया जाता है । इससे वह मंदिरके भीतर ही घूमता रहता है; बाहर नहीं जा पाता । इसलिए, देवालयके बाहर स्थित जीवोंको यह चैतन्य नहीं मिलता । ऐसा न हो, इस हेतु  देवतामूर्तिके दाहिनी ओर जूते-चप्पल उतारें ।

        देवालयके सामने जूते-चप्पल उतारनेसे वहां उनकी सूक्ष्म-रेखाका निर्माण होता है । इस सूक्ष्म-रेखाका पातालरेखासे साधर्म्य होता है । इसलिए पाताल रेखापर प्रवाहित होनेवाला प्रचंड उष्ण और काले तंतुओंके समान प्रवाह जूते-चप्पलोंसे बनी रेखापर भी कार्यरत होता है । जिससे देवालयसे प्रक्षेपित तरंगोंका प्रवाह थम जाता है ।

प्रश्न : देवालयके सामने जूते-चप्पल रखनेसे रज-तमकी भीत क्यों बनती है तथा देवतासे प्रक्षेपित होनेवाली तरंगें रज-तम तरंगोंको क्यों नहीं नष्ट करतीं ?

उत्तर : देवालयके सामने जूते-चप्पल उतारनेसे वहां सूक्ष्म-रेखाका निर्माण होता है । ये रेखा पातालमें स्थित पातालरेखाके समान होती हैं । जूते-चप्पलोंमें व्याप्त रज-तम कणोंके भंवरस्वरूप आकर्षणके कारण पातालरेखा तथा जूते-चप्पलोंकी रेखाका सम मात्रामें मेल होता है इसलिए, इस रेखा पर पातालरेखा समान प्रचंड उष्ण और काले तंतुओंके प्रवाह गतिमान होते हैं । इससे देवालयमें प्रवाहित होनेवाला चैतन्य वहांसे बाहर नहीं आ पाता । देवताकी मूर्तिसे प्रक्षेपित होनेवाला प्रवाह यद्यपि सर्वसामान्य जीवोंके लिए बलवान होता है; फिर भी, उनमें मूल पातालरेखाका विरोध करने का सामर्थ्य नहीं होता । इससे दैवी प्रवाह रुक जाता है ।’

उ. जूते-चप्पल रखनेकी व्यवस्था देवालयके प्रांगणमें ही की गई हो, तो जूते-चप्पल देवताके सामने नहीं, उनके दाहिनी ओर उतारें !

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        `देवालयमें समष्टि स्तरका कार्य होता है । इसलिए देवालयोंमें उसके अधिष्ठाता देवताका प्रायः तारक अंश (सूर्यनाडी) जागृत रहता है । इसलिए देवालयके बाह्य भागमें उष्ण तरंगें बहती हैं । इन उष्ण तरंगों के प्रभावसे देवालयके बाहर रखे जूूते-चप्पलोंसे प्रक्षेपित होनेवाले रज-तमका विघटन होता है । इसके अतिरिक्त, देवतासे प्रक्षेपित होनेवाली तरंगोंमें क्रियात्मक ऊर्जा भी होती है, जो रज-तम को नष्ट करती है । का संचारण होता है तथा उन्हें गति प्राप्त होती है ।’

(जूते-चप्पलोंसे प्रक्षेपित रज-तम का विघटन जैसा कनिष्ठ कार्य, देवताके तारक रूपका ही है । बडी अनिष्ट शक्तियोंको नष्ट करना देवताके मारक रूपका कार्य है ।)

३. पैर धोकर देवालयमें प्रवेश क्यों करना चाहिए ?

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पैर धोकर देवालयमें प्रवेश करनेसे जीवकी सात्त्विक तरंगें ग्रहण करनेकी क्षमताका बढना एवं देवालयकी सात्त्विकताका बनी रहना

        ‘चलते समय पैरों / चप्पलोंको धूलके कण लग जाते हैं । पैर धोए बिना देवालयमें प्रवेश करनेसे, धूलके कणोंसे प्रक्षेपित होनेवाले रज-तमात्मक तरंगोंसे जीवमें देवालयकी सात्त्विकता ग्रहण करनेकी क्षमता घटती है और देवालयकी सात्त्विकता भी अल्प होती है । इसके विपरीत, पैर धोकर देवालयमें जानेसे, पैरोंमें लगे धूलिकण धुल जाते हैं । इससे जीवको सात्त्विक तरंगें ग्रहण करनेमें रुकावट नहीं आती तथा रज-तमात्मक तरंगोंका प्रक्षेपण अल्प होनेसे, देवालयकी सात्त्विकता बनाए रखने में सहायता मिलती है ।’

(पूर्वकालमें हिन्दू भक्तगण देवालयोंके बाहर बने जलकुंड अथवा तालाबमें पैर धोकर देवालयमें प्रवेश करते थे । आजकल देवालयोंके बाहर प्रायः जलाशय नहीं होते अथवा होते तो भी, अनेक हिन्दुओंको पैर धोकर देवालयमें प्रवेश करने की जानकारी न होनेके कारण, वे पैर धोए बिना ही देवालयमें जाते हैं । हिन्दुओंके देवालयोंकी सात्त्विकता घटनेका यह भी एक कारण है । – संकलनकर्ता)

४. देवता एवं गुरुके दर्शन करते समय गलेमें वस्त्र क्यों नहीं लपेटना चाहिए ?

देवता एवं गुरुसे प्रक्षेपित होनेवाली सात्त्विक तरंगों एवं सात्त्विक कणोंसे शत-प्रतिशत लाभ पाने हेतु गलेमें वस्त्र न लपेटें !

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प्रदक्षिणे प्रणामे च पूजायां हवने जपे ।।
न कण्ठावृतवस्त्रः स्यात् दर्शने गुरुदेवयोः ।।

– वाधूलस्मृति, श्लोक १४०

अर्थ : परिक्रमा, नमस्कार, पूजा, हवन एवं जप करते समय तथा गुरु एवं देवताओंके दर्शन करते समय गलेपर वस्त्र न लपेटें ।

अध्यात्मशास्त्र : ‘उपर्युक्त कृत्य करते समय देवता अथवा गुरुसे प्रक्षेपित सात्त्विक तरंगें व्यक्तिके सर्व ओर गोलाकार घूमती रहती हैं । व्यक्तिका भाव अच्छा हो, तो ये सात्त्विक तरंगें उसके आस-पास अधिक समयतक घूमती रहती हैं । इससे इनका प्रभाव व्यक्तिके शरीर और मनपर होता है । गलेपर वस्त्र लपेटनेसे व्यक्तिको अधिक लाभ नहीं मिलता । इसी प्रकार, गलेमें वस्त्र लपेटनेसे व्यक्तिका विशुद्धचक्र जागृत नहीं होता और वहांसे ये सात्त्विक तरंगें शरीरमें प्रवेश नहीं कर पातीं । हमें देवता एवं गुरुसे प्रक्षेपित प्रत्येक सत्त्वतरंग एवं सत्त्वकणसे शत-प्रतिशत लाभ पानेके लिए गलेमें वस्त्र नहीं लपेटना चाहिए ।’

भगवानके दर्शन करते समय गलेमें वस्त्र लपेटनेपर सूक्ष्म-स्तरीय हानि दर्शानेवाला चित्र

५. देवालयके प्रवेशद्वार एवं गर्भगृहमें प्रवेश करनेसे पहले द्वारको नमस्कार क्यों करें ?

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अ. देवालयमें प्रवेश करनेसे पहले गरुडध्वज एवं प्रवेशद्वारको नमस्कार करना, अर्थात देवताके अधिकार क्षेत्रमें प्रवेश करने हेतु प्रत्यक्ष अनुमति मांगना

        देवालय देवताके अधिराज्य हैं । इसलिए प्रवेशद्वारपर देवताके गण सूक्ष्मरूपमें खडे रहते हैं । प्रवेशद्वार एवं गरुडध्वजको नमस्कार करना, अर्थात देवालयमें प्रवेश करनेकी अनुमति मांगना ।

आ. देवालयके प्रवेशद्वार एवं गरुडध्वजको नमस्कार करना, अर्थात देवताके लोकमें प्रवेश करनेके लिए स्वयंमें ‘लीनता’ नामक संस्कार अंकित करना ।

इ. देवालयके प्रवेशद्वार एवं गरुडध्वजको नमस्कार करना, अर्थात देवालयमें संचार करनेवाली विविध कनिष्ठ तरंगोंसे (नमनके माध्यमसे) क्षमायाचना कर देवालयमें सहजतासे प्रवेश करना

        ‘प्रत्यक्ष धर्मरूपी ईश्वरीय व्यवस्थाके सगुण आश्रयस्थल हैं, ‘देवालय’ । इसलिए उनके सर्व ओर ईश्वरीय ऊर्जा निरंतर कार्यरत रहती है एवं अनिष्ट शक्तियोंके आक्रमणोंसे उनकी रक्षा होती है । जब जीव बाह्य वायुमंडलसे ‘सात्त्विकताके स्रोत’ होनेवाले देवालयमें प्रवेश करता है, तब बाह्य वायुमंडलके रज-तम कणोंका विरोध करनेवाली ईश्वरीय ऊर्जा जीवके प्रवेशको रोकती है । ४० प्रतिशतसे अधिक आध्यात्मिक स्तरका जीव यह विरोध सहकर सहजासे मंदिरमें प्रवेश कर सकता है; किंतु अल्प आध्यात्मिक स्तरके जीवको ईश्वरीय ऊर्जा अथवा तरंगोंके विरोधसे आगे दिए अनुसार कष्ट हो सकते हैं – जी मिचलाना, सिरमें वेदना, धुंधला दिखाई देना, थकान इत्यादि । नमस्कार करनेसे जीवका विरोध करनेवाली तरंगें शांत हो जाती हैं तथा वह देवालयमें सहजतासे प्रवेश कर जाता है । अतः, यथासंभव, सभी जीव प्रवेशद्वारको अध्यात्मशास्त्रीय पद्धतिसे नमस्कार कर ही देवालयमें प्रवेश करें ।

ई. गरुडध्वजको नमन करना : गरुड, स्थितिदर्शक धर्मकणोंको धारण करनेवाला तत्त्व है । इसलिए, सभी देवालयोंके प्रवेशद्वारपर गरुडध्वज स्थापित किया जाता है । स्थितिदर्शक धर्मकणोंसे निर्मित सगुण देवालयोंमें संचार करनेवाले ईश्वरीय तत्त्व स्थितिस्वरूपके होते हैं ।  इसके अतिरिक्त यह गरुडध्वज, स्थितिरूपी धर्मकणोंकी सृष्टिरूप (सृष्टिचक्र) त्रिधारा (तीन शक्तियोंकी धारा – इच्छा, क्रिया एवं ज्ञान) प्रक्षेपित कर, वायुमंडलके सत्त्वकणोंको चैतन्यकी पूर्ति कर, संपूर्ण सृष्टिका वातावरण संतुलित रखता है । इतने महत्त्वपूर्ण गरुडध्वजको नमस्कार करना, अर्थात अपनी रक्षा करनेवाले वायुदेवता को नमन कर उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना । गरुडध्वजको नमस्कार करनेसे देवालय-प्रवेशमें बाधक वायुमंडलकी त्याज्य वायुपर रोक लगती है । इससे जीव देवालयमें सहजतासे प्रवेश कर पाता है ।

उ. देवालयके प्रवेशद्वारको नमन करना : देवालय देवलोकके सगुण रूप हैं । द्वारको नमस्कार करना, अर्थात देवलोकमें प्रवेश करनेसे पहले स्वयंपर ‘लीनता’ नामक संस्कार कर देवतासे कृपाशीर्वाद प्राप्त करने हेतु सक्षम बनना । नमस्कार करनेसे जीवके चित्तमें निर्मित दैवी गुणोंके कारण देवताके कृपाशीर्वादकी तरंगे जीवकी ओर आकर्षित होती हैं तथा जीवके लिए किसी भी विरोधके बिना देवालयमें प्रवेश कर सात्त्विकता ग्रहण करता है ।’

संदर्भ – सनातन-निर्मित ग्रंथ ‘देवालयमें दर्शन कैसे करें ? (भाग १)‘ एवं ‘देवालयमें दर्शन कैसे करें ? (भाग २)