हिंदू राष्ट्रकी स्थापनामें ब्राह्मतेजका महत्त्व

सारणी


(सूचना : यह विषय अधिवेशनमें भाषणके स्वरुपमे प्रस्तुत किया गया था|)

१. विषयप्रवेश

         हम आज धर्मरक्षाके लिए हिंदुओंकी संघशक्ति निर्माण करनेके उद्देश्यसे एकत्र हुए हैं । हिंदुओंकी वर्तमानस्थिति कैसी है, इससे हम चर्चा आरंभ करेंगे ।

१ अ. हिंदुओंकी वर्तमान स्थिति

        स्वामी विवेकानंदजी हिंदु धर्मके विषयमें गर्वसे बोलते थे । वेद एवं उपनिषदोंमेंसे अनेक संदर्भ देकर उन्होंने हिंदु धर्मकी श्रेष्ठता पाश्चात्योंको समझाई । उसी अनुसार कितने हिंदु धर्मप्रसारक हिंदु धर्मके विषयमें इतने गर्वसे एवं अभ्यासपूर्ण बोल सकते हैं ? हिंदू समाजमें से कितने लोग ‘रामायण’ एवं ‘महाभारत’ जैसे ग्रंथोंके विषयमें ५-१० मिनट लोगोंके सामने बोल सकते हैं ? कितने लोग साधनाके रूपमें दिनमें थोडे-बहुत समय तक प्रार्थना, नामजप, मंत्रपठन, ध्यानधारणा इत्यादिमें से कुछ करते हैं ? इन सर्व प्रश्नोंके उत्तर नकारार्थी हैं ।

१ आ. धार्मिक अज्ञान ही हिंदुओंके अधःपतनका कारण

        भारतको जगतके आध्यात्मिक गुरुकी दृष्टिसे देखा जाता है । अन्य किसी भी धर्मके पास इतना उच्च कोटिका ज्ञान नहीं है । वेद, उपनिषद, महाभारत, रामायणके माध्यमसे ऋषि-मुनियोंने हमारे लिए यह ज्ञान लिखकर रखा है, तब भी हिंदुओंको यह कहना पडता है कि ‘स्वधर्माभिमान निर्माण करो ।’ यह अत्यंत दुर्भाग्यकी बात है । हिंदुओंके अधःपतनका मुख्य कारण उनका धर्मविषयक अज्ञान ही है । हिंदुओंको यह ज्ञात नहीं है कि उनके धर्मकर्तव्य कौनसे हैं । हिंदुओंको अब उनके धार्मिक कर्तव्योंका स्मरण करवानेकी, अर्थात उन्हें साधनाके लिए प्रवृत्त करनेकी आवश्यकता है ।

धर्मरक्षा करना, यह पूर्वके राजाओंका कर्तव्य था; परंतु आजके राजनेता धर्मद्रोही हैं । ऐसेमें हम हिंदुओंको ही अब धर्मरक्षाका शिवधनुष्य उठाना होगा । मैंने यहां ‘शिवधनुष्य’ ऐसा उल्लेख  जानबूझकर किया है; वह इसलिए कि केवल बाहुबलद्वारा शिवधनुष्य उठाना संभव नहीं होता । उसके लिए दैवीय सामर्थ्यकी आवश्यकता होती है । केवल शारीरिक, मानसिक एवं बौद्धिक स्तरपर कार्य करनेसे धर्मरक्षा नहीं होगी, अपितु आध्यात्मिक स्तरपर भी प्रयत्न करना होगा । अर्थात धर्मरक्षा करनेके लिए क्षात्रतेजके साथ-साथ ब्राह्मतेज भी आवश्यक है । उस दृष्टिसे आज हम ब्राह्मतेज क्या है, हिंदुओंके इतिहासमें ब्राह्मतेजका स्थान क्या है, हिंदू संगठनमें उसकी क्या आवश्यकता है, ये विषय देखनेवाले हैं ।

 

२. ब्राह्मतेज और उसका महत्त्व !

२ अ. ब्राह्मतेज का अर्थ क्या है ?

        जब कोई कार्य हो रहा हो, तब उसमें कार्यरत विविध घटकोंद्वारा वह कार्य कितना सफल होगा, यह निश्चित होता है । अणुबमसे परमाणुबम अधिक प्रभावशाली होता है; वह इसलिए कि वह अणुबमकी अपेक्षा अधिक सूक्ष्म होता है । अर्थात स्थूल बातोंकी अपेक्षा सूक्ष्म अधिक सामर्थ्यवान है । यह सूत्र शत्रुको मारनेके उदाहरणसे समझ लेते हैं ।

१. पंचभौतिक (स्थूल, वैज्ञानिक स्तर)

        शत्रु कहां है, यह पंचज्ञानेंद्रियोंको ज्ञात हो, उदा. वह कहीं दिखाई दिया अथवा उसकी गतिविधि हो, तो बंदूककी गोलीसे उसको मार सकते हैं । परंतु बिना कोई हलचल किए यदि वह किसी आडमें छिप जाए, तो बंदूकधारी उसे नहीं मार सकता । यहां मारनेके लिए केवल स्थूल अस्त्रोंका उपयोग किया गया है ।

२. पंचभौतिक (स्थूल) एवं मंत्र (सूक्ष्म) एकत्रित

        प्राचीन कालमें मंत्र उच्चारकर धनुष्यसे बाण छोडते थे । मंत्रोंके कारण बाणोंपर उस शत्रुका नाम अंकित हो जाता था और वह फिर किसी आडमें ही क्या, त्रिलोकमें कहीं भी छिपा हो, तब भी बाण उसका वध कर सकता था ।

३. मंत्र (सूक्ष्मतर)

अगले चरणमें बंदूक, धनुष्यबाण इत्यादि स्थूलके आयुधोंके बिना भी केवल विशिष्ट मंत्रद्वारा शत्रुको मार सकते हैं ।

४. व्यक्त संकल्प (सूक्ष्मतम)

        ‘कोई अमुक काम हो जाए’, केवल इतना ही विचार किसी गुरुके /संतके मनमें आ जाए, तो वह सत्य हो जाता है । इसकी अपेक्षा उन्हें और अधिक कुछ नहीं करना होता । ७० प्रतिशतसे अधिक आध्यात्मिक स्तरके  गुरुके / संतोंके संदर्भमें यह संभव है । (सर्वसाधारण व्यक्तिका आध्यात्मिक स्तर २० प्रतिशत एवं मोक्ष १०० प्रतिशत है ।)

४ अ. संकल्प कार्य कैसे करता है ? : संकल्पसे कार्य सिद्ध होनेके लिए आध्यात्मिक स्तर न्यूनतम ७० प्रतिशत तो होना ही चाहिए, यह आगे दिए उदाहरणसे स्पष्ट होगा । मान लें मनुष्यके मनकी शक्ति १०० एकक (युनिट) है । प्रत्येकके मनमें दिनभर कुछ न कुछ विचार आते रहते हैं । इसके लिए कुछ न कुछ शक्ति खर्च होती ही है । यदि किसीके मनमें ऐसे १०० विचार आए, तो उसके पूर्ण दिनकी अधिकांश शक्ति समाप्त हो जाएगी; परंतु यदि उसके मनमें कोई विचार आया ही नहीं, मन निर्विचार हो गया हो तथा ऐसे समयपर यदि उसके मनमें एक विचार यह आए कि अमुक एक काम हो जाए’, तो उसके इस विचारके पीछे उसकी १०० यूनिट शक्तिका बल होता है; इसलिए वह विचार (संकल्प) सिद्ध होता है । इसीको ‘ब्राह्मतेज’ कहते हैं ।

यदि वह विचार सत्का हो, तो उसकी अपनी साधनाकी शक्ति खर्च नहीं होती है । ईश्वर ही वह कार्य पूर्ण करता है; वह इसलिए कि सत्का कार्य, ईश्वरका ही कार्य होता है । अर्थात यह साध्य करनेके लिए नामजप, सत्संग, सत्सेवा, सत्के लिए त्याग इस मार्गसे साधना करनेपर, असत्का विचार ही मनमें नहीं आता । साधकोंको ऐसी स्थिति साधना कर प्राप्त करनी चाहिए ।

अब किसीको लगेगा कि वास्तवमें ऐसे संकल्पसे भी कुछ होता है क्या ? जहां विश्वकी निर्मिति ही ईश्वरके संकल्पसे हुई है, वहां संकल्पके समान सामर्थ्यशाली कुछ भी नहीं है, यह ध्यानमें रखें ! हम पुराणकी कथाओंमें ऋषि-मुनियोंद्वारा शाप देनेके उदाहरण सुनते हैं । यह शाप अर्थात संकल्पसामर्थ्य होता है । यह संकल्पसामर्थ्य साधनाके बलपर ऋषि-मुनियोंको प्राप्त होता है । धर्मरक्षा एवं हिंदू राष्ट्रकी स्थापनाके लिए शारीरिक स्तरपर प्रयत्न करनेके साथ साथ ही, साधना करके संकल्पका सामर्थ्य निर्माण कर कार्य करना आवश्यक है ।

२ आ. ब्राह्मतेजका महत्त्व !

        अन्य प्रयासोंकी तुलनामें ब्राह्मतेजका महत्त्व क्या है, इस बारे अब जान लेते हैं ।

१. संतोंके कार्यक्रममें लाखों लोग स्वेच्छासे एवं श्रद्धासे आते हैं । राजनीतिक सभाओंकी भांति उन्हें पैसे देकर अथवा वाहनसुविधा देकर बुलवाना नहीं पडता है । योगऋषि रामदेवबाबाके कार्यक्रममे लोग सुबह ५ भजे भी आते है ।

२. ब्राह्मतेज एवं क्षात्रतेज होता है; इसलिए ऋषि राजाको शाप दे सकते हैं ।

३. किसी भी राजनीतिक दलका विदेशमें प्रचार नहीं होता है; परंतु आध्यात्मिक संस्थाओंका होता है; वह इसलिए कि आध्यात्मिक संस्थाओंमें आध्यात्मिक तेज, अर्थात ब्राह्मतेज होता है ।

 

३. हिंदुओंके इतिहासमें ब्राह्मतेजका स्थान

         हिंदुओंके पूर्व इतिहासमें अवतारी पुरुष एवं महापुरुषोंमें क्षात्रतेज और ब्राह्मतेज धारण करके धर्मरक्षा करनेके अनेक उदाहरण मिलते हैं ।

३ अ. भगवान परशुराम


भगवान परशुरामजी का वर्णन कैसे किया गया है –

अग्रतः चतुरो वेदाः पृष्ठतः सशरं धनुः ।
इदं ब्राह्मं इदं क्षात्रं शापादपि शरादपि ।।

अर्थ : चार वेद मुखोद्गत हैं, अर्थात पूर्ण ज्ञान है एवं पीठपर बाणोंसहित धनुष्य है, अर्थात शौर्य है; अर्थात यहां ब्राह्मतेज एवं क्षात्रतेज, दोनों हैं । जो कोई विरोध करेगा, उसे परशुरामजी शाप देकर अथवा बाणसे पराजित करेंगे । परशुरामने ब्राह्मतेज एवं क्षात्रतेजके बलपर २१ बार पृथ्वी निःक्षत्रिय की । इसे वाल्मीकिऋषिजीने ‘राजविमर्दन’ संबोधित किया है । ‘दुर्जन नेताओंका नाश ।’ यहां ध्यानमें रखनेयोग्य सूत्र यह है कि भगवान परशुरामने केवल शस्त्रसे ही नहीं, अपितु शाप देकर, अर्थात ब्राह्मतेजका उपयोग करके दुर्जन नेताओंका विनाश किया ।

३ आ. अर्जुन


हमारे सद्गुरु प.पू. भक्तराज महाराजजीने एक बार कहा था, ‘‘अर्जुन उत्तम धनुर्धर तो था ही; इसीके साथ वह श्रीकृष्णका भक्त भी था । बाण छोडते समय वह सदैव श्रीकृष्णका ही नाम लेकर छोडता था । इस कारण उसके बाण अपनेआप लक्ष्य वेधते थे । श्रीकृष्णके नामके कारण अर्जुनके मनमें लक्ष्यको वेधनेका संकल्प सिद्ध होता था ।’’

३ इ. छत्रपति शिवाजी महाराज


ये अपने कुलदेवता श्री भवानीदेवीके असीम भक्त थे । उनके मुखमें सदैव ही ‘जगदंबे जगदंबे’ ऐसा नामजप रहता था । उनकी सेना भी लडते समय ‘हर हर महादेव’का जयघोष करती थी । इस कारण मनुष्यबल एवं साधनसामग्री अल्प होनेपर भी वे पांच बलवान मुसलमान सत्ताओंको झुकाकर ‘हिंदवी स्वराज्य’की स्थापना कर पाए । उनकी साधनाके कारण ही उन्हें संत तुकाराम महाराज एवं संत रामदासस्वामीजीके आशीर्वाद मिले तथा बडे-बडे संकटोंसे उनकी रक्षा हुई ।

४. हिंदुत्ववादियोंद्वारा स्वयंमें ब्राह्मतेज निर्माण करनेका, अर्थात साधना करनेका महत्त्व !

४ अ. ईश्वरीय आधार बिना सफलता असंभव !

राष्ट्रगुरु समर्थ रामदासस्वामीजीने दासबोधमें बताया है कि हिंदुत्वका कार्य करनेवालोंके लिए स्वयंमें ब्राह्मतेज निर्माण करना, अर्थात साधना करना कितना महत्त्वपूर्ण है । वे कहते हैं, ‘‘भगवानके आधारके बिना किसी भी एवं कितने भी सामर्थ्यवान आंदोलनको सफलता नहीं मिल सकती ।’

४ आ. प्रतिकूल प्रसंगोमें रक्षाके लिए ईश्वरका भक्त बनना चाहिए !

इसी प्रकारका एक अन्य श्लोक ‘मनाचे श्लोक’में मिलता है । इस श्लोकमें समर्थ रामदासस्वामीजीने कहा है, ‘समर्थके, अर्थात भगवानके सेवककी ओर कुदृष्टि डाल सके, ऐसा इस भूमंडलपर कौन है ? जिनकी लीलाका वर्णन तीनों लोक करते हैं, ऐसे प्रभु श्रीराम कभी अपने दासकी अनदेखी नहीं करते ।’ हमे धर्मकी रक्षा करनी हैं । धर्मरक्षाके कार्यमें कई बार प्रतिकूल प्रसंग अनुभव करने मिलते हैं । आप यदि ईश्वरके भक्त होंगे, तो बडे-बडे संकटोंसे भी आप सुरक्षित रहेंगे । पांडवोंकी लाक्षागृहसे मुक्तता एवं छत्रपति शिवाजी महाराजजीके जीवनकालमें उनकेद्वारा हुआ अफजलखान वध, उनकी आगरासे मुक्तता इत्यादि प्रसंगोंका  स्मरण होनेपर समर्थ रामदासस्वामीजीके इस श्लोकका भावार्थ हमारे ध्यानमें आएगा ।

४ इ. ईश्वरीय कार्यमें आनेवाली अनिष्ट शक्तिकी बाधा निवारण हेतु साधना आवश्यक !

समाजके ८० प्रतिशत लोगोंपर अनिष्ट शक्तियोंका प्रभाव है । हम हिंदुत्वका अर्थात ईश्वरीय कार्य कर रहे हैं । इस कार्यका अदृश्य अनिष्ट शक्तियां विरोध करती ही हैं । इस कारण सिर भारी होना, कुछ भी न सूझना, कार्यमें अडचनें आना तथा उससे निराशा आना इत्यादि कष्ट हो सकते हैं । ये कष्ट न्यून (कम) करनेहेतु तथा कार्य योग्य ढंगसे चलाने हेतु साधना करना, यही एकमात्र उपाय है ।

४ ई. एकतामें बाधा लानेवाला अहंकार मिटानेके लिए साधना उपयुक्त !

हिंदुत्ववादियोंमें जो अहंकार होता है, वह हिंदू एकतामें प्रमुख बाधा निर्माण करता है । साधना करनेसे अहंकार दूर होता है, नम्रता बढती है तथा अन्योंसे निकटता साधना सरल हो जाता है । संक्षेपमें साधनाके कारण ईश्वरीय गुण बढते हैं । हिंदू जनजागृति समितिके कार्यकर्ता एवं सनातन संस्थाके साधक प्रतिदिन साधना करते हैं । इसलिए उनकी अन्योंसे शीघ्र निकटता हो जाती है ।

मुसलमान धर्मके सामने अहंभाव नहीं संजोते इसलिए वे धर्मके लिए तुरंत एकत्र आ जाते हैं । अहंरहित धर्मनिष्ठा साधनाद्वारा ही निर्माण हो सकती है । क्रांतिकारियोंमें अहंभाव नहीं था । इसलिए वे अपने प्राण अर्पण कर पाए ।

४ उ. समाजको धर्मशास्त्रकी दृष्टि देनेके लिए साधना लाभदायी !

सनातन संस्थाके साधक एवं हिंदू जनजागृति समितिके कार्यकर्ता प्रतिदिन साधना करते है । साधनाके कारण तथा उनकेद्वारा धर्मशास्त्रका अभ्यास किए जानेके कारण विविध दूरदर्शन प्रणाल धर्मशास्त्रविषयक चर्चासत्रोंमें हिंदु धर्मका अधिकृत मत बतानेके लिए साधक एवं कार्यकर्ताओंको निमंत्रित करते हैं । अबतक गणेशोत्सव कैसे मनाएं, ग्रहणके विषयमें धर्मशास्त्र, अध्यात्मके दृष्टिकोणसे ‘लिव इन रिलेशनशिप’का विचार, लिंगपरिवर्तनविषयक आध्यात्मिक दृष्टिकोण ऐसे विविध विषयोंपर बोलनेके लिए साधक एवं कार्यकर्ताओंको निमंत्रित किया गया है । ऐसे बहुत लोग हर एक हिंदू संघटनमे निर्माण होने चाहिए, जो समाजको धर्मके विविध अंगोके बारेमें शास्त्रीय जानकारी दे सके ।

४ उ १. साधना और धर्मशास्त्रकी दृष्टि न होनेके कारण समाजको अधर्माचरणके लिए प्रवृत्त करना !

वर्ष २०१० में एक स्वामीजीने ‘मुसलमानोंकी बढती लोकसंख्या’ इस विषयपर बोलते हुए कहा, ‘हिंदुओंको भी अनेक पत्नियां रखकर अनेक बच्चोंको जन्म देना चाहिए, तभी हिंदुओंकी लोकसंख्यामें वृद्धि होगी और मुसलमानोंसे लडनेके लिए उनका सामर्थ्य बढेगा ।’ वास्तवमें ये सूत्र राष्ट्रहित एवं धर्मसिद्धांतके विरोधमें होनेके कारण लोगोंको मानसिक स्तरपर अयोग्य दृष्टिकोण मिला है; केवल हिंदुओंको धर्मशिक्षा देना एवं उनका धर्माचरण करना, यह रामबाण उपाय उन्हें समझमें नहीं आए हैं ।

४ ऊ. हिंदू राष्ट्रकी स्थापनाके लिए साधना करके आध्यात्मिक स्तर बढानेका महत्त्व !

साधना करनेसे हिंदुत्वका कार्य कैसे आसान हो सकता है, यह हमने समझ लिया । परंतु हिंदू राष्ट्रकी स्थापना हेतु केवल साधना नहीं, अपितु उसके साथ ही स्वयंका आध्यात्मिक स्तर बढाना महत्त्वपूर्ण है । आध्यात्मिक स्तरका हिंदू राष्ट्रकी स्थापनासे क्या संबंध है, यह अब हम समझ लेंगे ।

इस लिए हम शारीरिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक इन तीन स्तरोंका तुलनात्मक अभ्यास करेंगे ।

१. शारीरिक स्तर : एक सिंह सैकडों बकरियोंको पस्त कर सकता है ।

२. बौद्धिक स्तर : एक विद्वान सहस्त्रो  अल्पशिक्षितोंको वाद-विवादमें पराजित कर सकता है ।

३. आध्यात्मिक स्तर : ऋषि एवं संतोंके समक्ष पराक्रमी राजा-महाराजा और तो और भगवानेके अवतार भी नतमस्तक हुए हैं, इसकी सहस्त्रो कथाएं हैं । संतोंमें इतना सामर्थ्य साधनाद्वारा प्राप्त आध्यात्मिक स्तरसे आता है । ये आध्यात्मिक स्तर क्या होता है, और उससे होनेवाला कार्य प्रभावशाली कैसे होता है, यह हम समझ लेंगे ।

सर्वसामान्य व्यक्तिका आध्यात्मिक स्तर २० प्रतिशत होता है । ऐसे व्यक्ति हिंदू राष्ट्रकी स्थापनाके लिए कुछ भी नहीं कर सकते हैं; क्योंकि वे केवल मनुष्यदेहधारी प्राणी होते हैं । स्वयंके परे जाकर वे राष्ट्र एवं धर्मका विचार भी नहीं कर सकते । ३० प्रतिशत स्तरके व्यक्ति धार्मिक होते हैं । ७० प्रतिशत स्तरपर व्यक्ति ‘संत’ बनते हैं । १०० प्रतिशत आध्यात्मिक स्तरपर पहुंचे हुए व्यक्ति ‘मोक्ष’ प्राप्त करते हैं । व्यक्तिके आध्यात्मिक स्तरके अनुसार उसका कार्य करनेका सामर्थ्य बढता जाता है । एक सारणीके माध्यमसे यह हम समझ लेंगे । निर्जीव वस्तुओंका स्तर ० प्रतिशत एवं ईश्वरका स्तर १०० प्रतिशत मानकर आगे दी गई सारणी बनाई है ।

स्तर (प्रतिशत) कार्यका स्वरूप
३० शारीरिक
४० से ५० शारीरिक ± मानसिक
५० से ६० मानसिक ± आध्यात्मिक (ब्राह्मतेज)
६० से ७० आध्यात्मिक (ब्राह्मतेज) ± मानसिक
७० आध्यात्मिक (साधना, अनुष्ठान इत्यादि बताना) (ब्राह्मतेज)
८० आध्यात्मिक (संकल्प) (ब्राह्मतेज)
९० आध्यात्मिक (अस्तित्व) (ब्राह्मतेज)
१०० आध्यात्मिक (निर्गुण स्तर) (ब्राह्मतेज)

जिन्हें देवता, संत एवं गुरुके आशीर्वादसे एवं साधनासे मिलनेवाले आध्यात्मिक बलका अर्थ ज्ञात नहीं होता, वे २० प्रतिशत आध्यात्मिक स्तरके केवल जन्महिंदू होते हैं । उनसे राष्ट्र एवं धर्मके लिए कार्य होना असंभव है । अगले चार दिन चलनेवाले इस अधिवेशनमें हम धर्मरक्षा करनेकी दिशामें चर्चा करनेवाले हैं । आगे अपने-अपने प्रांतोंमें जाकर इस चर्चामें हुए निर्णयके अनुसार कृति भी करनेवाले हैं; परंतु उसके साथ-साथ साधना आरंभ करना भी अत्यंत आवश्यक है । आपमें से कोई साधना करता होगा, तो आपने यह अनुभव भी किया होगा । वे साधना करनेका महत्त्व औरोंको भी बताएं ।

 

५. साधना कौनसी करनी चाहिए ?

५ अ. प्रतिदिन न्यूनतम १ घंटा कुलदेवताका अथवा इष्टदेवताका नामजप करना

साधना कौन सी करनी चाहिए, अब ऐसा प्रश्न आपके मनमें निर्माण हुआ होगा । आपमेंसे कोई पूजापाठ, स्तोत्रपठण, उपवास इत्यादि कुछ तो करता होगा । यह सर्व आप करते रहें । उसके साथ भगवानका नामजप करें । नामजप ही उपासनाकांडकी साधना है । उसे आते-जाते, उठते-बैठते कहीं भी कर सकते हैं । नामजपके माध्यमसे मनसे सदा भगवानके सानिध्यमें रहना संभव होता है । आप पहलेसे ही किसी देवताका अथवा गुरुद्वारा दिया नामजप कर रहे हों, तो उसे ही अखंड होनेके लिए प्रयत्न करें ।

आप यदि नया-नया नामजप आरंभ करनेवाले हैं, तो कुलदेवीका (उदा. ‘श्री दुर्गादेव्यै नमः ।’), कुलदेवी मालूम नहीं हैं, तो ‘‘श्री कुलदेवतायै नमः ।’ ऐसा नामजप दिनमें अधिकाधिक करें । उसी प्रकार पूर्वजोंका कष्ट न हो अथवा थोडा-बहुत ही हो, तो प्रतिदिन १ से २ घंटे, मध्यम कष्ट हो तो प्रतिदिन २ से ४ घंटे एवं तीव्र कष्ट हो, तो प्रतिदिन ४ से ६ घंटे ‘श्री गुरुदेव दत्त ।’ का नामजप करें । जो साधनाके विषयमें जाननेके इच्छुक हैं, वे सभागृहके पिछले भागमें लगाए गए ‘साधना कक्ष’से उसकी विस्तृत जानकारी ले सकते हैं ।

५ आ. इष्टदेवतासे प्रार्थना कर भाषणका आरंभ एवं अंत करना

सनातन संस्था एवं हिंदू जनजागृति समितिके वक्ता सदैव ही अपने गुरु प.पू. डॉ. आठवले एवं भगवान श्रीकृष्णजीको वंदन करके अपना भाषण आरंभ एवं अंत भी करते हैं । इस कारण अहं न बढनेमें सहायता होती है । अहं अल्प होनेसे इष्टदेवताका आशीर्वाद प्राप्त होता है । आप भी अपने इष्टदेवताका नाम लेकर ही भाषणका प्रारंभ तथा अंत करनेसे क्या प्रतीत होता है, इसका अनुभव ले सकते हैं ।

५ इ. हिंदू राष्ट्रकी स्थापनाके लिए प्रतिदिन प्रार्थना करना

धर्म एवं राष्ट्र रक्षाके लिए किसी अन्य संगठनका उपक्रम एवं आंदोलन हो रहा हो, तो उसकी सफलताके लिए उपास्यदेवतासे प्रार्थना करें । उसी अनुसार हिंदू राष्ट्रकी स्थापनाके लिए प्रतिदिन प्रार्थना करें ।

योगगुरु रामदेवबाबा एवं अण्णा हजारेजीके अथवा अन्य किसीका भी राष्ट्र एवं धर्म हितके लिए आंदोलन हो, तो सनातनके साधक, संत एवं हिंदू जनजागृति समितिके कार्यकर्ता प्रार्थना एवं नामजप करते हैं । ये दोनों संगठन इस अधिवेशनकी सफलताके लिए गत माहसे प्रार्थना एवं नामजप कर रहे हैं । इसके साथ ही उन्होंने अधिवेशनकी सफलताके लिए संतोंके आशीर्वाद भी प्राप्त किए हैं ।

यह अधिवेशन समाप्त होनेके उपरांत १४ जूनसे प्रतिदिन ऐसी प्रार्थनाएं करना आरंभ करेंगे !

 

६. धर्माभिमान निर्माण होनेके लिए धर्माचरण भी करें !

        साधनाके साथ-साथ धर्माचरण एवं आचारधर्मका पालन करना भी महत्त्वपूर्ण है । हिंदू संस्कृतिके विविध उपासनामार्ग, त्यौहार, आचार-विचार, आहार-विहारकी पद्धति इनसे ही नहीं, अपितु दैनंदिन जीवनकी प्रत्येक कृतिसे ही सत्त्वगुण बढे, अर्थात साधना हो, ऐसी योजना हिंदु धर्ममें है । यह हिंदु धर्मकी अद्वितीय विशेषता है । हिंदु धर्मके अनुसार आचरण करना, ईश्वरके समीप जाने समान है ।

दैनंदिन धार्मिक कृति, उदा. पूजा-अर्चना, आरती, प्रासंगिक त्यौहार एवं उत्सव शास्त्र समझकर मनाना; उसी प्रकार कुलाचारका पालन, कुलके रीति-रिवाजों एवं परंपराओंको संजोना, इसीको ‘धर्माचरण’ कहते हैं ।

६ अ. धर्माचरणके समान अन्य कुछ कृत्य

१. हस्तमिलाप न कर, हाथ जोडकर नमस्कार करें ।

२. जन्मदिन दिनांकानुसार नहीं, अपितु तिथि अनुसार एवं आरती करके मनाएं ।

३. स्त्रियां प्रतिदिन गोल कुमकुम एवं पुरुष कुमकुमका तिलक लगाकर ही घरसे बाहर निकलें ।

४. केवल किसी मंगल अवसरपर ही नहीं, अपितु सामान्यतः हिंदू संस्कृतिके अनुसार कपडे परिधान करें ।

५. दूरभाष / भ्रमणभाषपर (मोबाईलपर) बोलते समय ‘हैलो’ नहीं, अपितु `नमस्कार’ अथवा `जय श्रीराम’ कहें ।

६. दिनभरमें एक बार तो मंदिर जाकर भगवानके दर्शन करें ।

७. वर्षमें एक बार कुलाचारके लिए कुलदेवताके दर्शनके लिए जाएं ।

ये नियमित धर्माचरणके कुछ कृत्य हैं । ये कृत्य बस केवल करनेके लिए करना है, ऐसा न होकर धर्मशास्त्र समझकर करनेसे उनका हमें अधिक आध्यात्मिक लाभ होता है । धर्मरक्षाके कार्यमें धर्माचरणको एक कर्तव्य समझकर करना चाहिए । धर्मानुसार स्वयं आचरण करना चाहिए एवं धर्माचरणका कार्यकर्ताओं तथा हिंदू समाजमें भी प्रसार करना चाहिए ।

नामजप आरंभ करनेके उपरांत कुछ विशेष अनुभूति हुई हों, तो उसे लिखकर हमें भेजें । समाजको साधनाका महत्त्व बतानेके लिए नियतकालिक एवं संकेतस्थलके माध्यमसे भी हम उन्हें प्रकाशित करेंगे ।

 

७. हिंदू राष्ट्रकी स्थापनामें साधनाकी आवश्यकता

        अबतक हुई चर्चासे हमने ‘हिंदुओंके इतिहासमें ब्राह्मतेजका स्थान’, ‘हिंदुत्ववादियोंमें ब्राह्मतेज निर्माण होनेके लिए साधना करनेका महत्त्व’ तथा ‘साधना कौन सी करनी चाहिए ?’, यह विषय समझ लिया । अब जिस हिंदू राष्ट्र स्थापनाके ध्येयसे हम एकत्र आए हैं; उसके संदर्भमें साधनाकी आवश्यकता क्या है, यह विषय समझ लेंगे ।

हम सभी हिंदुत्ववादियोंका मुख्य ध्येय ‘हिंदू राष्ट्रकी स्थापना’ है । हिंदू राष्ट्रकी स्थापना करना, अर्थात राष्ट्रकी पुनर्रचना करना ! राष्ट्ररचना, यह एक शास्त्रीय प्रक्रिया है तथा उसमें केवल सत्यको ही स्थान है । यह कार्य कौन कर सकता है, अब हम यह देखेंगे ।

७ अ. हिंदू राष्ट्रकी स्थापना करनेके लिए आजके राजनेता अपात्र क्यों हैं ?

आजके राजनेता असत्यका रूप हैं । भ्रष्टाचार, स्वार्थ, अनैतिकता, व्यभिचार ऐसे दुर्गुण राजनेता एवं उनके कार्यकर्ताओंमें हैं । इस कारण राजनेताओंद्वारा ‘राष्ट्ररचना’ होना सर्वथा असंभव है । राजनेताओंको असीम सत्ता चाहिए । इसके विपरीत राष्ट्ररचनाके लिए निःस्वार्थ, प्रसिद्धीकी लालसा न होना, त्याग इत्यादि गुणोंकी आवश्यकता होती है । ये गुण ईश्वरकी भक्ति एवं धर्मरक्षाके लिए कार्य, इन दो अंगोंद्वारा प्रयत्न करनेवाले साधकोंके पास ही होता है । इस कारण धर्मनिष्ठ हिंदू कार्यकर्ता ही हिंदू राष्ट्र स्थापित कर सकते हैं ।

७ आ. हिंदू राष्ट्रकी स्थापनाके लिए सभी हिंदुत्ववादी कार्यकर्ता सक्षम हैं क्या ?

हम सभी समाजके विविध व्यक्तियोंको संगठित करके धर्मरक्षाका कार्य कर रहे हैं । धर्मरक्षाके लिए संगठित हुए व्यक्ति भले ही हिंदुत्ववादी विचारधाराके हों, तब भी प्रत्येककी प्रवृत्ति, विचारधारा भिन्न-भिन्न होती है, यह आपने भी अनुभव किया ही होगा । हिंदुत्ववादी कार्यकर्ताओंमें से कुछ लोग वाममार्गी, व्यसनी होते हैं । संक्षेपमें जिस प्रकार अनेक राजनीतिक दलोंमें कार्यकर्ता कार्य करते हैं, उसी प्रकार हिंदुत्ववादी संगठनोंमें भी कार्य करते हुए दिखाई देते हैं । ऐसे लोगोंको लेकर हम भीड तो जुटा सकते हैं; परंतु उससे धर्मरक्षा नहीं होगी । हिंदू राष्ट्रकी स्थापनाके लिए ऐसे हिंदुत्ववादी कार्यकर्ता सक्षम सिद्ध नहीं होंगे ।

७ इ. हिंदू राष्ट्रकी स्थापनाके लिए धर्मनिष्ठ हिंदुओंकी आवश्यकता !

धर्मनिष्ठ हिंदुओंमें जो गुण होते हैं, वे साधना न करनेवाले हिंदुत्ववादी कार्यकर्ता एवं राजनेताओंमें नहीं होते हैं ।

७ इ १. पृथक्करणात्मक बुद्धि : हिंदू राष्ट्र स्थापनाके इस कार्यमें परिस्थितिकी वास्तविक परख करनेके लिए व्यापक पृथक्करणात्मक बुद्धिकी आवश्यकता होती है; सात्त्विक बुद्धि ही ऐसी होती है तथा ईश्वरप्राप्तिके लिए प्रयत्न करनेवाले व्यक्तिकी ही बुद्धि सात्त्विक होती है ।

७ इ २. दूरगामी दृष्टि : संसारकी अगली गतिविधिका बोध होनेके लिए अंतर्ज्ञानी मनकी आवश्यकता होती है । भविष्यका अनुमान लगानेके लिए दूरदर्शी होना आवश्यक होता है । ऐसी दूरदर्शिता धर्मनिष्ठ कार्यकर्ताओंमें होती है । भविष्यसंबंधी दूरदर्शिता जाने दें; अब तक के भारतीय प्रधानमंत्रियोंको भूतकालकी घटनाओंसे भी पाकिस्तानके बर्तावका बोध नहीं हुआ है ।

७ इ ३. ईश्वर भक्तकी सहायता करते हैं : हिंदू राष्ट्रकी स्थापनामें धर्मनिष्ठ हिंदुओंका महत्त्व महाराष्ट्रके नारायणगांवके एक बडे संत प.पू. काणे महाराजजीने स्पष्टरूपसे कहा है कि, ‘राष्ट्र संकटमें हो अथवा परतंत्र हो, ईश्वर अवतार नहीं लेते । दुष्टोंद्वारा भक्तोंको सताए जानेपर ही ईश्वर अवतार लेते हैं । इसलिए हमें अपनी भक्ति बढानी चाहिए । ईश्वरका समर्थन मिलनेसे हमारा ईश्वरीय राज्यका दिव्य स्वप्न साकार होगा ।’

८. धर्म-अधर्मकी लडाईमें ईश्वरनिष्ठाका महत्त्व

        हिंदु धर्ममें अवतार, महापुरुष, संत-महात्माओंके जीवनमें अधर्मके विरुद्ध लडनेका प्रसंग आए, तो उस समय भी उनकेद्वारा ईश्वरनिष्ठोंको ही संगठित करनेके उदाहरण मिलते हैं ।

८ अ. भगवान श्रीरामचंद्र

प्रभु श्रीरामचंद्रजीने लंकापर चढाई करनेके लिए वानरसेना एकत्र की । वह पूरी वानरसेना भगवान श्रीरामचंद्रजी की भक्त थी ।

८ आ. आद्य शंकराचार्य

सहस्त्रो कापालिक, अर्थात स्मशानअघोरी संप्रदायके साधक प्रतिदिन सहस्त्रो लोगोंकी हत्या कर, उनके शव (पार्थिव शरीर) अपने भगवानको चढाते थे । उस समय आद्य शंकराचार्यने साधकोंकी सेना निर्माण करके कापालिकोंका नाश किया ।

८ इ. राष्ट्रगुरु समर्थ रामदासस्वामी

छत्रपति शिवाजी महाराजजीको मुगलोंसे लडनेके लिए सेना की आवश्यकता थी । उस समय समर्थ रामदासस्वामींजीने उनके पास आनेवाले भक्तोंमें से अनेक लोगोंको महाराजजी की सेनामें भरती होनेके लिए कहा । प्रत्यक्षमें छत्रपति शिवाजी महाराजजीकी सेना भी ईश्वरनिष्ठ थी; इसीलिए शिवाजी महाराजजीने सैनिकोंके साथ ‘हिंदवी स्वराज्य’के स्थापनाकी शपथ श्री रोहिडेश्वरके सामने ली थी ।

 

९. ब्राह्मतेजके बिना हिंदूसंगठन असंभव !

        भारतमें अनेक संगठन हिंदु धर्मका कार्य करते हैं । हिंदु धर्मके विषयमें कुछ करनेकी तीव्र इच्छा इन संगठनोंमे है; परंतु हिंदू समाजके लिए वे बहुत कुछ नहीं कर सके । उनकी ऐसी स्थिति क्यों है ? इसका कारण है उन्होंने सर्व कार्य मानसिक स्तरपर किया है । साधनाका सामर्थ्य न होनेसे उन्हें ब्राह्मतेज, उसी प्रकार ईश्वरका आशीर्वाद नहीं मिल सका । हम ऐसा नहीं करेंगे । ईश्वर राष्ट्रभक्तकी नहीं, अपने भक्तकी सहायता करते हैं, यह ध्यानमें रख, हमें अपनी साधना बढानी चाहिए । इससे हमारे कार्यको ईश्वरका आशीर्वाद मिलेगा !

 

१०. हिंदुत्ववादी कार्यकर्ताओंको भी साधना करनेके लिए प्रवृत्त करें !

        साधनासे आत्मबल जागृत होता है एवं आत्मबल जागृत हुए व्यक्तिसे धर्मकार्य परिणामकारक ढंगसे होता है । इस कारण अपने संगठनके कार्यकर्ताओंको भी साधना करनेके लिए प्रवृत्त करें । इसके लिए संगठनके स्तरपर आप आगे दिए अनुसार प्रयत्न कर सकते हैं ।

अ. संगठनके कार्यकर्तांओंको नामजप साधना करनेके लिए कहें !

आ. संगठनोंकी बैठकोंमें जिस प्रकार उपक्रमोंका ब्यौरा लिया जाता है, उसी प्रकार थोडे समय उन्हें और रोकिए तथा प्रत्येक कार्यकर्तासे सप्ताहभर साधनाके तौरपर क्या प्रयत्न किए, इसका ब्यौरा लें !

इ. संगठनके कार्यकर्ताओंको धर्मशिक्षा मिले, इसके लिए अभ्यासवर्ग आयोजित करें । उन्हें धर्मशिक्षा देनेवाले ग्रंथ, दृश्यश्रव्य चक्रिका उपलब्ध करवाएं ! यदि हिंदुत्ववादी कार्यकर्ताओंको हिंदु धर्मकी श्रेष्ठता समझमें आ गई, तो वे धर्मद्रोही, पाखंडी एवं अन्य धर्मोंके प्रसारकोंके हिंदूविरोधी विचारोंका बौद्धिक खंडन कर सकेंगे ।

ई. हिंदू संगठनके लिए हानिकारक दोषोंका कार्यकर्ताओंको भान करवाएं तथा उन दोषोंको दूर करनेमें उनकी सहायता करें !

साधना करनेवाले व्यक्तिका जीवन धीरे-धीरे नीतिवान एवं चरित्रसंपन्न बनता जाता है । इस कारण यदि उनमें व्यसनाधीनता, अहंकारी वृत्ति, उद्दंडता जैसे दोष होंगे, तो वे भी धीरे-धीरे न्यून होते जाएंगे । साधनाके कारण उनकी व्यक्तिगत आध्यात्मिक उन्नति भी होगी । कार्यकर्ताओंके साधना करनेपर संगठनका कार्य भी गुणात्मक स्तरपर अधिक अच्छा हो रहा है एवं कार्यकर्ताओंकी वृत्तिमें परिवर्तन हो रहा है, ऐसा आपको अनुभव होगा । इस दृष्टिसे आप संगठनके स्तरपर कुछ प्रयत्न करें एवं उसके जो अच्छे अनुभव मिलें, वे हमें अवश्य बताएं । हम आपके ये अनुभव सभीको बताएंगे । इससे अन्य हिंदुत्ववादी संगठनोंको वैसे प्रयत्न करनेके लिए प्रोत्साहन मिलेगा ।

 

११. हिंदू समाज आध्यात्मिक दृष्टिसे उन्नत होनेके लिए प्रयत्न करे !

        अबतक के विषयमें हमने हिंदुत्ववादी नेता एवं कार्यकर्ताओंका साधना करनेका महत्त्व देखा । हम राजनेताओं समान अपना अथवा अपने संगठनका विचार करके ही नहीं रुक सकते । हमारे प्रयत्न समाजके उद्धार हेतु हैं । जन्म-जन्मका कल्याण करनेवाली साधना समाजतक पहुंचे, इसके लिए हमारे प्रयत्न होने चाहिए ।

 

१२. हिंदू समाजको धर्मशिक्षा देनेकी आवश्यकता !

        भारतभूमिपर एक आदर्श राष्ट्रकी अर्थात हिंदू राष्ट्रकी पुनर्रचना करना, यह हमारा ध्येय है । जब कभी आदर्श राज्यका विषय आता है, तब प्रभु श्रीरामचंद्रजीका रामराज्य हमारी दृष्टिके सामने आता है । सभीको ईर्ष्या हो, ऐसे राजा, रामराज्यकी प्रजाको मिले थे । ऐसे आदर्श राजा उस समयकी प्रजाको ही क्यों मिले ? इसका सबसे महत्त्वपूर्ण कारण यह है कि रामराज्यकी प्रजा धर्माचरणी थी; इसीलिए उसे श्रीरामसमान सात्त्विक राजा मिले तथा वे आदर्श रामराज्य उपभोग सके । पूर्वके समान ही रामराज्य, अर्थात हिंदू राष्ट्र अब भी अवतरित हो सकता है । इसके लिए हिंदू समाजको धर्माचरणी एवं ईश्वर भक्त बनना चाहिए ।

पूर्वकालमें बहुसंख्य लोग साधना करते थे, अनेक लोग सात्त्विक थे । कलियुगमें बहुसंख्य लोग साधना नहीं करते, इसलिए रज-तम बहुत बढ गया है । इसीके परिणामस्वरूप राष्ट्र एवं धर्मकी स्थिति इतनी बिकट हो गई है । इसे बदलनेके लिए प्रत्येकको वैयक्तिक एवं समाजके लिए साधना करना अत्यंत आवश्यक है । व्यष्टि साधनाके कारण प्रत्येक व्यक्तिकी सात्त्विकता बढेगी ।

 

१३. हिंदुओंका अपने ही धर्मके बारेमें अज्ञान एवं गलत धारणाएं

        हिंदू समाजको धर्माचरणी बनाना हो, तो हिंदु धर्मकी वर्तमानस्थिति समझना अत्यंत आवश्यक है । अन्य धर्मियोंको धर्मशिक्षा देनेके लिए उनके प्रार्थनास्थलोंमें उनके धर्मगुरु होते हैं, उदा. चर्चमें पाद्री एवं मस्जिदोंमें मौलवी अपने-अपने धर्मावलंबियोंको धर्मशिक्षा देते हैं । इस कारण ईसाइयोंको ‘बायबल’ एवं मुसलमानोंको ‘कुरान’की थोडी-बहुत जानकारी होती है । इसके विपरीत हिंदुओंको ‘गीता’के बारेमें क्या ज्ञान है ? गीताका केवल पठन करनेवाले भी अल्प हैं; पढकर उसे समझनेवाले तो अत्यंत ही अल्प हैं तथा पढकर उसे अपने आचरणमें उतारनेवाला तो लाखोंमें एक ही होगा । यह है हमारे हिंदु धर्मकी दयनीय स्थिति !

व्यावहारिक शिक्षाका तथा अध्यात्मविषयक अज्ञानका कोई संबंध नहीं है । अशिक्षित, प्राथमिक शिक्षा प्राप्त, माध्यमिक शिक्षा प्राप्त, स्नातक अथवा स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त, ऐसे प्रत्येक गुटमें लगभग ८० प्रतिशत लोगोंको अध्यात्मविषयक खरी शिक्षा न होनेके कारण उसके विषयमें उनमें अज्ञान ही होता है । वर्तमानमें हिंदुओंको धर्मशिक्षा देनेवाली व्यवस्था ही उपलब्ध नहीं है । ऐसी व्यवस्था हमें निर्माण करनी होगी ।

 

१४. हिंदुओको धर्मशिक्षा न मिलनेके कारण हुई हानि !

१४ अ. अंधश्रद्धा : समाजके २० प्रतिशत व्यक्तियोंमें अंधश्रद्धा दिखाई देती है ।

१४ आ. अनुचित लाभ उठाना : अध्यात्मके नामपर धन अर्जित करनेका धंधा सामान्यत: ५ प्रतिशत लोग करते हैं ।

१४ इ. धोखाधडी : साधु-संतोंमें कुल मिलाकर लगभग ३० प्रतिशत ढोंगी होते हैं । साधुत्वके नामपर वे पैसे कमाते हैं । ५० प्रतिशत अपनेको साधु-संत कहनेवालोंको धर्मका ज्ञान ही नहीं होता ।

१४ ई. साधनाके बारेमें गलत धारणा : समाजजीवनकी दृष्टिसे अध्यात्म, एक प्रगतिविरोधी वृत्ति है, वह एक पलायनवाद आहे, ऐसा अनेक वैचारिक क्रांतिकारियों एवं समाजसुधारकोंका मत है । आज भी ऐसा माननेवाले अनेक आधुनिकतावादी हैं । अब इतनेसे ही ‘अध्यात्म मूलत: समाजविरोधी आहे’, ऐसा मानना उचित नहीं होगा; इसलिए कि अध्यात्मवादी पुरुषोंने जगतमें महानताका आदर्श समयसमयपर विश्वके समक्ष रखा है एवं समाजमनको उस आदर्शकी ओर जानेका आवाहन भी किया है ।

१४ उ. स्वधर्मका तिरस्कार एवं अन्य धर्मोंका आकर्षण : धर्मशिक्षा न होनेके कारण नई पीढीको हिंदु धर्म जीर्ण लगने लगा है । हिंदू संस्कृति अनुसार आचरण करना, उन्हें पिछडापन लगता है । इस कारण हिंदुओंकी नई पीढी पश्चिमी सभ्यताका अंधानुकरण कर रही है । उन्हें अन्य धर्म, उनके रीति-रिवाज, विदेशी भाषा श्रेष्ठ लगने लगी है । इस कारण हिंदुओंकी नई पीढी पश्चिमी सभ्यताके अंधानुकरणसे निर्माण होनेवाली नीतिशून्यताके दलदलमें धंस गई है । समलैंगिकता, कथित आधुनिकतावाद, साम्यवाद, समाजवाद, क्रूरता, गुंडागिरी, अत्याचारी प्रवृत्ति इत्यादि ये सब वर्तमानकी समाजव्यवस्थामें निर्माण हुए दोष, समाजको पश्चिमी संस्कृतिके आकर्षणकी देन हैं ।

१४ ऊ. हिंदुओंद्वारा ही हो रही धर्महानि !

१. त्यौहार, धार्मिक उत्सव कैसे मनाने चाहिए, यह हिंदू समझते नहीं । इस कारण आजकलके त्यौहार, धार्मिक उत्सवोंकी पवित्रता भंग हो गई है तथा उनकी ओर मौज-मजा करनेका एक अवसर, इस दृष्टिसे देखा जाने लगा है । धार्मिक उत्सवोंमें बलपूर्वक चंदावसूली, अश्लील नाच-गाना, मद्यपान, धूम्रपान, महिलाओंके साथ छेडछाड, ऐसे घटनाएं आम होती जा रही हैं ।

२. हिंदुओंको देवताओंकी पवित्रता कैसे बनाए रखें, यह पता नहीं । इस कारण कोई थूके नहीं, इसलिए सीढियोंपर देवताओंके चित्र लगाए जाते हैं । विज्ञापनोंमें देवताओंका ‘मॉडेल’समान उपयोग होता है । नाटक, चलचित्र, समाचार पत्र इनकेद्वारा हिंदु धर्म, देवता, धर्मपुरुषोंका उपहास उडाया जाता है । ‘हिंदू’ एक गाली हो गई है ।

३. हिंदू समाज परधर्मियोंद्वारा धर्मांतर, लव जिहाद इत्यादि षडयंत्रोंका शिकार हो रहा है ।

४. हिंदू गोमाताका महत्त्व ही भूल गए हैं । इस कारण कसाइयोंको गाय बेचनेवालोंमें अधिकांश हिंदू ही होते हैं ।

५. मंदिरोंका आध्यात्मिक महत्त्व न समझमें आनेके कारण मंदिर अस्वच्छ रहनेमें हिंदू ही कारणीभूत होते हैं । मंदिरोंमें चलचित्रोंके गाने लगानेवाले, जुआ खेलनेवाले तथा मद्यपान करनेवाले हिंदू ही होते हैं ।

६. राजनेताओंद्वारा बनाया गया कानून, उनकेद्वारा अपनाई गई नीतियोंके कारण, धार्मिकदृष्टिसे हमारी क्या हानि होनेवाली है, इसका हिंदुओंको आकलन ही नहीं हो रहा है ।

इन सर्व धार्मिक समस्याओंका सामना मुसलमानोंको नहीं करना पडता । अपितु ऐसा कहना अधिक योग्य होगा कि इस प्रकारकी समस्याएं उनके संदर्भमें कभी निर्माण ही नहीं हुई; इसका कारण यह है कि उन्हें बचपनसे ही उनके अपने धर्मकी शिक्षा दी जाती है । इसलिए वे अपने धर्मके प्रति अत्यंत सजग होते हैं । इसके विपरीत हिंदुओंको धर्मशिक्षा ही नहीं दी जाती । इस कारण उनमें धर्मविषयक सजगता होनेकी संभावना नहीं होती ।

 

१५. हिंदुओंको धर्मशिक्षा देना, यह धर्मविषयक समस्याओंका समूल उच्चाटन करनेका परिणामकारक मार्ग !

         हम धर्मरक्षाके लिए विविध कृत्य करते हैं । उनमेंसे अधिकांश शारीरिक एवं मानसिक स्तरके होते हैं, उदा. धर्मांतरके लिए प्रयत्न करनेवाले पादरियोंको रोकना अथवा हत्याके लिए ले जाई जा रही गायोंका परिवहन रोकना, ऐसे उपक्रमोंमें ही हम उलझे रहते हैं । ये उपक्रम तात्कालिक उपाययोजनाके रूपमें योग्य हैं; परंतु ये दीर्घकालीन उपाययोजना नहीं हैं । हम कब तक इन पादरियोंको भगाना अथवा हत्याके लिए ले जाई जा रही गायोंका परिवहनको रोक सकते हैं ? आज एक स्थानसे पादरियोंको भगाया, तो वे दूसरी ओर जाकर धर्मप्रसार करेंगे अथवा एक स्थानपर गायोंका परिवहन रोका, तो दूसरी ओर आरंभ हो जाएगा । इन सर्व धार्मिक समस्याओंपर दीर्घकालीन उपाय एक ही है और वह है सर्वत्रके हिंदुओंको धर्मशिक्षा देना । हिंदू अपने धर्मका महत्त्व समझ जाएंगे, तो उनके पास भले ही कितनी भी संख्यामें पादरी आएं, वे उन्हें कितना भी प्रलोभन दें, तब भी वे पादरियोंके धर्मांतरके षडयंत्रकी बलि नहीं चढेंगे; हिंदू किसान गायोंको कसाईके हाथों नहीं बेचेंगे तथा हिंदू किशोरियां ‘लव जिहाद’की बलि नहीं चढेंगी । विज्ञानकी भाषामें हिंदु धर्मका प्रत्येक सूत्र कितना परिपूर्ण है, यह आजकी युवा पीढीको यदि बताया जाए, तो वह धर्माचरण करेगा । पश्चिमी सभ्यताका अंधानुकरण एवं उसके दुष्परिणामोंके दुष्चक्रसे युवा पीढी मुक्त होगी । धर्माचरणके कारण हिंदुओंमें धर्माभिमान जागृत होगा । धर्माभिमान जागृत हुआ समाज ही धर्मरक्षा करता है और महत्त्वपूर्ण यह है कि ऐसा जागृत समाज धर्महानि होने ही नहीं देता । ऐसे धर्मनिष्ठ राष्ट्रको प्राकृतिक विपदाएं, परचक्र आदि कोई भी भय नहीं होता है । वह राष्ट्र, आनंदी, नीतिमान एवं समृद्ध होता है ।

जब संपूर्ण मानवजाति धर्माचरण करने लगेगी, तब संपूर्ण पृथ्वीपर सत्ययुग जैसा राष्ट्र अवतरित होगा । यहां राष्ट्र एवं धर्ममें अद्वैत होता है । ऐसा ही राष्ट्र चिरंतन होता है ।

इससे समाजको धर्मशिक्षा देनेका महत्त्व हमारे ध्यानमें आता है ।

 

१६. हिंदुओंको धर्मशिक्षा देनेका दायित्व हिंदुत्ववादी संगठनोंको पितृभावनासे स्वीकारना चाहिए !

         चर्चमें पादरी एवं मस्जिदोंमें मौलवी अपने-अपने धर्मियोंको धर्मशिक्षा देते हैं; परंतु हिंदुओंको धर्मशिक्षा देनेकी कोई भी व्यवस्था वर्तमानमें नहीं है । आजके निधर्मी राजनेता हिंदुओंको धर्मशिक्षा देनेके लिए कुछ करेंगे, ऐसी अपेक्षा ही नहीं रख सकते । फिर यह कार्य करेगा कौन ? ‘जो दिखाई दे, वही है कर्तव्य’ इस भावनासे यदि हिंदुत्ववादी संगठन ही हिंदुओंको धर्मशिक्षा देनेके लिए कुछ प्रयत्न करें, तभी वर्तमानस्थितिमें यह कार्य हो सकेगा । वर्तमानमें परिस्थिति ऐसी है कि हिंदू समाजका कोई रक्षक नहीं है । इस कारण हिंदू समाजका पितृत्व अब हमारे जैसे हिंदुत्वनिष्ठ संगठनको ही स्वीकारना चाहिए । पिता जैसे अपने बच्चोंका सर्वांगीण विकास करनेके लिए प्रयत्न करते हैं, ऐसी ही भूमिका हमें हिंदू समाजके बारेमें रखनी चाहिए । हम सभी धर्मरक्षाके लिए कुछ न कुछ तो करते हैं । अब हिंदुओंको धर्मशिक्षा देनेके लिए कुछ करेंगे, तो ये प्रयत्न पूर्णत्वकी ओर जाएंगे ।

 

१७. हिंदुओंको धर्मशिक्षा देनेके लिए चलाए जानेवाले उपक्रम

         हिंदू समाज एवं आजकी सामाजिक परिस्थितिका विचार करते हुए हिंदुओंको धर्मशिक्षा देनेके लिए अलग पद्धतिसे प्रयत्न करने चाहिए । इसके लिए कुछ प्रयत्न इस प्रकार कर सकते हैं ।

१७ अ. प्रवचन : हिंदु धर्मका महत्त्व, प्रतिदिन साधना करनेका महत्त्व, किसी त्यौहारकी पार्श्वभूमिपर ‘वह त्यौहार धर्मशास्त्रकी दृष्टिसे कैसे मनाएं एवं उसका महत्त्व क्या है’, ऐसे अलग अलग विषयोंपर गुटोंके लिए प्रवचनोंका आयोजन कर सकते हैं ।

१७ आ. साप्ताहिक धर्मसत्संग : जिस स्थानपर बडी मात्रामें हिंदू जिज्ञासु हैं, वहां साप्ताहिक धर्मसत्संग आयोजित कर सकते हैं ।

१७ ई. नियतकालिक : आपके संगठनका कोई नियतकालिक तथा पत्रिका आदी होंगे, तो उसमें ‘धर्मशिक्षा’ यह स्तंभ नियमित आरंभ कर सकते हैं ।

१७ इ. बालसंस्कारवर्ग : बडोंके समान छोटोंपर भी धर्मका संस्कार होना आवश्यक है । बालकोंके लिए साप्ताहिक बालसंस्कारवर्ग आयोजित करना महत्त्वपूर्ण है । ऐसे बालसंस्कारवर्गसे बच्चोंको सायंकालमें कौन सी प्रार्थना करनी चाहिए, बडोंसे कैसा आचरण करना चाहिए, विविध गुण पानेके लिए कैसे प्रयत्न करने चाहिए, इस विषयमें मार्गदर्शन कर सकेंगे ।

१७ उ. जालस्थान (वेबसाईट) : आपके संगठनका जालस्थान हो, तो धर्मशिक्षाके स्तंभ संकेतस्थलद्वारा भी आरंभ कर सकते हैं ।

१७ ऊ. दृश्यव्य माध्यम : दृश्यश्राव्य (ऑडियो-वीडियो) माध्यम यह आजके युगका अत्यंत गतिमान माध्यम है । इस माध्यमद्वारा अत्यंत अल्प अवधिमें हम अनेक लोगोंतक परिणामकारक ढंगसे पहुंच सकते हैं । इस माध्यमसे भी हम हिंदुओंको धर्मशिक्षा दे सकते हैं । धर्मशिक्षा देनेवाली सीडी (दृश्यश्रव्य-चक्रिकाद्वारा) अथवा स्थानीय केबल (प्रणालोंद्वारा (चैनलोंद्वारा) भी प्रसारित की जा सकती है । यदि यह सब संभव ही न हो, तो उस स्थानपर २०-२५ लोगोंको एकत्र करके, उन्हें धर्मशिक्षा देनेवाली दृश्यश्रव्य चक्रिका दिखाई जा सकती हैं । ऐसी धर्मशिक्षा देनेवाली दृश्यश्रव्य चक्रिकाओंकी अनेक शृंखला हिंदू जनजागृति समितिने बनाई हैं । उनका उपयोग हम समाजको धर्मशिक्षा देनेके लिए कर सकते हैं । उसी अनुसार उपरोक्त उपक्रमोंके विषयमें आपको आवश्यक सहायता करनेके लिए समिति उत्सुक है ।

 

१८. धर्मशिक्षाके उपक्रमोंसे ही प्रभावकारी हिंदूसंगठन एवं हिंदु धर्म प्रसार होगा !

         ‘हिंदू जनजागृति समिति’ एवं ‘सनातन संस्था’ अपनी स्थापनासे ही हिंदुओंको धर्मशिक्षा देनेवाला उपक्रम चला रही हैं । इस कारण इन दोनों संगठनोंके कार्यमें अनेक हिंदू सम्मिलित होते गए । इन दोनों संगठनोंका कार्य अल्पावधिमें बढानेके लिए धर्मशिक्षाके उपक्रम प्रमुख माध्यम बन गए हैं । इन दोनों संगठनोंपर जब-जब संकट आया, उस समय इन संगठनोंके कार्यकर्ता एवं साधक बिना डगमगाए डटे रहे । इसका मुख्य कारण है उन्हें धर्मशिक्षा वर्गसे मिलनेवाली सीख ।

‘स्पिरिच्युअल सायन्स रिसर्च फाऊंडेशन’ इस जालस्थान (वेबसाईट)के माध्यमसे सनातन संस्थाके शोधका प्रसार किया जाता है । यह जालस्थान अब विश्वके १९६ देशोंमें देखा जा रहा है । इसे देखकर ऐसे-ऐसे हिंदू भी धर्माचरण कर रहे हैं जिन्हें कभी कोई धर्मशिक्षा नहीं मिली । केवल हिंदू ही नहीं अपितु, अन्य धर्मीय भी हिंदु धर्मानुसार आचरण कर रहे हैं । स्वामी विवेकानंदजीने वेदांतका अभ्यास कर, विश्वभर हिंदु धर्मका प्रसार किया, यह हमें ध्यानमें रखना चाहिए । हिंदुओंका संगठन एवं धर्मप्रसार, धर्मशिक्षा देनेके उपक्रमसे ही परिणामकारकरूपसे साध्य हो सकता हैं ।

किसीका नाम किसी गलीमें विख्यात हो, तो वह उस गलीमें कार्य कर सकता है । किसीका नाम किसी गांवमें विख्यात हो, तो वह उस गांवमें कार्य कर सकता है । किसीका नाम किसी जिलेमें विख्यात हो, तो वह उस जिलेमें कार्य कर सकता है । किसी संगठनका नाम किसी राज्यमें विख्यात हो, तो वह उस राज्यमें कार्य कर सकता है । किसी संगठनका नाम किसी राष्ट्रमें विख्यात हो, तो वह उस राष्ट्रमें कार्य कर सकता है । इसके विपरीत, साधनाके संदर्भमें हिंदु धर्म पूरे विश्वका मार्गदर्शन कर सकता है ! यह जाननेपर, किसीमें भी कार्यके संदर्भमें अहंभाव निर्माण नहीं होता । हमारे कारण नहीं, अपितु ‘हिंदु धर्म’ इन शब्दोंके चैतन्यके कारण कार्य होता है । ऐसा होनेपर, उसे ईश्वरका आशीर्वाद मिलता है एवं कार्यमें सफलता मिलती है । उसके साथ व्यक्तिकी आध्यात्मिक उन्नति भी होती है ।

१९. विश्वभरमें हिंदु धर्मके प्रसारकी आवश्यकता

         आगे हमें संपूर्ण विश्वका विचार करना है । हमारे पूर्वजोंने ‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम् ।’, अर्थात ‘अखिल विश्वको आर्य, अर्थात सुसंस्कृत बनाएंगे’, ऐसी घोषणा की थी एवं उसे पूरा भी कर दिखाया था । द्वापारयुगतक पृथ्वीपर एक ही सनातन धर्म था । इस कारण पृथ्वीपर मानव सुखी था । अब मनुष्यको सुखी करनेके लिए जगभरमें हिंदु धर्मकी स्थापना करना आवश्यक हो गया है तथा यह समाजको धर्मशिक्षा देनेके उपक्रमोंसे साध्य हो सकता है । यहां ध्यानमें रखना चाहिए कि अन्य धर्मियोंका प्रचार केवल अपने धर्मियोंका जगभर राज्य स्थापित करनेके लिए होता है । इसके विपरीत हिंदुओंका प्रचार अखिल मानवजातिका कल्याण करनेके लिए होता है ।

हमें भी इसी दिशामें प्रयत्न करना चाहिए । स्वयं साधना करके आत्मबलसंपन्न बनें । कार्यकर्ताओंको धर्माचरणका महत्त्व बताकर, उनसे वह करवा लें तथा हिंदु समाजको भी धर्मशिक्षा देकर उसे धर्माचरणी एवं आदर्श हिंदु राष्ट्रके लिए योग्य बनानेका प्रयास करें । आपसे विनती करता हूं कि इस दृष्टिसे आप सभीके प्रयत्न हों । इसके साथ ही प्रयत्न करते समय कुछ अडचनें आएं, तो वे भी दूर हों, ऐसी अपने गुरुके चरणोंमें प्रार्थना करते हुए मैं अपना विषय समाप्त करता हूं ।

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