क्या हिन्दू राष्ट्र की मांग करना हिन्दुआें का संवैधानिक अधिकार है ?

‘हिन्दू राष्ट्र’ इस शब्द का उच्चारण करते ही आधुनिकतावादी, धर्मनिरपेक्षतावादी, अन्य पन्थी और प्रसारमाध्यम ऐसा कोलाहल करने लगते
हैं कि ‘हिन्दू राष्ट्र की मांग असंवैधानिक है ।’ संविधान का अधूरा ज्ञान रखनेवाले यह समझ लें कि ‘हिन्दू राष्ट्र की मांग असंवैधानिक नहीं, अपितु संवैधानिक ही है ।’

अ. देश के मूल संविधान में ‘सेक्यूलर’ शब्द नहीं था । इंदिरा गांधी ने वर्ष १९७६ में ४२ वां संशोधन कर संविधान में ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘समाजवाद’, ये शब्द घुसाए थे ।

आ. १ अगस्त २०१५ तक देश के संविधान में १०० बार संशोधन किया जा चुका है । संविधान संशोधन कर यदि भारत को ‘धर्मनिरपेक्ष’ राष्ट्र बनाया जा सकता है, तब संविधान संशोधन के माध्यम से भारत को ‘हिन्दू राष्ट्र’ क्यों नहीं बनाया जा सकता ?

इ. संविधान हिन्दुआें को ‘अपना मत रखने तथा उसका चार करने का’ अधिकार देता है । अतः ‘हिन्दू राष्ट्र के सिद्धान्त का चार करना’, हिन्दुआें का संविधानदत्त अधिकार ही है ।

ई. ‘हिन्दू राष्ट्र’ शब्द ‘संवैधानिक है अथवा असंवैधानिक’, यह कोई प्रश्‍न ही नहीं है । यह तो सम्पूर्ण समाज और राष्ट्र के पुनरुत्थान की क्रिया है । संविधान की सीमा में रहकर समाज और राष्ट्र के हित का विचार स्तुत करना पूर्णतः संवैधानिक है । संविधान ने कानून की सीमा में रहकर राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक आदि परिवर्तन करने की पूरी छूट दे रखी है । यदि ऐसा परिवर्तन हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के लिए हो, तो उसमें कुछ अनुचित होने का प्रश्‍न ही नहीं है । जबतक हिन्दू राष्ट्र की स्थापना का विचार स्तुत करनेवाले लोग कोई असंवैधानिक कार्य नहीं करते; तबतक उन्हें असंवैधानिक कहना, उनपर अन्याय करना है ।

उ. संविधान के अनुच्छेद ३६८ के पहले प्रावधान में स्पष्ट लिखा है कि ‘इस अनुच्छेद में दी कार्यपद्धति के अनुसार, देश की संसद को संवैधानिक अधिकारों का उपयोग कर संविधान के किसी भी अनुच्छेद में परिवर्तन, संपादन अथवा निरसन कर संशोधन करने का अधिकार है ।’

इससे स्पष्ट होता है कि हिन्दू राष्ट्र की मांग करना हिन्दुआें का संवैधानिक अधिकार है ।

संदर्भ : सनातन का ग्रंथ, ‘हिन्दू राष्ट्रकी स्थापनाकी दिशा


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