श्राद्धविधिमें उपयुक्त सामग्री एवं उसका शास्त्रीय आधार

सारिणी


श्राद्धके लिए पूजाविधिमें सर्वसामान्यतः उपयोगमें लाई जानेवाली सामग्री जैसे ताम्रपात्र, आचमनी, धूप, दीप, सुपारी, नारियल, घी इत्यादि के अतिरिक्त अन्य महत्त्वपूर्ण एवं आवश्यक घटक हैं, दर्भ, माका अर्थात भृंगराज पत्र, तुलसी, काले तिल, श्वेत चावल, सत्तू, मधु, उडद इत्यादि । श्राद्धविधिके लिए पुष्पोंका चयन करते समय श्वेत रंगके सुगंधित पुष्प प्रधानतासे चुनने चाहिए ।

श्राद्धविधिमें उपयुक्त सामग्री दृश्यपट (Substances used in Shraddha Video)

१. दर्भ (कुश)

Darbha

दर्भ, घासका एक प्रकार है । श्राद्धविधिमें यह एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण घटक है । दर्भके बिना श्राद्धकर्म नहीं किया जाता ।

१ अ. दर्भके बिना श्राद्धकर्म न करनेका कारण

दर्भ तेजोत्पादक है, अर्थात तेजकी उत्पत्तिके लिए कारक एवं पूरक है । श्राद्धविधिमें दर्भका उपयोग करनेसे, दर्भसे प्रक्षेपित तेजोमय तरंगोंके प्रभावसे श्राद्धके प्रत्येक विधिकर्ममें रज-तम कणोंका हस्तक्षेप घट जाता है । श्राद्धविधिके कर्मको गति प्राप्त होती है  तथा अनिष्ट शक्तियोंका आक्रमण भी अल्प होता है । इसी कारण पितर इस विधिसे एक विशिष्ट स्तरकी ऊर्जा ग्रहण कर आगेकी गति प्राप्त कर सकते हैं । अत:  दर्भके बिना श्राद्धकर्म नहीं किया जाता ।

१ आ. श्राद्ध विधिमें दर्भके उपयोगका परिणाम

दर्भमें तेजकणोंसे संबंधित सुप्त वायु होती है । श्राद्धविधिके मंत्रोच्चारणसे दर्भकी तेजतत्त्वरूपी वायु कार्यरत रहती है । यह वायु बाह्य वायुमंडलके वायुतत्त्वकी सहायतासे ऊर्ध्व अर्थात ऊपरकी दिशामें गतिमान होती है । इस वायुके माध्यमसे मंत्रोच्चारणद्वारा संचारित तप्तऊर्जाका ऊर्ध्व अर्थात ऊपरकी दिशामें गमन होता है । इससे श्राद्धविधिमें किया गया संकल्प अल्पावधिमें सिद्ध होता है ।

१ इ. दर्भका चयन कैसे किया जाता है ?

रास्तेपर पडे, चितापर रखे, यज्ञभूमिके तथा श्राद्धविधिमें पहले आसन तथा आच्छादन एवं पिंंडके उपयोगमें लाए गए दर्भका उपयोग श्राद्धविधिमें न कीजिए । उसी प्रकार ब्रह्मयज्ञमें अथवा तर्पणके लिए पूर्व उपयोग किया दर्भ भी न चुनिए । जिस स्थानपर दर्भ उगा है, उस स्थानपर यदि कोई मूत्र अथवा शौच विसर्जन करता है, तो उस स्थानका दर्भ न लीजिए । स्वच्छ स्थानपर उगा दर्भ ही चुनिए । यथासंभव श्राद्धके लिए हरे दर्भको चुनना चाहिए । दर्भके चयनसंबंधी एक श्लोक में बताया है,

‘समूलस्तु भवेत् दर्भः पितृणां श्राद्धकर्मणि ।’
अर्थात पितरोंके श्राद्ध हेतु मूल समेत दर्भ लें ।

१ र्इ. श्राद्धमें समूल दर्भके उपयोगका कारण

समूल दर्भमें आपतत्त्वयुक्त तेज कणोंका प्रमाण अधिक होता है । ये तेजयुक्त कण रज-तम कणोंके विघटनके लिए पोषक होते हैं । समूल दर्भसे किए गए कृत्यसे प्रक्षेपित ऊर्जा तेजोमय तथा अधिक प्रवाही बनती है । यह ऊर्जा पितरोेंके कोषोंको अल्पावधिमें स्पर्श करती है । अतः इस प्रकारकी श्राद्ध विधि अल्पावधिमें फलप्राप्ति करवाती है । पितृलोकपर विजय प्राप्त करना अर्थात मर्त्यलोकके प्रत्येक स्तरपर रज-तमात्मक कणोंका विघटन करना एवं आगे तेजके मार्गपर चलकर पितरयोनिको पार करना । समूल दर्भसे रज-तमका विघटन तो होता ही है, इसके अतिरिक्त पितरोंको तेजबल भी प्राप्त होता है । इसलिए कहा गया है, समूल दर्भसे पितृलोकपर विजय प्राप्त कर सकते हैं । दर्भ तोडते समय अनेक आघात कर अथवा नखसे दर्भ नहीं तोडना चाहिए ।

१ उ. दर्भपर अनेक आघात कर अथवा उसे नखोंसे न तोडनेका कारण

नखोंकी रचना रज-तम कणोंके संयोगसे होती है । नख मूलत: रजतमात्मक प्रवृत्तिदर्शक होते हैं । दर्भपर अनेक आघात करने अथवा उन्हें नखद्वारा तोडनेसे उत्पन्न रज-तमात्मक ध्वनितरंगोंका घनीकरण दर्भमें होता है, जिस कारण दर्भकी, सत्त्वसे संबंधित, संवेदनशीलता घटती है । दर्भमें जडत्वदर्शक रज-तमात्मक तरंगोंके घनीकरणसे, दर्भसे प्रक्षेपित तेजतत्त्वरूपी वायुकी, ऊर्ध्व अर्थात उपरकी दिशामें गमन करनेकी क्षमता घट जाती है । श्राद्धविधिमें ऐसे दर्भका उपयोग फलप्राप्तिकी दृष्टिसे घातक होता है । इस कारण श्राद्धविधिकी फलनिष्पत्ति भी घटती है । श्राद्धके लिए दर्भ तोड़ते समय इस मंत्रका उच्चारण करें,

विरिञ्चिना सहोत्पन्न परमेष्ठि निसर्गज । नुद सर्वाणि पापानि दर्भ स्वस्तिकरो भव ।।

अर्थ : ब्रह्मदेवसहित उत्पन्न हुए हे निसर्गोद्भव दर्भ, मेरे सर्व पापोंको नष्ट कर मेरा कल्याण कीजिए।

इस मंत्रद्वारा शक संवत अनुसार भाद्रपदकी तथा विक्रम संवत अनुसार आश्विनकी अमावस्यापर ईशान्य दिशाभिमुख होकर, ‘हुं फट्’ बोलकर दर्भ तोडें । श्राद्ध विधि करते समय देव एवं पितरोंके स्थानपर बैठनेके लिए यदि ब्राह्मण उपलब्ध नहीं हों, तो उनके स्थानपर दर्भ रखनेका शास्त्र है ।

१ ऊ. श्राद्ध विधिमें देव अथवा पितरोंके स्थानके लिए ब्राह्मण उपलब्ध नहीं हों, तो दर्भ रखनेका कारण

दर्भमें विद्यमान सुप्त तेजकणयुक्त वायु आवश्यकतानुसार ब्रह्मांडकी सगुण एवं निर्गुण तरंगें आकृष्ट करती है । यह वायु देवताकी उच्च तरंंगें तथा पितरोंकी कनिष्ठ तरंगें, इन दोनोंको ही आकृष्ट कर, उन्हें श्राद्धस्थलपर आमंत्रित करती है । इसीलिए श्राद्ध विधिमें देव अथवा पितरोंके स्थानके लिए ब्राह्मणके उपलब्ध नहीं रहनेपर  दर्भ रखा जाता है ।

श्राद्धके संकल्पयुक्त मंत्रोच्चारणसे दर्भमें तेजतत्त्वसंबंधी सुप्त वायु कार्यरत रहती है । दर्भद्वारा इस कार्यरत तेजतत्त्वका उत्सर्जन होता है । उर्त्सजित तेजतत्त्वसे अनिष्ट शक्तियोंको श्राद्धस्थलपर आनेसे प्रतिबंधित किया जाता है । तथा पितरोंको श्राद्ध-स्थलपर आकृष्ट किया जाता है । दर्भमें उच्च देवताओंके तत्त्व आकृष्ट करनेकी क्षमता होनेसे ही प्रत्येक पूजाविधिमें दर्भका उपयोग पवित्रकके रूपमें किया जाता है ।

२. काले तिल

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२ अ. श्राद्धविधिमें काले तिलका उपयोग क्यों करते हैं ?

‘श्राद्धमें काले तिलका उपयोग करनेका उद्देश्य है – काले तिलोंसे प्रक्षेपित रज-तमात्मक तरंगोंकी सहायतासे मर्त्यलोकमें अटके हुए पूर्वजोंकी लिंगदेहोंका आवाहन करना । श्राद्धमें पूर्वजोंको उद्देशित कर किए आवाहनात्मक मंत्रोच्चारणसे उत्पन्न नादशक्तिके फलस्वरूप काले तिलोंकी सुप्त रज-तमात्मक शक्ति जागृत होती है । यह शक्ति जिस समय रज-तमात्मक स्पंदनोंके वलयांकित रूपको वातावरणमें प्रक्षेपित करती है, उस समय श्राद्धमें किए आवाहनानुसार वे विशिष्ट लिंगदेह इन स्पंदनोंकी ओर आकृष्ट होती हैं एवं पृथ्वीकी वातावरण-कक्षामें प्रवेश करती हैं । इस प्रक्रियाके फलस्वरूप लिंगदेहोंके लिए काले तिलसे प्रक्षेपित रज-तमात्मक तरंगोंपर आरूढ होकर श्राद्धविधिके स्थानपर आना सुगम होता है । श्राद्धमें अर्पित नैवेद्य वायुरूपमें भक्षण कर लिंगदेह संतुष्ट होती हैं । काले तिलोंसे प्रक्षेपित तरंगोंके कारण लिंगदेहोंके सर्व ओर स्थित वासनात्मक कोष कार्यरत होता है एवं वह श्राद्धका अपना अंश ग्रहण कर तृप्त होता है ।’

२ आ. श्राद्धकर्ममें गुडमिश्रित अन्न, तिल एवं मधुका दान क्यों करना चाहिए ?

‘श्राद्धकर्ममें प्रयुक्त गुडमिश्रित अन्न, तिल एवं मधु ये घटक लिंगदेहकी वासनात्मक लेन-देनसे संबंधित कर्मके निदर्शक हैं । ये घटक लिंगदेहकी भिन्न-भिन्न मायिक (मायासंबंधी) वासनाएं दानके माध्यमसे पूरी करती हैं ।

अ. गुड : यह सभी वस्तुओंमें तुरंत घुलमिल जानेवाला पदार्थ है, अर्थात जीवके विशिष्ट कार्यस्तरपर निर्मित समष्टि लेन-देनका प्रतीक है ।

आ. तिल : यह व्यक्तिगत स्तरपर अनभिज्ञतासे (अनजानेमें) निर्मित होनेवाले लेन-देनका प्रतीक है ।

इ. मधु : यह प्रत्यक्ष मायाका व्यक्तिगतरूपसे; परंतु भावनापर आधारित एवं जानबूझकर किया गया लेन-देन न्यून करनेका प्रतीक है ।

जिसके हाथसे पितृकर्म किया जाता है, वह पितृऋण चुकानेके लिए सब पितरोंका उत्तरदायित्व अपने कंधोंपर लेकर, पितरोंके सर्व ओर स्थित वासनामय ३६ कोषोंका जाल भेदनेके लिए प्रार्थनासहित दान कर, प्रत्यक्ष विशिष्ट कर्म कर पितरोंको गति प्राप्त करवाता है । गुड, तिल एवं मधुके दानसे ब्रह्मांडका रज-सत्त्व, सत्त्व-रज एवं रजोगुणात्मक आपतत्त्वात्मक चैतन्य कार्यरत होता है तथा लिंगदेहोंके सर्व ओर विद्यमान वासनात्मक कोष नष्ट करता है; अर्थात यह दान एक प्रकारसे लिंगदेहको सब प्रकारके भावनात्मक लेन-देनसे १० प्रतिशततककी मात्रामें मुक्त करता है । दत्तात्रेय देवतासे प्रार्थना कर उनकी शरण जाकर, यह विधि भावपूर्ण कर, श्राद्धविधिकी समाप्ति विधिवत करनेसे, जीवको पूर्ण फलप्राप्ति होकर उसकी साधना निर्विघ्नरूपसे संपन्न होती है । इसलिए उस विशिष्ट विधिमें यथायोग्य दान भावपूर्ण एवं धर्मशास्त्रीय आधार समझकर करना अत्यंत महत्त्वपूर्ण सिद्ध होता है ।’

३. अक्षत (चावल)

३ अ. श्राद्धमें चावलकी खीर ही क्यों बनाते हैं ?

‘श्राद्धमें पितरोंको नैवेद्य दिखाकर उन्हें संतुष्ट करनेके लिए मिष्टान्नके रूपमें चावलकी खीर बनाते हैं । इसमें प्रयुक्त घटकोंमें चीनी मधुर रसका द्योतक, दूध चैतन्यका दााोत एवं चावलका सर्वसमावेशकके रूपमें उपयोग किया जाता है । ये सर्व घटक आपतत्त्वात्मक हैं । खीरमें लौंगका उपयोग करनेसे उससे प्रकट तमोदर्शक तरंगें खीरके अन्य घटकोंसे प्रक्षेपित आपतत्त्वात्मक तरंगोंके साथ मिल जाती हैं । इस मिश्रणसे उत्पन्न आपतत्त्वात्मक सूक्ष्म-वायुकी ओर रज-तमात्मक लिंगदेह अल्पावधिमें आकर्षित होती हैं । लौंगसे प्रक्षेपित सूक्ष्म-वायु नैवेद्यके सर्व ओर उष्ण गतिमान तरंगोंके सूक्ष्म-कवचकी निर्मिति करती है । इससे नैवेद्यके सर्व ओर सुरक्षा-कवचकी निर्मितिमें सहायता मिलती है ।’

४. भृंगराजपत्र एवं तुलसी

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भृंगराजपत्र

श्राद्धविधिमें उपयुक्त अन्य दो घटक हैं, माका अर्थात भृंगराजपत्र एवं तुलसी । श्राद्धविधिके समय पितर पृथ्वीकी कक्षामें आते हैं । उनमेंसे कुछ पितर अतृप्त होते हैं । ऐसे पितरोंकी अतृप्त इच्छाओंके कारण वातावरणमें दूषित वायुका प्रमाण बढ जाता है । अथवा किसी तमोगुणी वस्तुसे उत्पन्न सूक्ष्म तरंगोंके प्रक्षेपणका वेग बढ जाता है । इन सूक्ष्म तमोगुणी तरंगोंके वेगके कारण तमोगुणी ऊर्जाकी उत्पत्ति होती है । इस वेगवान तमोगुणी ऊर्जाकी सहायतासे वायुमंडलके रज-तम कणोंकी गतिक्रिया अर्थात मुवमेंट (स्दनसहू) को वेग प्राप्त होता है । इस गतिको प्रतिबंधित करनेके लिए श्राद्धविधिमें माका अर्थात भृंगराजपत्र तथा तुलसी इन दो घटकोंका उपयोग किया जाता है ।

४ अ. श्राद्धविधिमें उपयुक्त माका अर्थात भृंगराजपत्र एवं तुलसीकी विशेषता

१. भृंगराजपत्रका उपयोग पितरपूजनके लिए किया जाता है, जबकि तुलसीके पत्तोंका उपयोग देवतापूजनके लिए किया जाता है ।

२. भृंगराजपत्र तेजदायक है, तो तुलसी प्राणदायक है ।

३. भृंगराजपत्रसे वायुमंडलमें तेजोमय तरंगोंका प्रक्षेपण होता है । वायुमंडलमें पितरोंकी अतृप्त इच्छाओंके कारण उत्पन्न  रज-तम कणोंकी गति इन तेजोमय तरंगोंसे प्रतिबंधित होती है । रज-तम कणोंकी गति मंद होनेके कारण तुलसीके पत्तोंसे प्रक्षेपित श्रीकृष्ण तत्त्वकी चैतन्यमय तरंगें रज-तम कणोंको सहजतासे नष्ट कर देती हैं । इस प्रकार वायुमंडलकी शुद्धि करनेके लिए भृंगराजपत्र एवं तुलसी एक-दूसरेके पूरक सिद्ध होते हैं । वायुमंडलकी इस शुद्धता, एवं श्राद्धके अंतर्गत किए जानेवाले
संकल्पके कारण पितरोंके लिए श्राद्धस्थलमें प्रवेश करना सरल होता है ।

४. भृंगराजपत्रसे वायुमंडलमें प्रक्षेपित तेजोमय तरंगोंके कारण वायुमंडलमें पितरोंकी अतृप्त इच्छाओंके कारण उत्पन्न  रज-तम कणोंकी गति प्रतिबंधित होती है ।

४ आ. भृंगराजपत्रसे रज-तम कणोंकी गति प्रतिबंधित होनेके चरण

१. रज-तम कणोंकी गति मंद होती है : गतिक्रियाके माध्यमसे रज-तम कणोंमें उत्पन्न आकर्षण-
शक्तिका भृंगराजपत्रसे प्रक्षेपित तेजोमय तरंगोंके कारण विघटन होता है । इससे रज-तम कणोंकी
भ्रमणकक्षामें होनेवाली वेगवान गतिक्रिया मंद होती है ।

२. रज-तम कणोंका विभाजन होता है : भृंगराजपत्रसे प्रक्षेपित तेजतत्त्वकी तरंगोंके कारण
वायुमंडलके रज-तम कणोंका विभाजन होता है । परिणामस्वरूप रज-तम कणोंके एकत्रितरूपसे कार्य
करनेकी क्षमता घट जाती है । इससे भी उनकी गति प्रतिबंधित होती है ।

५. श्राद्धकर्ममें वर्जित वस्तुएं

५ अ. लाल रंगके पुष्प

५ अ १. लाल रंगके पुष्पोंसे मारक तरंगें प्रक्षेपित होनेसे श्राद्धमें उनका उपयोग न किया जाना : ‘लाल रंग मारक तत्त्वसे संबंधित है, इसलिए लाल रंगसे ३८ श्राद्धविधिका शास्त्रीय आधार प्रक्षेपित वेगवान मारक तरंगोंके प्रवाहके संपर्कमें आनेसे पितरोंसे संबंधित कनिष्ठ स्तरके, अर्थात पृथ्वी एवं आप तत्त्वोंसे संबंधित इच्छातरंगोंका विघटन होनेकी संभावना होती है । इसलिए पितरोंके लिए पृथ्वीतलपर आकर अन्न ग्रहण करना असंभव होता है; अतः श्राद्धमें लाल रंगके पुष्पोंका उपयोग न करें ।’

५ आ. वायविडंग, काली मिर्च, बिंजौरा, चिचिंडा एवं रामदाना

५ आ १. काली मिर्च, बिंजौरा जैसे तमोगुणवर्धक पदार्थोंका श्राद्धके भोजनमें समावेश न करना : ‘वायविडंग, काली मिर्च, महाळुंग, चिचिंडा एवं रामदाना, ये पदार्थ तमोगुणवर्धक होनेके कारण इनसे उत्पन्न तमोगुणी सूक्ष्म-वायुके प्रभावके कारण इच्छाशक्तिसे संबंधित तरंगोंके घनीभूत होनेकी, अर्थात जडत्व धारण करनेकी क्षमता बढनेसे ऐसा अन्न ग्रहण करनेवाले पितरोंमें जडत्वकी निर्मिति होकर उनकी आगेकी गति बाधित होनेकी आशंका रहती है । इसलिए कहते हैं कि श्राद्धके भोजनमें उपर्युक्त प्रकारके पदार्थोंके समावेशसे पितरोंको अधोयोनि प्राप्त होती है; क्योंकि जडत्वदर्शक तरंगोंका स्थायीभाव अधोदिशामें गमन करना है ।’

संदर्भ – सनातनके ग्रंथ – ‘श्राद्ध (महत्त्व एवं शास्त्रीय विवेचन)’ एवं ‘श्राद्ध (श्राद्धविधिका शास्त्रीय आधार)

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