
स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर (जन्म : 28 मई 1883) ऐसे दूरदर्शी, क्रांतिकारी देशभक्त तथा अत्यंत प्रतिभाशाली व्यक्तित्व थे, जिनका नाम केवल भारत ही नहीं, बल्कि विश्व के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा गया है। उनके लिए राष्ट्र ही सर्वोच्च था। इसलिए उनका संपूर्ण साहित्य राष्ट्रहित से प्रेरित था। साहित्यकार अनेक हुए और क्रांतिकारी भी अनेक हुए; परंतु सावरकर जैसे क्रांतिकारी साहित्यकार अद्वितीय थे।
युगप्रवर्तक क्रांतिकारी स्वातंत्र्यवीर सावरकर !
वीर सावरकर ने बाल्यावस्था में ही यह संकल्प लिया था कि वे भारत की स्वतंत्रता के लिए सशस्त्र क्रांति करेंगे, और उन्होंने जीवनभर उस प्रतिज्ञा का पालन किया। युवावस्था, परिवार, सुख-सुविधाएँ और पूरा जीवन उन्होंने राष्ट्र के लिए समर्पित कर दिया। ऐसे दूरदर्शी युगपुरुष थे स्वातंत्र्यवीर सावरकर।
उन्हें बलिदान का आकर्षण था, इसलिए मृत्यु का भय उन्हें कभी नहीं लगा। अंग्रेज सरकार ने उन्हें काले पानी की कठोर सजा दी; लेकिन उन्होंने अंदमान की कालकोठरी में भी अपनी प्रतिभा और विचारों को जीवित रखा। उस समय हजारों पृष्ठों का साहित्य रचने वाला ऐसा युगप्रवर्तक क्रांतिकारी दूसरा कोई नहीं था।
इस महान योद्धा से मिलने के लिए अनेक लोग ‘सावरकर सदन’ में आते थे। उनमें फील्ड मार्शल करिअप्पा, न.वि. गाडगीळ तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक पूजनीय श्री गुरुजी (माधव सदाशिव गोलवलकर) जैसे विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिष्ठित व्यक्ति भी सम्मिलित थे।
स्वस्थ शरीर के बावजूद सामाजिक और राष्ट्रीय कार्य निरंतर जारी !

28 मई 1963 को उनका 80वां जन्मदिन बड़े उत्साह से मनाया गया। अगले ही दिन घर में उनका पैर फिसल गया और उनकी जांघ की हड्डी में दरार आ गई। शाम को उन्हें अस्पताल ले जाया गया। उस समय उन्होंने सहज भाव से अपने निजी सचिव से कहा – “कल आपने मेरी जन्मतिथि मनाई और अब मैं पुण्यतिथि की ओर जा रहा हूँ !”
उनका शरीर अब उनका साथ नहीं दे रहा था। स्वास्थ्य भी बहुत कमजोर हो चुका था। जब उन्हें लगा कि अब उनके हाथों कोई बड़ा कार्य नहीं हो पाएगा, तब उस ज्ञानी और विरक्त महापुरुष को जीवन का मोह नहीं रहा।
इसी बीच 8 नवंबर 1963 को उनकी पत्नी सौ. माई ने भी अंतिम श्वास लेकर इस संसार से विदा ली। इतना सब होने पर भी सावरकरजी का सामाजिक और राष्ट्रीय कार्य निरंतर चलता रहा। उनसे मिलने के लिए अनेक लोग आते थे और वे उनसे भेंट भी करते थे।
मार्सेलिस में सावरकरजी की साहसी छलांग

ब्रिटिश सरकार ने सावरकरजी को लंदन में गिरफ्तार किया। भारत में मुकदमा चलाने के लिए उन्हें ‘मोरिया’ नामक जहाज से पुलिस पहरे में लाया जा रहा था। यात्रा के दौरान जहाज फ्रांस के मार्सेलिस बंदरगाह पर रुका।
8 जुलाई 1910 की सवेरे सावरकरजी ने शौचालय जाने का बहाना किया। उन्होंने अपने वस्त्र कांच पर टांग दिए, ताकि पहरेदार अंदर न देख सकें। फिर छोटे से पोर्टहोल से समुद्र में छलांग लगा दी। इस दौरान उनके शरीर की त्वचा तक छिल गई; लेकिन वे तैरकर फ्रांस की भूमि तक पहुंच गए और स्वतंत्र हो गए। पीछे से आए अंग्रेज अधिकारियों ने फ्रांसीसी पुलिस को रिश्वत देकर उन्हें फिर से पकड लिया और जहाज पर ले गए। यह घटना अंतरराष्ट्रीय न्यायालय तक पहुंची। इस प्रकार अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में जिसका मामला गया, ऐसे पहले भारतीय देशभक्त स्वातंत्र्यवीर सावरकर थे। उनकी यह वीरता आज भी देशभक्तों को प्रेरणा देती है।
भारत के स्वतंत्रता की मांग विश्व मंच पर पहुंचाने वाले वीर सावरकर
वीर सावरकरजी की इस साहसी घटना के कारण भारत की स्वतंत्रता का प्रश्न पहली बार विश्व स्तर पर चर्चा का विषय बना। यूरोप के समाचार पत्रों ने इसे अन्याय बताया। फ्रांस की भूमि पर सावरकरजी की गिरफ्तारी को अवैध माना गया। इस घटना के कारण ब्रिटेन और फ्रांस के बीच विवाद खड़ा हुआ और मामला अंतरराष्ट्रीय न्यायालय तक पहुंचा।
पत्नी को दिया त्याग और कर्तव्य का संदेश
अंदमान जेल भेजे जाने से पहले सावरकर ने अपनी पत्नी से कहा — “यदि केवल परिवार बसाना ही संसार है, तो यह कार्य पक्षी भी करते हैं; लेकिन यदि मानवता और राष्ट्र के लिए त्याग करना ही सच्चा संसार है, तो हम अपना कर्तव्य निभा चुके हैं। संकटों का साहसपूर्वक सामना करो।”
“राष्ट्र की रक्षा ही साहित्य का मुख्य उद्देश्य होना चाहिए”
1938 में मराठी साहित्य सम्मेलन में अध्यक्षीय भाषण देते हुए सावरकर ने कहा — “साहित्य जीवन के लिए है, जीवन साहित्य के लिए नहीं। जब राष्ट्र संकट में हो, तब राष्ट्र की रक्षा ही साहित्य की पहली चिंता होनी चाहिए।”
उन्होंने आगे कहा – “लेखन छोडकर आवश्यकता पड़ने पर शस्त्र उठाने चाहिए। आने वाले समय में हजारों युवकों को सैनिक बनकर राष्ट्र की रक्षा करनी चाहिए।”
पाकिस्तान को लेकर सावरकरजी का स्पष्ट दृष्टिकोण
1965 के भारत-पाक युद्ध से पहले पाकिस्तान के सैनिक बार-बार भारतीय सीमा में घुसपैठ करते थे और बाद में कहते थे कि वे गलती से आ गए। इस पर सावरकरजी कहते है – “यदि वे गलती से भारत में आ सकते हैं, तो हमारे सैनिक भी गलती से लाहौर तक क्यों नहीं पहुंच सकते ?”
अंदमान जेल में हिंदुओं का संरक्षण
अंदमान जेल में कुछ मुस्लिम बंदी हिंदुओं के भोजन को छू देते थे, जिससे हिंदू बंदी भोजन नहीं करते थे। सावरकरजी ने शुद्धि मंत्र पढकर भोजन पर जल छिडका और कहा – “अब यह भोजन पवित्र हो गया है। जो इसे खाएगा, वह हिंदू ही रहेगा।” इससे हिंदू बंदियों का भय समाप्त हुआ। उन्होंने जेल में जबरन धर्मांतरण के प्रयासों का भी विरोध किया और हिंदुओं में आत्मविश्वास जागृत किया।
“हिंदू होने में कभी लज्जा मत करो”
सावरकरजी कहते थे – “श्रीराम, श्रीकृष्ण, छत्रपति शिवाजी महाराज, महाराणा प्रताप और गुरु गोविंद सिंह पर गर्व करो। हिंदुओं के लिए इस संसार में एक सुरक्षित राष्ट्र अवश्य होना चाहिए।”
श्रीराम के आदर्शों का महत्व
सावरकरजी भगवान श्रीराम को आदर्श राजा मानते थे। उनका कहना था – “जब तक हिंदू समाज श्रीराम के आदर्शों को स्मरण रखेगा, तब तक भारत की उन्नति होती रहेगी।”
देश विभाजन के समय सावरकरजी की भूमिका
1937 में रत्नागिरी से मुक्त होने के बाद सावरकरजी ने अखंड भारत के लिए संघर्ष किया। उस समय देश विभाजन की स्थिति बन रही थी। उन्होंने हिंदू समाज को संगठित करने का प्रयास किया। उनके प्रयासों से भारत का बड़ा भाग हिंदुओं के अधिकार में बना रहा।
स्वतंत्रता का श्रेय सभी देशभक्तों को देना
उनका मानना था कि, भारत की स्वतंत्रता का श्रेय केवल किसी एक आंदोलन या नेता को नहीं, अपितु उन सभी देशभक्तों को है, जिन्होंने किसी भी रूप में देश की स्वतंत्रता की कामना की। वे कहते थे – “जिन लोगों ने केवल मन ही मन ‘हे भगवान, भारत को स्वतंत्र कर’ ऐसी प्रार्थना की, वे भी इस विजय के भागीदार हैं।”
भाषा शुद्धि पर वीर सावरकरजी का विचार
उनका मत था कि, अपनी भाषा के अच्छे शब्द छोडकर विदेशी शब्दों का अनावश्यक प्रयोग नहीं करना चाहिए। वे कहते थे – “अपनी भाषा के शब्दों को समाप्त करके विदेशी शब्द अपनाना ऐसा है, जैसे अपने बच्चों को छोडकर किसी और को अपनाना।”
वृद्धावस्था में भी अदम्य साहस
बुढ़ापे में भी सावरकर अपने पास शस्त्र रखते थे। जब उनसे पूछा गया कि इस आयु में शस्त्र का क्या उपयोग, तो उन्होंने कहा – “यदि कोई हमला करे, तो बिना प्रतिकार के मरना मुझे स्वीकार नहीं। संघर्ष करते हुए मृत्यु आए, यही मुझे प्रिय है।”
सावरकरजी का साहित्य
स्वातंत्र्यवीर सावरकर ने अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे, जिनमें प्रमुख हैं —
- 1857 का स्वातंत्र्य समर
- हिंदुपदपादशाही
- सहा सोनेरी पाने
- शिखों का इतिहास
- नाटक, कविताएं और उपन्यास
ऐसे महान क्रांतिकारी, दूरदर्शी नेता, साहित्यकार, नाटककार और कवि स्वातंत्र्यवीर सावरकर ने 26 फरवरी 1966 को मुंबई में देह त्याग किया।
उनके चरणों में समस्त भारतवासियों का कोटि-कोटि प्रणाम।
अंदमान स्थित, स्वातंत्र्य वीर सावरकर की स्मृति जागृत करनेवाले छायाचित्र
अंदमान – समस्त देशभक्तोंका स्फूर्तिस्थल !

अंदमान ! समस्त देशभक्तोंका स्फूर्तिस्थल ! यह वही भूमि है, जहां स्वतंत्रतापूर्व की अवधि में स्वतंत्रतावीर सावरकर के साथ अनेक स्वतंत्रता सैनिकोंने भारतमाता की मुक्ति हेतु अनेक मरणप्राय यातनाएं हंसते हंसते सहन कीं !
अतएव अंदमान के इस सेल्यूलर कारागृह की ओर देखने से ही देशप्रेम जागृत होता है ! उन्होंने देश के लिए जो यातनाएं सहन कीं, उनका स्मरण होता है।
उन्हीं स्वतंत्रता वीरोंकी, स्मृति जागृत करनेवाली अंदमान की एक चित्ररूप झलक . . .






साथ ही यह बात भी स्पष्ट होती है कि आज ‘आजादी’ की घोषणा कर देश के साथ गद्दारी करनेवाले, स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु लडनेवाले ऐसे स्वतंत्रता वीरोंकी तुलना में कितने छोटे हैं !
१९०६ में एक साथ, सात सौ कैदी रख सकें, इतने बडे कारागार का निर्माण किया गया था। सात विभागवाले इस तीन तल्लेवाले कारागृह का भवन छत से देखने पर साइकिल के पहिए की तरह दिखाई देता है। भारतीय स्वतंत्रता वीरोंको अंग्रेज यहां पर अत्यंत अमानुष कष्ट दिया करते थे। इसलिए इस सजा को ‘काले पानी की सजा’ कहा जाता था !

