धर्मांतरणके कारणभूत हिंदुओंके दोष

हिंदुओंके भी कुछ दोष और अन्य कारणोंसे भी हिंदुस्थानमें सहस्रों वर्षोंसे धर्मांतरणकी समस्या बढ रही है । धर्मांतरणकी समस्या समाप्त करने हेतु हिंदु समाजको इन दोषोंके विषयमें अंतर्मुख होकर उनका निर्मूलन करना आवश्यक है । हिंदु इन दोषोंमें सुधार लाएंगे, तो इस समस्यापर रोक लगाना सहज संभव होगा ।

 

१. आर्थिक दुर्बलता

अहिंदु संगठन दरिद्र व्यक्तिको धर्मांतरण करनेपर प्रतिमाह पैसे देनेका लालच देते हैं । घरमें कोई भी कमानेवाला न हो, घरमें कोई रोगी हो तो उसके उपचार हेतु अथवा स्वयंका दरिद्रतापूर्ण जीवन सुखमय करने हेतु हिंदुओंने धर्मांतरण किया, ऐसी अनेक घटनाएं हुई हैं ।

(आर्थिक लाभके लिए धर्मांतरण करना, यह समस्या सुलझानेका मार्ग नहीं है; अपितु साधना कर प्रारब्धकी तीव्रता न्यून करना, यह वास्तविक मार्ग है । – संकलनकर्ता)

 

२. ब्राह्मणद्वेषियोंद्वारा किया जानेवाला दुष्प्रचार

हिंदु धर्म ‘ब्राह्मणी धर्म’ है और वह बहुजनोंपर अत्याचार करता है, ऐसा दुष्प्रचार कुछ ब्राह्मणद्वेषी और उनके संगठन करते हैं । इससे उस समुदायके हिंदु स्वधर्मसे दूर जाकर नवबौद्ध अथवा शिवधर्मवादी बनते हैं और वे हिंदु धर्मका तिरस्कार करते हैं ।

 

३. धर्मशिक्षाका अभाव

‘हिंदुत्ववादी संगठनों और दलोंने हिंदुओंको धर्मशिक्षा नहीं दी और उनमें धर्माभिमान निर्माण नहीं किया, इसका प्रत्यक्ष परिणाम है, हिंदुओंका धर्मांतरण होना ।’ – (प.पू.) डॉ. जयंत आठवले (हिंदु जनजागृति समितीके प्रेरणास्रोत)

 

४. धर्माभिमानका अभाव

हिंदुस्थानमें हिंदु बहुसंख्यक होते हुए भी उनपर यह संस्कार है कि ‘यह धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है ।’ स्वतंत्रताके उपरांत सर्व पीढियोंपर यही संस्कार दृढ होनेके कारण हिंदुओंका धर्माभिमान लुप्त होता गया । धर्माभिमान के अभावमें इन पीढियोंपर पश्चिमके भोगवाद और मौज-मस्तीका रंग चढ गया । इस पूरी परिस्थितिका लाभ उठाते हुए अहिंदुओंने धर्मांतरण-कार्य बढाया । इसके विपरीत मुसलमानोंमें धर्माभिमान होनेके कारण उनका धर्मांतरण नहीं हुआ ।

 

५. अतिसहिष्णुवृत्ति

अन्य पंथियोंद्वारा किए जानेवाले हिंदुओंके धर्मांतरणका विरोध करने हेतु हिंदु संगठितरूपसे आगे नहीं आए और आज भी नहीं आते ।

 

६. दूरदृष्टिका अभाव

‘धर्मांतरित अधिक कट्टर होते हैं’, इसके लिए धर्मांतरण करानेवालोंके साथ ही धर्मांतरितोंका दूरदृष्टिहीन समाज भी कारणभूत होता है । कोई हिंदु लालचमें पडकर धर्मांतरण करता है, उस समय उस व्यक्तिको बहिष्कृत करनेका काम हिंदु समाज करता है । मिशनरियोंद्वारा बढाया अहंकार और मूल धर्मियोंका बहिष्कार धर्मांतरितोंकी कट्टरता बढानेमें कारणभूत सिद्ध होता है । आगे यही धर्मांतरित लोग नए स्वीकृत धर्मका कट्टरतासे प्रसार करते हैं । स्वयंके मूल धर्म, संस्कृति, परंपरा, पूर्वज इत्यादिका वे उपहास करते हैं ।’ – श्री. संदीप रामकृष्ण गावडे, शिरोडा (जनपद सिंधुदुर्ग), महाराष्ट्र.

 

७. धर्मनिरपेक्ष शासनकी भेदभावपूर्ण नीति

‘सामान्यतः हिंदुस्थानमें धर्मांतरणका ग्रास बननेवाले हिंदु होते हैं । उनका धर्मांतरण हो जाए, तो शासनका कुछ नहीं बिगडता; परंतु मुसलमानों अथवा ईसाइयोंका धर्मांतरण हो जाए, तो वह धर्मनिरपेक्ष शासनकी दृष्टिसे अवैध होता है ।’ – मासिक ‘हिंदु वॉईस’ (२००६)

 

धर्म-परिवर्तनके पश्चात्
हिंदुओेंकी दयनीय स्थितिके कुछ उदाहरण

१. धर्म-परिवर्तनके पश्चात् बच्चोंका विवाह न हो पाना

‘एक परिवारमें केवल एक व्यक्तिने ईसाई धर्म अपनाया था । उसकी पत्नी और बच्चोेंने धर्म-परिवर्तन नहीं किया था । आगे जब बच्चे बडे होकर विवाहके योग्य हुए, तब ईसाई उन्हें हिंदु समझते, तो हिंदु उन्हें ‘धर्मांतरितकी संतान’ मानते थे । इस कारण उन्हें विवाहके लिए लडकी मिलना अत्यंत कठिन हो गया ।’ – श्री. भिकाजी डेगवेकर, दैनिक ‘गोमन्तक’ (१६.३.२००३)

२. ईसाइयोेंकी धर्मांधताके कारण मृतदेहको

शवस्थानमें (कब्रिस्तानमें) गाडनेकी (दफनानेकी) अनुमति न मिलना

‘बंगलुरूमें एक धर्मांतरित वृद्ध ईसाईकी मृत्यु हो गई । इस व्यक्तिके परिवारने ६० वर्षपूर्व ईसाई धर्मका स्वीकार किया था । ईसाइयोेंके कब्रिस्तानके व्यवस्थापकने उस व्यक्तिकी मृतदेहको गाडनेके लिए स्थान देनेसे मना कर दिया; क्योंकि वह परिवार ईसाई धर्मके एक विशिष्ट पंथका नहीं था ।’

३. धर्मांतरण करनेके पश्चात् भी
जातीय सामाजिक स्तरमें परिवर्तन न होना

कुछ पिछडे वर्गके हिंदु, समानताकी अपेक्षासे अन्य धर्ममें प्रवेश करते हैं; परंतु धर्मांतरणके पश्चात् भी उनके जातीय स्तरमें परिवर्तन नहीं होता । पुर्तगालियोंके कालमें धर्मांतरित ईसाइयोंमें बामण (ब्राह्मण), चाडेर (क्षत्रिय) और सुदिर (शूद्र) ये वर्ण रहे । उनमें आज भी रोटी-बेटीका व्यवहार नहीं होता । तमिलनाडु राज्यमें तो उच्चवर्णियोंके चर्चमें जानेके दंडस्वरूप एक शूद्र ईसाई युवकके शरीरपर विष्ठा डालनेका निर्णय सुनाया गया । परधर्मकी यह असमानता अर्थात् धर्मांतरितोंकी दुर्दशा ही है ।

संदर्भ : हिंदु जनजागृति समितीद्वारा समर्थित ग्रंथ ‘धर्म-परिवर्तन एवं धर्मांतरितोंका शुद्धिकरण’

हिन्दू राष्ट्र की स्थापना हेतु
सप्तम ‘अखिल भारतीय हिन्दू अधिवेशन’

२ जून से ८ जून के उद्बोधन सत्र अवश्य देखें