धर्म-परिवर्तनके संदर्भमें हिंदुओंको आवाहन


हिंदुओंके तीव्र गतीसे हो रहे धर्म-परिवर्तन के विरुद्ध आज हिंदुओंको सभी स्तरसे संघटित होना अत्यावश्यक बन गया है । इस दृष्टीसे हिंदु समाज तथा हिंदुत्वनिष्ठ संघटनाओंने वैâसे प्रयत्न करने चाहिए इस बारेमें प्रस्तूत लेखद्वारा दिशादर्शन किया गया है ।

१. हिंदु समाजको आवाहन

१ अ. हिंदुओ, धर्म-परिवर्तन कर अपने

धर्मका दैदीप्यमान इतिहास कलंकित मत करो !

इतिहासमें मानवता, संस्कृति और नैतिकताके लिए हिंदु समाजने ईसाई एवं मुसलमानोंकी अपेक्षा अधिक योगदान किया है । हिंदुओंने कभी भी अपना धर्म अन्योंपर नहीं लादा । इसके विपरीत, संपूर्ण विश्वको सुसंस्कृत करने की घोषणा की । विश्वको सुसंस्कृति सिखानेवाले हिंदुओंके देशमें धर्म-परिवर्तनके कारण हिंदुओंका निःशेष होना, उनके दैदीप्यमान इतिहासको कलंकित करना है ।

१ आ. हिंदु धर्मका महत्त्व जानिए !

‘एलोपैथी’में ऊपर-ऊपरकी चिकित्सा की जाती है और आयुर्वेद रोगके मूल कारणपर उपाय बताता है । उसी प्रकार, ईसाई प्रचारक किसी समस्याका ऊपरी उपाय बताते हैं, उदा. ईसाई बनिए, ईसामसीह आपके सर्व कष्ट दूर करेंगे इत्यादि । साथ ही वे पैसे भी देते हैं । ऐसे उपायोंसे व्यक्तिका इस जन्मका भोग उदा. दरिद्रता दूर नहीं होती । यदि थोडा लाभ हो, तो व्यक्तिको आगामी जन्ममें शेष प्रारब्धभोग भोगने ही पडते हैं । इसके विपरीत, हिंदु धर्ममें बताई साधना करनेसे सर्व कष्टोंका मूल कारण दूर होता है । इस कारण आर्थिक अभावके साथ अन्य सर्व कष्ट भी दूर होते हैं तथा अध्यात्ममें प्रगति होने लगती है ।’ – (प.पू.) डॉ. जयंत आठवल (हिंदु जनजागृति समितीके प्रेरणास्रोत)(१४.९.२०११)

१ इ. अपने क्षेत्रके जनप्रतिनिधि और मंत्रियोंको संगठितरूपसे ज्ञापन देकर ‘धर्मांतरण प्रतिबंधक दंडविधानका (कानून)’ बनानेका आग्रह करें और समय-समयपर प्रतिपुष्टि भी करते रहें !

 

२. हिंदुत्ववादी संगठनोंको आवाहन

२ अ. अहिंदु धर्मप्रचारकोंका अभ्यासपूर्वक प्रतिवाद करें !

‘अहिंदु धर्मप्रचारकोंके पास विदेशसे विपुल धन आता है । इन धर्मप्रचारकोंका नियोजन, दूरदृष्टि, क्रोध न कर संयमसे धर्म-परिवर्तन करानेकी कला, हिंदुओंके धर्मग्रंथोंका सामान्य अध्ययन आदि सूत्रोंका अभ्यास और निरीक्षण कर उनका प्रतिवाद करनेका अभ्यास हिंदुत्ववादी कार्यकर्ताओंको करना चाहिए ।

२ आ. धर्म-परिवर्तनके विरोधमें अभ्यासपूर्वक संघर्ष करें !

किसी देशमें ईसाई लोगोंपर सामाजिक और सांस्कृतिक अन्यायका समाचार मिलते ही अन्य देशोंके ईसाई उसके विरोधमें अभ्यासपूर्वक संघर्ष करते हैं । हिंदु संगठनोंके पास इस प्रकारका अभ्यास और राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय दंडविधानोंके ज्ञानका अभाव दिखाई देता है । धर्म-परिवर्तनकी घटना होते ही, हिंदु संगठनोंकी ओरसे भावनात्मक स्तरपर विरोध अथवा तात्कालिक दिशाहीन उपद्रव किया जाता है ।

परंतु, स्थाई समाधान नहीं निकाला जाता । मूल प्रश्नको भली-भांति समझना, सत्ताधारियोंपर दबाव डालकर विदेशी सहायता रुकवाना, धर्म-परिवर्तनके संबंधमें अन्य राष्ट्रोंकी नीतियोंका अभ्यास करना और मतोंके गणितका विचार न कर धर्म-परिवर्तन रोकना आदि कार्यवाही हिंदु संगठनोंसे अपेक्षित है ।

२ इ. धर्म-परिवर्तनके विषयमें परस्पर सहयोगसे

न्यायालय अथवा जनपद-अधिकारीके समक्ष परिवाद (शिकायत) प्रस्तुत करें !

जहां धर्म-परिवर्तनके प्रयत्न होते हैं अथवा प्रत्यक्ष धर्मांतरण होता है, वहांके हिंदुत्ववादी कार्यकर्ताओंको न्यायालय अथवा जनपद अधिकारीके समक्ष निर्भयतासे परिवाद प्रस्तुत करना चाहिए । कुछ तांत्रिक सूत्रोंके कारण धर्म-परिवर्तनसे संबंधित किया गया परिवाद जनपद-अधिकारी अथवा न्यायालयके समक्ष टिक नहीं पाता । ऐसेमें हिंदुओंके स्वयंसेवी संगठनों, अधिवक्ताओं और समाजसेवकोंको परिवाद प्रविष्ट करनेवाले हिंदुकी न्यायालयीन प्रक्रियामें स्वयं सहायता करनी चाहिए ।’
– श्री. संजय मुळ्ये, रत्नागिरी, महाराष्ट्र.

२ ई. अपने नगरके समीपके आदिवासी क्षेत्रोंमें स्वधर्मका प्रचार करें !

संदर्भ : हिंदु जनजागृति समितीद्वारा समर्थित ग्रंथ ‘धर्म-परिवर्तन एवं धर्मांतरितोंका शुद्धिकरण’

राष्ट्र एवं धर्म रक्षा के लिए कार्यरत
हिन्दू जनजागृति समिति को
दिया गया धर्मदान ‘सत्पात्र दान’ होगा !