कुछ देवियों की उपासना की विशेषताएं

कर्मकांडानुसार पूजन करना, साधना की सात्त्विक पद्धति है । इसमें अल्प पदार्थों की आवश्यकता होती है । यह केवल देवी को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है । सात्त्विक साधना निष्काम होना आवश्यक है । यद्यपि कोई इच्छा रह भी जाए, इससे कोई अंतर नहीं आता; क्योंकि सकाम साधना के भी आरंभ में देवी का सम्मान तथा अनुग्रह ही अपेक्षित होता है ।

१. कुमारी

इस पूजा के फूल, फूलों की माला, घास, पत्ते, पेड की छाल, कपास का धागा, हलदी, सिंदूर, कुमकुम इत्यादि का महत्त्व होता है । जो वस्तुएं छोटी बालिकाओं को भाती हैं; वे इस देवी को अर्पण करते हैं ।

२. रेणुका, अंबाबाई एवं तुळजाभवानी

tuljabhavanidevi
तुळजाभवानीदेवी

ये जिनकी कुलदेवता होती हैं, उनके घर विवाह जैसी विधि के पश्‍चात घर के ‘गोंधळ’ जैसी धार्मिक विधि के (जो कि भारत के महाराष्ट्र के प्रचलित है) देवी की स्तुति करते हैं । उसी प्रकार से जैसे कुछ लोगों के यहां विवाह जैसे कार्य निर्विघ्न होने हेतु सत्यनारायण की पूजा करते हैं अथवा महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र के ब्राह्मण देवी को दूध, दही, मधु, रोटी, चावल मिलाकर बनाया गया खाद्यपदार्थ अर्पित करते हैं । न्यूनतम विवाहित पांच स्त्रियां और कुमारी मिलकर यह अर्पित करती हैं, जिसे बोडण कहा जाता है ।

३. त्रिपुरसुंदरी

ये एक तांत्रिक देवता हैं । इनके नाम पर एक पंथ प्रचलित है । उक्त पंथ की दीक्षा लेने के उपरांत ही इस देवी की उपासना की जाती है ।

४. महिषासुरमर्दिनी

किसी के देवी की शक्ति सहन करने की क्षमता न हो, तो प्रथम शांतादुर्गा, फिर दुर्गा का और अंत के महिषासुरमर्दिनी का आवाहन करते हैं । इससे देवी की शक्ति सहन करने की क्षमता धीरे-धीरे बढने लगती है एवं महिषासुरमर्दिनी की शक्ति सहनीय हो जाती है ।

५. काली

बंगाल में काली की उपासना प्राचीन काल से प्रचलित है । पूर्णानंदजी का ‘श्यामारहस्य‘ और कृष्णानंदजी का ‘तंत्रसार’, ये दो ग्रंथ सुप्रसिद्ध हैं । इस पूजा के सुरा (मद्य) अत्यावश्यक है । मंत्र द्वारा उसे शुद्ध कर उसका सेवन किया जाता है । कालीपूजा हेतु प्रयुक्त कालीयंत्र पर त्रिकोण, पंचकोण अथवा नौकोण बनाएं, ऐसा ‘कालिकोपनिषद्’ के कहा गया है । कभी-कभी इसे पंद्रह कोणों का भी बनाते हैं । कालीपूजा कार्तिक कृष्ण पक्ष में, विशेषतः रात्रि के समय, फलप्रद बताई गई है । इस पूजा के कालीस्तोत्र, कवच, शतनाम एवं सहस्रनामका पाठ विहित है ।

६. कामाख्या

‘गुवाहाटी के कामाख्या मंदिर के देवी की मूर्ति न होकर मंदिर के भीतरवाली गुफा के एक पत्थर पर योनि की आकृति उकेरी गई है । निकट ही एक झरना है, जिसके बहते हुए पानी से यह पत्थर सदैव गीला रहता है । इस योनिप्रतीक पर ही फूल-पत्ते चढाकर उसकी पूजा करते हैं । योनिरूपी कामाख्या भूदेवी ही हैं ।’(गंधक को पार्वती का रज मानते हैं और पारेको शिव का वीर्य मानते हैं । आर्तव अर्थात स्त्रीबीज एवं असृज् अर्थात रक्त ।) आषाढ माह के देवी के ऋतुधर्म के वार्षिक चार दिन, मंदिर के द्वार बंद कर सतत पूजा करते हैं । इसे एकांतपूजा कहते हैं । तदुपरांत माहवारी के प्रतीक, लाल रंग के वस्त्र एवं उसके टुकडे भक्तोंको  प्रसाद के रूप के देते हैं ।

७. चामुंडा

आठ गुप्ततर योगिनी मुख्य देवताके नियंत्रणमें विश्‍वका संचलन, वस्तुओंका उत्सर्जन, परिणाम इत्यादि कार्य करते हैं ।  संधिपूजा नामक एक विशेष पूजा अष्टमी एवं नवमी तिथियोंके संधिकालमें करते हैं । यह पूजा  दुर्गाके चामुंडा रूपकी होती है । उस रातको गायनवादन, खेलके योगद्वारा जागरण करते हैं ।

८. दुर्गा

श्री दुर्गामहायंत्र श्री भगवतीदेवी का (दुर्गाका) आसन है । नवरात्रि के दुर्गा के नौ रूपों की उपासना करते हैं । नवरात्रि पर अधिक जानकारी के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं ।

९. उत्तानपादा

यह मातृत्व, सृजन तथा विश्‍वनिर्मितिके त्रिगुणोंसे युक्त है । छिन्नमस्ता अथवा लज्जागौरी देवीकी मूर्ति पूजनेकी था प्रचीन कालसे चली आ रही है । मूर्तिकी पीठ भूमिपर तथा घुटने पूजककी ओर मुडे होते हैं । शिवपिंडीके नीचे स्थित अरघेकी  (जलहरीकी) जैसी रचना होती है, उसी अवस्थामें यह भी पूजी जाती हैं । इसपर जलधाराका अभिषेक चढानेके उपरांत, जलके बहने हेतु एक मार्ग भी बनाया जाता है, जिसे महाशिवके महाभगका महामार्ग कहते हैं ।

१०. लक्ष्मी

लक्ष्मीपूजन के पवित्र दिन पर (दीपावली का तीसरा दिन) प्रातःसमय अभ्यंग स्नान करने के पश्‍चात श्रीलक्ष्मी की पूजा करना इष्ट होता है ।

संदर्भ – सनातनका ग्रंथ, शक्ति (भाग २)

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