तुलसी विवाह

तुलसी विवाह यह विधि कार्तिक शुक्ल पक्ष एकादशीसे पूर्णिमातक किसी भी दिन करते हैं । इस दिनसे शुभ दिवसका, अर्थात मुहूर्तके दिनोंका आरंभ होता है । श्रीविष्णु (बालकृष्णकी मूर्ति)का तुलसीसे विवाह करनेकी यह विधि है । पूर्वकालमें बालविवाहकी प्रथा थी । ऐसा माना जाता है कि, ‘यह विवाह भारतीय संस्कृतिका आदर्श दर्शानेवाला विवाह है ।’ इस हेतु, विवाहके पहले दिन तुलसी-वृंदावनको रंगकर सुशोभित करते हैं । घरके आंगनमें गोबर-मिश्रित पानी छींटिए । तुलसी कुंडको श्वेत रंगसे रंगिए । श्वेत रंगके माध्यमसे ईश्वरकी ओरसे शक्ति आकर्षित की जाती है । तुलसीके आस-पास सात्त्विक रंगोली बनाइए । वृंदावनमें गन्ना, गेंदेके पुष्प डालते हैं एवं जडके पास इमली व आंवला रखते हैं । उसके उपरांत उसकी भावपूर्ण पूजा कीजिए  । पूजा करते समय पश्चिमकी ओर मुख कर बैठिए । यह विवाह समारोह संध्याके समय करते हैं ।

इस दिन पृथ्वीपर अधिक मात्रामें श्रीकृष्णतत्त्व कार्यरत रहता है । तुलसीके पौधे से भी अधिक मात्रामें श्रीकृष्णतत्त्व कार्यरत होता है । इसलिए इस दिन श्रीकृष्णका नामजप करनेसे अधिक लाभ होता है । पूजा होनेके उपरांत वातावरण अत्यंत सात्त्विक हो जाता है । उस समय भी श्रीकृष्णका नामजप कीजिए । तुलसी अत्यधिक सात्त्विक होती है अत: उसमें ईश्वरकी शक्ति अधिक मात्रामें आकर्षित होती है । तुलसीके पत्ते जलमें डालनेसे जल शुद्ध एवं सात्त्विक होता है और उसमें ईश्वरीय शक्ति कार्यरत होती है । उस जलसे जीवकी प्रत्येक पेशीमें ईश्वरीय शक्ति कार्यरत होती है ।

विशेषताएं

कार्तिक शुक्ल पक्ष द्वादशीपर तुलसी विवाह उपरांत चातुर्मासमें रखे गए सर्व व्रतोंका उद्यापन करते हैं । जो पदार्थ वर्जित किए हों, वह ब्राह्मणको दान कर, फिर स्वयं सेवन करें ।

संदर्भ : सनातन का ग्रंथ, ‘त्यौहार मनानेकी उचित पद्धतियां एवं अध्यात्मशास्त्र’ एवं अन्य ग्रंथ