नरकचतुर्दशी

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नरकासुरका वध

शक संवत अनुसार आश्विन कृष्ण चतुर्दशी तथा विक्रम संवत अनुसार कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी नरकचतुर्दशीके नामसे पहचानी जाती है । इस तिथिपर भगवान श्रीकृष्णने नरकासुरका वध किया । तबसे यह दिन नरकचतुर्दशीके नामसे मनाते हैं । भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुरको उसके अंत समय दिए वरके अनुसार, इस दिन सूर्योदयसे पूर्व जो अभ्यंगस्नान करता है, उसे नरकयातना नहीं भुगतनी पडती । अभ्यंगस्नान अर्थात सुगंधित तेल एवं उबटन लगाकर किया गया स्नान ।

१. नरकचतुर्दशी इतिहास

‘श्रीमद्भागवतपुराणमें एक कथा है – पूर्वकालमें प्राग्ज्योतिषपुरमें भौमासुर (नरकासुर) नामक एक बलशाली असुर राज्य करता था । देवताओंको एवं मानवोंको वह अत्यंत कष्ट देने लगा । यह दुष्ट दैत्य स्त्रियोंको भी पीडा देने लगा । जीतकर लाई हुई सोलह सहदा विवाह योग्य राज्यकन्याओंको उसने कारावासमें डाल दिया एवं उनसे विवाह करनेका निश्चय किया । यह समाचार मिलते ही श्रीकृष्णने सत्यभामासहित असुरपर आक्रमण किया । नरकासुरका अंत कर सर्व राजकुमारियोंको मुक्त किया । मरते समय नरकासुरने श्रीकृष्णसे वर मांगा कि ‘आजके दिन मंगलस्नान करनेवाला नरककी पीडासे बच जाए ।’ श्रीकृष्णने उसे
तदनुसार वर दिया । इस कारण कार्तिक कृष्ण पक्ष चतुर्दशीको नरकासुर चतुर्दशीके नामसे मानने लगे एवं इस दिन लोग सूर्योदयसे पूर्व साभ्यंगस्नान करने लगे । चतुर्दशीके दिन प्रातः नरकासुरका वध कर उसके रक्तका तिलक माथेपर लगाकर श्रीकृष्णके घर आते ही सभी माताओंने उसे आलिंगन दिया । स्त्रियोंने आरती उतारकर आनंद व्यक्त किया ।’

२. अभ्यंगस्नानका महत्त्व

आकाशमें तारोंके रहते, ब्राह्ममुहूर्तपर साभ्यंग (पवित्र) स्नान करते हैं । दीपावलीके दिनोंमें अभ्यंगस्नान करनेसे व्यक्तिको अन्य दिनोंकी तुलनामें ६ प्रतिशत सात्त्विकताका अधिक लाभ मिलता है । सुगंधित तेल एवं उबटन लगाकर शरीरका मर्दन कर अभ्यंगस्नान करनेके कारण व्यक्ति में सात्त्विकता एवं तेज बढता है ।

अपामार्ग (ऊंगा) नामक वनस्पतिकी टहनीसे सिरसे पैरतक और पुनः सिरतक जलप्रोक्षण करते हैं । इसके लिए जडयुक्त अपामार्ग वनस्पतिका उपयोग करते हैं ।

३. यमतर्पण

अभ्यंगस्नानके उपरांत की जानेवाली महत्त्वपूर्ण धार्मिक विधि, यमतर्पण । श्री यमराज धर्मके श्रेष्ठ ज्ञाता एवं मृत्युके देवता हैं । प्रत्येक व्यक्तिकी मृत्यु अटल है । प्रत्येक व्यक्ति इस सत्यको स्वीकार करता है; परंतु असामयिक अर्थात अकाल मृत्यु किसीको भी स्वीकृत नहीं होती । असामयिक मृत्युके निवारण हेतु यमतर्पणकी विधि बताई गई है । यमतर्पणसे वर्षभरके पाप नष्ट हो जाते हैं । दीपावलीके दिन अभ्यंगस्नान करनेसे देहकी शुद्धि होती है; परंतु वायुमंडलमें कार्यरत अनिष्ट शक्तियोंसे रक्षण यमतर्पणके माध्यमसे होता है । इससे व्यक्तिके चारों ओर सुरक्षाकवचकी निर्मिति होती है ।

३ अ. दीपावलीमें यमतर्पण विधि करनेका कारण

दीपावलीके कालमें यमलोकसे सूक्ष्म यमतरंगें भूलोक की ओर अधिक मात्रामें आकृष्ट होती हैं । इसलिए इस कालमें यह विधि विशेष रूपसे करनेका विधान है । नरक चतुर्दशीके दिन यह विधि अभ्यंगस्नानके उपरांत की जाती है । अभ्यंगस्नान अर्थात तेल-उबटन इत्यादिसे मर्दन अर्थात मालिश करनेके उपरांत किया गया स्नान । तर्पणका जल स्नानगृहके पानीके साथ न बहे, इस हेतु तर्पण विधि करनेके लिए ताम्रपात्रका उपयोग करते हैं । यमतर्पण करते समय प्रथम अभ्यंगस्नानपूर्तिका संकल्प पूर्ण होनेके लिए ताम्रपात्रमें जल छोडनेसे व्यक्तिके प्राणमयकोष एवं मनोमय कोषकी शुद्धि होती है । स्नानके मध्यमेंही गीले वस्त्रोंसहित यमतर्पण करते हैं । उसके उपरांत स्नानविधि पूर्ण करते हैं। परंतु स्नानगृहमें यम-तर्पण करना संभव न हो, तो बाहर आकर यम-तर्पण कर सकते हैं; परंतु इसके पश्चात पुनः स्नान करना चाहिए ।

३ आ. यमतर्पण विधि

१. इस विधिमें स्नानके उपरांत स्नानकर्ता यमादि देवताओंके यह चौदह नामोंका उच्चारण कर ताम्रपात्रमें जल छोड़ते है (तर्पण करते हैं), १. यम, २. धर्मराज ३. मृत्यु ४. अंतक ५. वैवस्वत ६. काल ७. सर्वभूतक्षयकर ८. औदुंबर ९. दध्न १०. नील ११. परमेष्ठिन १२. वृकोदर १३. चित्र १४. चित्रगुप्त । इसमें यमराजके साथ उनके कार्यमें सहायक अन्य देवताओंके नामोंका भी उच्चारण कर तर्पण करते हैं । प्रत्येक देवताके नामके उच्चारणके साथ उस संबंधित देवताका तत्त्व ब्रह्मांडमें साकार होता है तथा उसके द्वारा तर्पण करनेवाले व्यक्तिकी ओर आशीर्वादात्मक तरंगें प्रक्षेपित होती हैं ।

२. तदुपरांत जिसके पिता जीवित हैं, वह स्नानकर्ता यमादि देवताओंका नाम लेकर श्वेत अक्षत एवं जल देवतीर्थसे अर्थात उंगलियोके अग्रभागसे छोड़ता है । जिनके पिता नहीं हैं, वे जलमें थोड़े काले तिल डालते हैं। अपसव्य करते हैं अर्थात जनेऊ को दाहिने कंधेपर रखते हैं। यह जल आचमनीमें लेकर पितृतीर्थसे अर्थात अंगूठेकी ओरसे ताम्रपात्रमें छोडें । ताम्रपात्रमें जल छोडते समय यमादि देवताओंके नाम लेकर मंत्रोंच्चार करते हैं ।

३. जल छोडनेके उपरांत दक्षिण दिशाकी ओर खडे होते हैं। इसके पश्चात दक्षिण दिशाकी ओर मुख कर खड़े होते हैं । दोनों हाथ ऊपर कर, एक श्लोक दस बार बोलते हैं  । जिनके पिता नहीं हैं, उनके लिए भी इस श्लोकका उच्चारण करना अनिवार्य है । यह श्लोक,’यमो निहन्ता पितृधर्मराजो वैवस्वतो दण्डधरश्च कालः ।
भूताधिपो दत्तकृतानुसारी कृतान्त एतद्दशभिर्जपन्ति।।

– पूजासमुच्चय’

इसका अर्थ है, यम, निहन्ता, पिता, धर्मराज, वैवस्वत अर्थात सूर्यपुत्र, दण्डधर,  काल, भूताधिप अर्थात प्राणिओंके स्वामी, दत्तकृतानुसारी अर्थात वे जो उन्हें मृत्युहरणका दिया हुआ कार्य करते हैं तथा कृतान्त इन दस नामोंसे यमदेवका जप करते हैं ।

श्लोकपठनके कारण होनेवाली सूक्ष्म-स्तरीय प्रक्रिया

अ. दक्षिण दिशाकी ओर मुख कर दोनो हाथ ऊपर उठाकर श्लोक उच्चारण करनेसे दक्षिण दिशाकी ओरसे आनेवाली यमतरगें मंत्रशक्तिके कारण व्यक्तिको प्राप्त होती हैं ।

आ. ये तरंगें हाथोंके माध्यमसे संपूर्ण देहमें प्रवाहित होती हैं । हाथोंको ऊपर उठानेका यह कृत्य ऐन्टीनासमान कार्य करता है ।

इ. यमतरंगें देहमें प्रवाहित होनेसे देहके सर्व ओर सुरक्षाकवच बनता  है ।

ई. यमतर्पणसे वर्षभरके पाप नष्ट हो जाते हैं ।

उ. दीपावलीके दिन अभ्यंगस्नान करनेसे देहकी शुद्धि होती है, परंतु वायुमंडलमें कार्यरत अनिष्ट शक्तिसे यमतर्पणकेद्वारा  रक्षण होता हैं ।

४. कुछ स्थानोंपर यमतर्पण के उपरांत नरकासुर-वधके प्रतीकस्वरूप कारीट नामका एक कडवा फल पैरसे कुचलते हैं, तो कुछ लोग इसका रस जीभपर लगाते हैं ।

५. यमतर्पणकी विधि पूर्ण होनेके पश्चात स्नान कर नए वस्त्र परिधान करनेपर पुन: औक्षण करते हैं अर्थात आरती उतारते हैं । औक्षण करते समय घरकी वयोवृद्ध स्त्रीद्वारा प्रथम क़ुमकुम एवं अक्षत  लगाई जाती है ।  उपरांत अर्धवर्तुलाकार पद्धतीसे तीन बार घुमाकर सुपारी एवं अंगुठी उतारी जाती है । अंतमें अर्धवर्तुलाकार पद्धतीसे तीन बार घुमाकर आरती उतारी जाती है ।

३ इ. यमतर्पण विधिके सूक्ष्म-परिणाम

अ. असामयिक मृत्यु न आए इसलिए व्यक्ति अभ्यंगस्नानके उपरांत दूतोंसह यम एवं चित्रगुप्तसे भावपूर्ण प्रार्थना करता है । उस समय व्यक्तिमें भावका वलय जागृत होता है ।

आ. अभ्यंगस्नानके उपरांत व्यक्तिमें ईश्वरीय तत्त्वका प्रवाह आकर्षित होता है तथा ईश्वरीय तत्त्वके वलय जागृत होते हैं ।

इ. व्यक्तिमें चैतन्यके प्रवाह आकर्षित होते हैं एवं चैतन्यके वलय घनीभूत होते हैं ।

ई. यमादि देवताओंसे शक्तिका प्रवाह व्यक्तिकी ओर आकर्षित होता है तथा उन देवताओंकी शक्तिके वलय प्रक्षेपित होते हैं ।

उ. यमादि देवताओंको यमतर्पण अर्थात अक्षत एवं जल अर्पण करते समय ताम्रपात्रसे व्यक्तिकी ओर शक्तिके प्रवाहका वहन होता है ।

ऊ. व्यक्तिकी देहमें शक्तिके कण कार्यरत रहते हैं ।

ए. अनिष्ट शक्तियोंसे व्यक्तिका रक्षण होकर उसकी देहके चारों ओर सुरक्षाकवच निर्माण होता है ।

इस विधिके माध्यमसे व्यक्तिद्वारा पितृधर्मका पालन होता है । इस विधिसे अधिक मात्रामें शक्तिके स्पंदनोंकी निर्मिति होती है ।

३ र्इ. यमतर्पणसे व्यक्तिको प्राप्त लाभकी मात्रा

यम तर्पण करनेसे  व्यक्तिको ईश्वरीय तत्वका १.२५ प्रतिशत  शक्तिका  ३.२५ प्रतिशत तथा चैतन्यका  २ प्रतिशतकी  मात्रामें लाभ मिलता है ।

४. औक्षण

        यमतर्पणकी विधि पूर्ण होनेके पश्चात स्नान कर नए वस्त्र परिधान करनेपर पुनः औक्षण करते हैं । औक्षण करते समय घरकी वयोवृद्ध स्त्रीद्वारा प्रथम कुमकुम एवं अक्षत लगाया जाता है । उपरांत अर्धवर्तुलाकार पद्धतिसे तीन बार सुपारी एवं अंगूठी घुमाकर आरती उतारी जाती है । अंतमें अर्धवर्तुलाकार पद्धतिसे तीन बार घुमाकर आरती उतारी जाती है । इस दिन घरकी स्त्रीद्वारा पुत्र तथा पतिका औक्षण किया जाता है ।

४ अ. नरक चतुर्दशीके दिन स्त्रीद्वारा पुत्र तथा पतिका औक्षण किए जानेका कारण

        पुरुषोंमें लयसे संबंधित ऊर्जा तरंगोंको ग्रहण करनेकी क्षमता होती है । नरक चतुर्दशीके दिन वायुमंडलमें प्रक्षेपित लयसंबंधी तरंगें, स्त्रियोंकी तुलनामें पुरुषोंद्वारा १० प्रतिशत अधिक मात्रामें ग्रहण होती हैं । इस दिन स्त्रीद्वारा पुत्र एवं पतिका औक्षण किए जानेसे उन्हें स्त्रीसे उत्त्पत्तिसंबंधी ऊर्जा प्राप्त होती है । स्त्रीद्वारा प्राप्त उत्पत्तिसंबधी ऊर्जाके कारण पुरुषद्वारा ग्रहण की गई लयसंबंधी तरंगें क्रियाहीन होती हैं । परिणामस्वरूप पुरुषोंका लयकी ओर मार्गक्रमण रुक जाता है । इस प्रक्रियाद्वारा पुरुषोंका रक्षण होता है ।

५. ब्राह्मणभोजन

नरक चतुर्दशीपर ब्राह्मण भोजन कराना अर्थात धर्मकार्यके लिए ब्राह्मणके माध्यमसे अवतरित ईश्वरके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना । इस माध्यमसे ब्रह्मांडमें संचारित धर्मतरंगोंका पोषण किया जाता है । तथा पृथ्वी पर आनेवाली कष्टदायक अधोगामी अर्थात नीचेकी ओर जानेवाली तरंगें नष्ट करने हेतु प्रत्यक्ष कार्य करनेके लिए ईश्वरका आवाहन किया जाता है । इस माध्यमसे धर्मकर्तव्यका पालन होता है तथा व्यक्ति ईश्वरकी कृपाशीर्वादरूपी तरंगें ग्रहण कर पाता है ।

६. वस्त्रदान

नरक चतुर्दशीके दिन दोपहरके उपरांत वस्त्रदान भी किया जाता है । वस्त्रदान करना अर्थातदेवताओंकी तरंगोंको भूतलपर आनेके लिए आवाहन करना । इस माध्यमसे ईश्वरको प्रत्यक्ष कार्य करनेके लिए जागृत किया जाता है । धर्मकार्यके लिए समर्पित व्यक्तिको वस्त्रदान करनेसे दानकर्ताकी आध्यात्मिक उन्नति होती है ।

७. प्रदोषपूजा

नरक चतुर्दशीपर प्रदोषकालमें अर्थात सूर्यास्तके उपरांत विशिष्ट कालमें भी कुछ धार्मिक विधियां की जाती हैं । प्रदोषकाल प्रत्येक दिन विभिन्न कालावधिका होता है । इसके बारेमें पंचांगमें जानकारी दी होती है । इस कालमें की जानेवाली धार्मिक विधियां अधिक फलदायी होती हैं ।

नरक चतुर्दशी के दिन प्रदोषकालमें की जानेवाली एक विधि है, …..

१. यमदीपदान

दीपावलीके कालमें धन त्रयोदशी, नरक चतुर्दशी एवं यमद्वितीया, इन तीन दिनोंपर यमदेवके लिए दीपदान करते हैं । इनमें धनत्रयोदशीके दिन यमदीपदानका विशेष महत्त्व है । यमदीपदान करनेसे यमदेव संतुष्ट होते हैं । इससे व्यक्तिका अपमृत्युसे रक्षण होता है । नरक चतुर्दशी के दिन ब्राह्मणभोजन, वस्त्रदान, दीपदान, प्रदोषपूजा और शिवपूजा इत्यादि विविध धार्मिक विधियां की जाती हैं ।

२. प्रदोषपूजा

प्रदोष काल अर्थात सूर्यास्तके उपरांत ७२ मिनिट

नरकप्राप्तिसे बचने हेतु तथा पापोंकी निवृत्ति हेतु, प्रदोषकालमें की जानेवाली पूजामें चार बत्तियोंवाला दीपक जलाना चाहिए । और इस श्लोकका उच्चारण करना चाहिए,

दत्तो दीपश्चतुर्दश्यां नरकप्रीतये मया ।
चतुर्वर्तिसमायुक्त: सर्वपापापनुत्तये ।। – लिंगपुराण

इसका अर्थ है, आज चतुर्दशी के दिन नरक के अभिमानी देवता की प्रसन्नता के लिए तथा समस्त पापोंके विनाशके लिए मैं चार बत्तियोंवाला चौमुखा दीप अर्पित करता हूं ।

इस पूजामें कालके माध्यमसे क्रियाशक्ति का पूजन कर उसका संवर्धन किया जाता है । इस माध्यमसे व्यक्तिके चित्तपर कालमहिमा का संस्कार अंकित होकर उसके अनुसार आचरण करना तथा उच्च स्तर की अवस्था प्राप्त करना उसके लिए संभव होता है ।

८. शिवपूजा

नरक चतुर्दशीके दिन शिवपूजा भी की जाती है । समष्टिको अर्थात समाजको कष्ट देनेवाली अधोगामी अर्थात नीचेकी ओर जानेवाली तरंगोंके निर्दालन के लिए ईश्वरके मारक रूपकी पूजा कर उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना, शिवपूजाद्वारा साध्य होता है । इस माध्यमसे ईश्वरकी प्रत्येक कृतिके प्रति आत्मीयभाव निर्मित होकर आगे भाववृद्धि होती है तथा ईश्वरसे एकरूप होनेकी दृष्टिसे मार्गक्रमण होता है ।

९. दीपप्रज्वलन

नरक चतुर्दशीपर प्रातः तथा विशेष रूपसे सायंकालमें घर आंगन, तुलसी वृंदावन एवं अन्य स्थानोंपर यथाशक्ति तेलके दीप जलाए जाते हैं ।

९ अ. नरक चतुर्दशीके दिन विविध स्थानोंपर दीप जलानेका कारण

नरक चतुर्दशीके दिन ब्रह्मांडके चंद्रनाडीका स्थित्यंतर सूर्यनाडीमें होता है । इसके सूक्ष्म-स्तरीय परिणाम समझ लेते हैं – इस दिनकी  पूर्वरात्रिसेही वातावरण दूषित तरंगोंसे युक्त बनने लगता है । पातालकी अनिष्ट शक्तियां इसका लाभ उठाती हैं । वे पातालसे कष्टदायक नादयुक्त तरंगे प्रक्षेपित करती हैं । इन कष्टदायक नादतरंगों की निर्मिति रज-तमात्मक गतिक्रिया द्वारा उत्पन्न ऊर्जासे होती है । इन तरंगोंको प्रतिबंधित करने हेतु विविध स्थानोंपर दीप जलाए जाते हैं । दीपोंसे प्रक्षेपित तेजतत्त्वात्मक तरंगें वायुमंडलके कष्टदायक रज-तम कणोंका विघटन करती हैं । इस प्रक्रियाके कारण अनिष्ट शक्तियोंका सुरक्षाकवच नष्ट होनेमें सहायता मिलती है ।  इसीको दीपकी सहायतासे अनिष्ट शक्तियोंका संहार करना कहते हैं । नरकसे पृथ्वीपर अवतीर्ण अनिष्ट शक्तियोंके विघटन दिनकी दृष्टिसे नरक चतुर्दशीका विशेष महत्त्व है ।

१०. नरक चतुर्दशीके दिन की जानेवाली कृतियोंका भक्तियोगानुसार महत्त्व

कृति महत्त्व (प्रतिशत)
१. ब्राह्मणभोजन २०
२. वस्त्रदान १०
३. दीपदान २०
४. प्रदोषपूजा २०
५. शिवपूजा ३०
कूल १००

इस सारणीसे स्पष्ट होता है कि, नरक चतुर्दशी के दिन विविध धार्मिक कृतियां करनेके लिए क्यों कहा गया है ।

११. नरकचतुर्दशीका भावार्थ बता रहे हैं, सनातनके संत प.पू. पांडे महाराजजी

इस दिन सूर्योदयसे पहले उबटन लगाकर, शरीरकी मैल उतारें एवं स्नान करें । घरद्वार व दुकानको स्वच्छ कर, रंगोली सजाकर, उसमें रंग भरकर आंगन सुशोभित करें ।  परंतु यह सर्व बाह्य रूपसे ही है । मनकी मैल, बुरे विचार दूर करनेकी बात सूझती भी नहीं । बुरे विचारोंके कारण समाजमें दूषित वातावरण निर्माण होता है । यहां-वहां कूडा- कचरा, प्रदूषणसे स्वास्थ्यपर अनिष्ट परिणाम होता है । इस प्रकार नरक समान स्थिति हो जाती है । ऐसेमें समाजसे बुरे विचारोंकी मलिनता हटानेके लिए, अपने हाथमें ज्ञानरूपी झाड़ू उठानेसे ही स्वच्छता होती है ।

इसीलिए सीमित अवधितक प्रसन्न दिखाई देनेवाला वातावरण, सदाके लिए प्रदूषित रहता है । जबतक मनकी मलिनता नहीं निकलती एवं उसके स्थानपर दैवी विचारोंकी स्थापना नहीं होती, तबतक नरकचतुर्दशीका महत्त्व नहीं समझमें आता । संक्षेपमें, नरकचतुर्दशी कहती है, `बुरी वृत्तिको जडसे मिटा दो । दुर्गंधको दूर करो, तब ही हम खरे अर्थसे दीपावली मना पाएंगे ।

नरकचतुर्दशीके दिन प्रात: अलक्ष्मीका मर्दन कर अपनेमें नरकरूपी पापवासनाओंका समूल नाश कर, अहंकारका उच्चाटन करना चाहिए । तब ही आत्मापर पडा अहंका पट अर्थात परदा हटेगा और आत्मज्योत प्रकाशित होगी । इस दिन भगवान श्रीकृष्णने नरकासुरका वध किया ।

इसका अर्थ है, `दुर्जन शक्तिपर सज्जन शक्तिकी विजय ।’ जिस समय सज्जन शक्ति जागृत होती है और वह संगठितरूपसे कार्य करने लगती है, तब दुर्जन शक्ति निष्प्रभावी बनती है । `प्रत्येक व्यक्ति स्वयंमें आसुरीवृत्ति एवं विघातकवृत्तिको घटाकर, उसके स्थानपर दैवी वृत्तिकी स्थापना करे । आगे इसका परिणाम समाजपर होता है और फिर राष्ट्रपर ।’ इसलिए सज्जन संगठित होकर अपने ज्ञानसे समाजको लाभान्वित करें । यही इस नरकचतुर्दशीसे स्पष्ट होता है ।

प.पू. महाराजजीके बताए अनुसार सच्चे रूपसे नरक चतुर्दशी मनानेके लिए मनसे तथा समाजसे कुविचार निकालकर बाहर फेंकनेके लिए प्रयास करनाही अधिक उपयुक्त होगा ।

संदर्भ : सनातनका ग्रंथ ‘त्यौहार, धार्मिक उत्सव व व्रत’