नवसंवत्सरारंभ (गुढीपाडवा)

वर्षारंभदिन एवं उसे मनानेका शास्त्र

चैत्र शुक्ल प्रतिपदाके दिन तेजतत्त्व एवं प्रजापति तरंगें अधिक मात्रामें कार्यरत रहती हैं । अत: सूर्योदयके उपरांत ५ से १० मिनटमेंही ब्रह्म ध्वजको खडाकर उसका पूजन करनेसे जीवोंको ईश्वरीय तरंगोका अत्याधिक लाभ मिलता है ।

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हिंदु संस्कृतिके अनुसार वर्षारंभका दिन

सर्व ऋतुओंमें बहार लानेवाली ऋतु है, वसंत ऋतु । इस कालमें उत्साहवर्द्धक, आह्लाददायक एवं समशीतोष्ण वायु होती है । इस प्रकार भगवान श्रीकृष्णजीकी विभूतिस्वरूप वसंतऋतुके आरंभका यह दिन है ।

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संवत्सर पूजन एवं संवत्सरारंभपर ध्वजा खडी करनेका शास्त्र

वर्षप्रतिपदाके दिन संवत्सरपूजन करनेका शास्त्र है । ब्रह्मदेवके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करनेके लिए, सभीकी मंगलकामना एवं सुरक्षाके लिए संवत्सरपूजन किया जाता है ।

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ब्रह्मध्वज उतारनेका प्रत्यक्ष कृत्य

सूर्यास्तके उपरांत तुरंत ध्वज उतारें । जिस भावसे हम ध्वज खडा करते हैं, उसी भावसे उसे उतारें, तो ही जीवको उससे चैतन्यकी प्राप्त होती है । उसके उपरांत निर्माल्य अर्थात ध्वजपूजनमें प्रयुक्त फूल-पत्री आदि सामग्रीको जलमें विसर्जित किया जाता है ।

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