यमधर्मके साथ धर्मानुकुल वार्तालाप कर पतिके पंचप्राण पुनः प्राप्त करनेवाली सती सावित्रि


        सती सावित्रिकी कथाका उल्लेख महाभारतमें है । पांडवोंके वनवासमें होते समय जयंद्रथने द्रौपदीका हरण किया । जयंद्रथको परास्त कर लौटकर आए युधिष्ठिरादी पांडव एवं द्रौपदी ऋषिमुनियोंके साथ बैठे थे, उस समय मार्कंडेय ऋषिने सावित्रिकी कथा कथन की । प्रातःस्मरणीय पंचकन्याओंमें जो समाविष्ट है, उस द्रौपदीको विशेषरूपसे यह कथा सुनाई गई । इससे सावित्रिकी महानता ध्यानमें आती है ।

सारिणी


१. वरसंशोधनके लिए सावित्रिका बाहर निकलना

        जन्मसे ही भाग्यशाली बच्चोंके भाग्यमें जो परिस्थिति होती है, वही परिस्थिति राजकन्या सावित्रीको प्राप्त हुई थी । भद्र देशके महापराक्रमी राजाकी वह इकलौती पुत्री थी । सावित्रिदेवीके मंत्रसे हवन करनेके कारण सावित्रिदेवीने प्रसन्न होकर यह सुंदर पुत्री राजाको प्रदान की, अतः उसका नाम ‘सावित्रि’ रखा गया था । सावित्रिके पिताका नाम अश्वपति था । वे पराक्रमी, धर्मनिष्ठ, प्रजाहितदक्ष एवं भारतीय राजधर्मके आदर्शके रूपमें विख्यात थे । स्त्री-जीवनके लिए आवश्यक संस्कार उसपर हुए ही थे; अपितु राजाकी इकलौती पुत्री होनेके कारण क्षत्रियोचित एवं राजपुत्रको योग्य ऐसी सभी विद्याओं एवं कलाओंमें भी वह प्रविण थी । तपास्वियोंसमान निरीह अंतःकरण, देवांगनाओं समान मोहित करनेवाला रूप एवं राजसभाके श्रेष्ठ संस्कारोंसे उत्पन्न हुई इन ऋजुताके त्रिवेणी संगमसे युक्त  सावित्रिका सुमधुर व्यक्तित्त्व महर्षियोंके भी आदरके पात्र बना था । सावित्रीने अपने बाल्यावस्थाकी दहलीज पार कर यौवनमें पदार्पण करनेपर उसके पिताने उसे अपने लिए पति चुननेकी अनुमति दी एवं अपने अमात्योंके साथ सेनासहित उसे जानेकी आज्ञा की । अत्यंत लज्जित होकर पिताकी आज्ञाका स्वीकार कर सावित्री वरसंशोधनके लिए बाहर निकली ।

 

२. सत्यवानको चुनना

        एक दिन देवर्षि नारद राजा अश्वपतिके राजसभामें उपस्थित हुए । राजाने उनका आदरसहित सम्मान किया । वे दोंनो एकदूसरेके साथ वार्तालाप कर रहे थे, उसी समय सावित्रि लौट आई । सभामें आते ही उसने अपने पिताके साथ नारदजीको भी वंदन किया । नारदजीने एकबार उसकी ओर दृष्टिक्षेप डालकर राजाको पूछा, ‘‘क्या अभी भी इस कन्याका विवाह नहीं हुआ ? इसका क्या कारण है ?’’उसे वरसंशोधन हेतु भेजा था, राजाने नारदजीको ऐसा प्रतिउत्तर दिया एवं इस बीच जो घटा, उसे सावित्रिको कथन करनेके लिए सूचित किया । राजाके सूचित करते ही सावित्रिने कहा, ‘‘शाल्व देशमें द्युमत्सेन नामका एक प्रसिद्ध धर्मात्मा राजा था । कुछ काल पश्चात वह अंध हुआ । उसका पुत्र भी छोटा था । इस अवसरका लाभ ऊठाकर पडोसी राजाने उसका राज्य छीन लिया । तब द्युमत्सेन अपनी रानी एवं पुत्रके साथ वनमें गया एवं वहींपर तपस्वी जीवन बिताने लगा । उसका अभी-अभी युवक बना सत्यवान नामक पुत्र मुझे योग्य वर प्रतीत हुआ एवं उसीको मैंने मनसे वरित किया है ।’’

 

३. सत्यवान-सावित्रिका विवाहसंस्कार

सुसंपन्न होना एवं अपने गुणोंसे सभीको संतुष्ट रखना

        सत्यवानके गुणोंकी स्तुति कर नारदजीने कहा, ‘‘इस सत्यवानके मातापिता सत्यवादी होनेके कारण ब्राह्मणोंने उसका नाम सत्यवान रखा है । किंतु राजन, एक अत्यंत दुःखकी बात यह है कि, आजसे एक वर्षके पश्चात सत्यवानकी मृत्यु होनेवाली है ।’’ अपने भावी पतिका जीवन केवल एक वर्षका है, यह जानकर भी सावित्रि निश्चल रही । यह देखकर नारदजीने कहा, ‘‘राजन, तुम्हारे बेटीकी, सावित्रिकी बुद्धि निश्चयात्मक है; अतएव उसे किसी भी प्रकारसे इस निर्णयसे विचलीत करना असंभव है । सत्यवानमें जो गुण हैं, वे अन्य किसी भी पुरूषमें नहीं है; अतएव मुझे भी यह लगता है कि, आप उसे ही कन्याका दान करें ।’’ एक शुभमुहुर्तपर सत्यवान-सावित्रिका विवाहसंस्कार सुसंपन्न हुआ । पतिके घरमें प्रवेश करनेके पश्चात सावित्रिने अपने मूल्यवान वस्त्रं एवं अलंकार उतारें । उसकी नम्रता, सेवा, संयम इत्यादि गुण देखकर सभी संतुष्ट हुए । मधुर वार्तालाप, सेवातत्परता, संयम आदि गुणोंसे सास श्वशुरको, तो अंतःकरणपूर्वक सेवा कर सावित्रिने पतिको भी संतुष्ट रखा । कुछ समय आंनदमें बित गया ।

 

४. सत्यवानके प्राणोंका हरण

होना एवं सावित्रि तुरंत ही उनके पीछे जाना

        सावित्रि मन ही मन एकएक दिन गिन रही थी । नारदजीके वचनका उसे स्मरण था । जब उसके ध्यानमें आया कि, आजसे चौथे दिन सत्यवानका अंतसमय है, तब उसके पूर्वकी तीन रात्रिसे ही उसने व्रत धारण किया । दिनरात वह अत्यंत निश्चल रूपसे बैठी रही । पतिके मृत्युदिनके पूर्वकी संपूर्ण रात्रि वह जगी रही  । दूसरे दिन नित्यकर्म निपटाकर सूर्योदयके कुछ समय पश्चात उसने अग्निमें आहुतियां अर्पण की । सत्यवान हाथमें कुल्हाडी लेकर समिधा एवं फल लानेके लिए वनमें जानेके लिए निकला । सावित्रि भी सास-श्वशुरकी अनुज्ञा लेकर सत्यवानके साथ जानेके लिए निकली । वनमें काम करते हुए  सत्यवानने सावित्रिको कहा, ‘‘मुझे थकानसी हो रही है । अब मैं सोना चाहूंगा  ।’’ उसका यह वक्तव्य सुनकर सावित्रि उसके समीप आई । भूमिपर बैठकर उसने उसका मस्तक अपने गोदमें लिया । इतनेमें उसे वहां एक पुरुष दिखाई दिया । उसने लाल रंगके वस्त्रं परिधान किए थे एवं उसके माथेपर मुकुट था । उसके नेत्र लाल थे । हाथमें पाश था एवं वह अत्यंत भयंकर दिख रहा था । वह सत्यवानके सामने खडा रहकर उसे ही निहार रहा था । उसे देखकर सावित्रिने सत्यवानका मस्तक धरतीपर रख दिया एवं वह खडी हो गई । उसका हृदय धडक रहा था । अत्यंत व्यथित होते हुए हाथ जोडकर उसने उसे कहा, ‘‘आप कोई देवता हैं, ऐसा मैं समझती हूं । यदि आपकी इच्छा हो, तो आप मुझे बताएं कि, आप कौन है एवं यहां क्या करना चाहते  हैं ?’’ उस देवताने प्रतिउत्तर किया, ‘‘सावित्रि, तुम पतिव्रता एवं तपस्विनी हो । अतः मैं तुम्हारे साथ बात करूंगा । मैं यमराज हूं । सत्यवानका जीवनकाल समाप्त हो चुका है । यह धर्मात्मा गुणोंका सागर है; इसलिए उसे ले जानेके लिए मैं स्वयं आया हूं । अब मैं इसे पाशमें  बांधकर ले जानेवाला हूं  ।’’ ऐसा कहकर सत्यवानकी देहसे अंगुष्ठमात्र पुरुषको अपने पाशमें बांधकर यमराज दक्षिणकी ओर निकलने लगे । तब दुःखसे विह्वल सावित्रि भी तुरंत उनके पीछे जाने लगी ।

 

५. यमधर्मकी ओरसे प्रथम वरकी प्राप्ति

        कुछ दूरीपर जानेके पश्चात यमराजने कहा,‘‘सावित्रि, तुम लौट जाओ । अब इसका उत्तरकर्म करों । तुम पतिसेवाके ऋणसे मुक्त हो गई हो । पतिके साथ तुम्हें जहांतक आना चाहिए, वहांतक तुम आई हो ।’’ सावित्रिने कहा, ‘‘मेरे पतिदेवको जहांतक ले जाया जाएगा अथवा जहांतक वे स्वयं जाएंगे, वहां मुझे भी जाना ही चाहिए । यही सनातन धर्म है । तपश्चर्या, गुरुभक्ति, पतिप्रेम, व्रताचरण एवं आपके अनुग्रहके कारण मेरी गति कहींपर भी ठहरना असंभव है ।’’
उसके इस वक्तव्यपर यमराज संतुष्ट हुए । सत्यवानके प्राणोंको छोडकर कोई भी वर मांगनेके लिए उन्होंने सावित्रिको कहा । उस समय इकलौता पुत्र खोए हुए श्वशुरकी प्रतिमा उसके दृष्टीसमक्ष आई । उसने अपने श्वशुरके लिए दृष्टि, बल एवं तेजकी मांग की । यमराजने उसे ‘तथास्तु !’ कहकर लौट जानेको कहा । सत्यवानके पश्चात अपना क्या होगा, इसका तनिक भी विचार न कर उसने अपने श्वशुरके लिए वर मांग लिया । कितना यह असीम त्याग !!

 

६. यमधर्मकी ओरसे द्वितीय वरकी प्राप्ति

        सावित्रि यमराजके पीछे जाती ही रही । लौट जानेकी सूचना करनेवाले यमराजको उसने कहा, ‘‘जंहा मेरे प्राणनाथ रहेंगे, वहींपर मुझे होना चाहिए । इसके अतिरिक्त मेरी और एक बात सुनिएं । सत्पुरुषोंका केवल एक समयका सहवास भी अत्यंत लाभदायक होता है । उसकी अपेक्षा उनसे मैत्री होना श्रेष्ठ है । सत्संगति कभी भी व्यर्थ नहीं होती ; अतएव निरंतर सत्पुरुषोंके साथ रहना चाहिए ।’’ उसके इस कल्याणकारी वक्तव्यके कारण यमराजने उसे ‘पतिके प्राणके अतिरिक्त किसी भी वस्तुकी मांग करें’, ऐसा कहा ।  सावित्रिने अपने श्वशुरजीका छीना गया राज्य उन्हें अपनेआप प्राप्त हो एवं वे अपने धर्मपालनका त्याग न करें, इस वरकी मांग की । यमराजने ‘तथास्तु !’ कहकर उसे लौट जानेको कहा । श्वशुर राजकार्य ‘धर्मसे’ करें, इस मांगमें उसकी धर्मके प्रति होनेवाली अचल निष्ठा प्रदर्शित होती है !

 

७. दुहिता सावित्रि !

        चलते-चलते सावित्रिने यमराजको कहा, ‘‘समस्त प्रजाका नियमन कर आप उसे इच्छित फल भी देते हैं; इसलिए आप ‘यम’ नामसे परिचित हैं । इसलिए अब मैं जो कुछ कहूंगी उसे सुनिए । मन, वचन एवं कर्मसे समस्त प्राणियोके साथ विद्रोहरहित आचरण करना, सभीपर अनुग्रह करना एवं दान देना ही सत्पुरुषोका सनातन धर्म है । अधिकतर इसी प्रकारका ही यह समस्त लोक है । सभी लोग यथाशक्ति कोमलतापूर्वक व्यवहार करते हैं; किंतु जो सत्पुरुष होते हैं, वे अपनी शरणमें आए शत्रुपर भी दया करते हैं ।’’ उसके इस वक्तव्यपर संतुष्ट होकर यमराजने उसे तृतीय वरकी मांग करनेकी अनुमति दी । तृतीय वरमें सावित्रिने अपने पिताके लिए १०० पुत्रोंकी मांग की । यमराजने उसकी वह भी इच्छा पूरी की एवं उसे लौटनेके लिए कह दिया । सास-श्वशुरका कल्याण करनेके उपरांत अपने पिताको अपने पश्चात कोई भी संतान नहीं है, यह बात उसके ध्यानमें आई ।  उसने तो सत्यवानके साथ ही जानेका निर्णय मनही मन किया ही था । कन्याको ‘दुहिता’ कहते हैं । ससुराल एवं पीहरका दोंनोंका हित साध्य करनेवाली ‘दुहिता’नामसे जानी जाती है! कितने उत्तम प्रकारसे उसने अपना कर्तव्य निभाया !

 

८. यमधर्मकी ओरसे चतुर्थ वरकी प्राप्ति

        कुछ दूरीपर जानेके पश्चात सावित्रिने यमधर्मको बताया कि, ‘‘पतिदेवके सहवासके कारण यह दूरी दूरी नहीं लगती । इससे अधिक मात्रामें तो मेरे मनकी गति है; अतः मैं जो कुछ कहूंगी, उसे सुननेकी कृपा करें । आप विवस्वानके (सूर्य) पराक्रमी पुत्र हैं, अतः आपको ‘वैवस्वत’ कहते हैं । आप शत्रु-मित्रमें भेदभाव न कर सभीके साथ समानतासे न्याय करते हैं । अतएव सभी प्रजा धर्मका आचरण करती है । इसलिए आप ‘धर्मराज’ नामसे भी परिचित  हैं ।’’ उसके इस वक्तव्यपर प्रसन्न होकर यमराजने सावित्रीको चतुर्थ वर प्रदान किया । इस वरसे उसने उसके कुलकी वृद्धि करनेवाले बलवान एवं पराक्रमी १०० पुत्रोंकी मांग की । पहली ही बार सावित्रिने अपने लिए कुछ मांगा!  यमराजने आंनदित होकर उसे यह वर दिया एवं कहा कि, तुम अधिक दूरतक आई हो । अब लौट जाओ ।

 

९. यमधर्मकी ओरसे सत्यवानके प्राण पुनः प्राप्त !

        सावित्रि यमधर्मके साथ आगे-आगे जाती ही रहीr । उसने कहा, ‘‘सत्पुरुषोंकी वृत्ती निरंतर धर्ममें ही रहती है । वे कभी दुःखी अथवा व्यथित नहीं होते । सत्पुरुषोंका सत्पुरुषोंके साथ होनेवाला समागम कभी भी निष्फल नहीं होता । सत्पुरुष सत्यके बलपर सूर्यको भी अपने पास बुलाते हैं । वे अपने तपोबलपर पृथ्वीको भी धारण करते हैं । सत्यमें रहनेके कारण सत्पुरुषोंको कभी खेद नहीं होता । यह सनातन सदाचार सत्पुरुषोंद्वारा आचरणमें लाया गया है, यह ध्यानमें रखते हुए सत्पुरुष परोपकार करते हैं एवं भुगतानकी ओर कभी ध्यान नहीं देते ।’’ उसका यह धर्मानुकुल वचन सुनकर यमने पांचवा वर मांगनेके लिए कहा । तब सावित्रिने कहा,‘ हे धर्मराज, आपने मुझे जो पुत्रप्राप्तिका वर दिया है, वह दांपत्यधर्मके बिना पूर्ण होना असंभव है; अतः मैं यही वर मांगती हूं कि, मेरे पति जिवित हो । इससे अपना वचन  सत्य होगा; क्योंकि पतिके बिना मैं मृत्युके मुखमें ही हूं । पतिके बिना मुझे अन्य किसी भी सुखकी इच्छा नहीं है । स्वर्गकी भी कामना नहीं है । प्रत्यक्ष श्रीलक्ष्मीमाता समक्ष आई, तो मुझे उसकी भी आवश्यकता नहीं है । इतना ही नहीं, तो पतिके बिना मैं जिवित भी नहीं रहना चाहती । आपने ही मुझे १०० पुत्रोंकी प्राप्तिका वर दिया है एवं तब भी आप मेरे पतिको ले जा रहे हो; इसलिए मैंने जिस वरकी मांग की है, उसीके द्वारा ही आपका वचन सत्य होगा ।’’

 

१०. यमराजने प्रसन्न होकर सत्यवानका पाश निकालकर उसे मुक्त करना

        उन्होंने ‘तथास्तु !’ कहते हुए सत्यवानका पाश निकालकर उसे मुक्त किया । उन्होने कहा, ‘‘हे कल्याणी ! लो, मैंने तुम्हारे पतिको मुक्त किया है । अब यह सर्व प्रकारसे  निरोगी होगा । उसकी समस्त इच्छाएं पूर्ण होगी । यह तुम्हारे साथ चारसौ वर्ष जिवित रहेगा । धर्मपूर्वक यज्ञ-अनुष्ठानके माध्यमसे समस्त लोगोंमें किर्ति प्राप्त करेगा । उससे तुम्हें १०० पुत्र प्राप्त होंगे !’’ यमराज जब लौटकर जानेके लिए निकले, तब सावित्रिने उन्हें वंदन किया एवं उनके द्वारा प्राप्त कृपाके कारण कृतज्ञता व्यक्त की । यमराजके चले जानेके पश्चात सावित्रि सत्यवानके अचेतन देहके समीप आई । उसने उसका मस्तक पुनः अपने गोदमें लिया । धीरे धीरे सत्यवानकी देहमें चैतन्य आया एवं वह उठकर बैठा |

 

११. यमधर्मके साथ धर्मानुकुल

वार्तालाप कर सावित्रिने पतिके पंचप्राण पुनः प्राप्त करना

        प्रत्यक्ष यमधर्मके साथ धर्मानुकुल वार्तालाप कर सुशील, कुलीन, गुणवान सावित्रिने अपने पतिके पंचप्राण पुनः प्राप्त किए । प्रत्येक हिंदु पतिव्रताके हृदयमें अचल स्थान प्राप्त करनेवाली सती सावित्रिको शतशः प्रणाम !’

– श्री. संजय मुळ्ये, रत्नागिरी (समाचार पत्रिका सनातन प्रभात, ३०.६.२००७)