वीर शिरोमणि दुर्गादासजी राठोड

        वीर शिरोमणि दुर्गादासजी राठोड मेवाडके इतिहासमें स्वामिभक्तिके लिए जहां पन्ना धायका नाम आदरके साथ लिया जाता हैं, वहीं मारवाडके इतिहासमें त्याग, बलिदान, स्वामिभक्ति एवं देशभक्तिके लिए वीर दुर्गादासजीका नाम स्वर्ण अक्षरोंमें अमर है । वीर दुर्गादासजीने वर्षों मारवाडकी स्वतंत्रताके लिए संघर्ष किया, ऐसे वीर पुरुषका जन्म मारवाडमें करनोत ठाकुर आसकरणजीके घर संवत् १६९५ श्रावण शुक्ल चतुर्दशीको हुआ था । आसकरणजी मारवाड राज्यकी सेनामें जोधपुर नरेश महाराजा जसवंत सिंहजीकी सेवामें थे । अपने पिताकी भांति बालक दुर्गादासमें भी वीरता कूट कूट कर भरी थी ।

सारणी

        १. वीरताका परिचय

        २. स्वामिभक्ति

        ३. देशभक्ति

        ४. निस्वार्थ स्वामिभक्ति

        ५. भारतीय मुसलमानोंके लिए आदर्श छत्रपती शिवाजी महाराज एवं वीर दुर्गादासजी राठोड


१. वीरताका परिचय

एक बार जोधपुर राज्यकी सेनाके ऊंटोंको चराते हुए राईके (ऊंटों के चरवाहे) आसकरणजीके खेतोंमें घुस गए । बालक दुर्गादासने विरोध किया परंतु चरवाहोंने उनकी ओर कोई ध्यान नहीं दिया । तब वीर दुर्गादासने क्रोधित होकर तलवार निकाल ली और एक पल भी गंवाए बिना ऊंटका सिर उडा दिया । यह समाचार जब महाराज जसवंत सिंहजीके पास पहुंचा तो वे उस वीर बालकको देखनेके लिए उतावले हो उठे एवं अपने सैनिकोंको दुर्गादासको ले आनेका आदेश दिया । अपनी राजसभामें महाराज उस वीर बालककी निडरता एवं निर्भीकता देख अचंभित रह गए । आसकरणजीने अपने पुत्रको इतना बडा अपराध निर्भीकतासे स्विकारते देखा तो वे सकपका गए । परिचय पूछने पर महाराजको ज्ञात हुआ की यह आसकरणजीका पुत्र है, तो महाराजने दुर्गादासको अपने पास बुलाकर पीठ थपथपाई और पुरस्कारस्वरूप तलवार भेंट कर अपनी सेनामें भर्ती कर लिया ।

उस समय महाराज जसवंत सिंहजी दिल्लीके मुगल सम्राट (बादशाह) औरंगजेबकी सेनामें प्रधान सेनापति थे, इसके पश्चात् भी औरंगजेबकी दृष्टि जोधपुर राज्यपर थी और वह सदैव जोधपुर हडपनेके विचारमें रहता था । संवत् १७३१ में गुजरातमें मुगल साम्राज्यके (सल्तनत) विरोधमें उठे विद्रोहको दबाने हेतु जसवंत सिंहजीको भेज दिया । इस विद्रोहको दबानेके पश्चात् महाराजा जसवंत सिंहजी काबुलमें पठानोंके विद्रोहको दबाने हेतु चल दिए और दुर्गादासकी सहायतासे पठानोंका विद्रोह शांत करनेके साथ ही वीर गतिको प्राप्त हो गए ।

 

२. स्वामिभक्ति

उस समय महाराज जसवंत सिंह को कोई पुत्र नहीं थे और उनकी दोनों रानियां गर्भवती थीं । ऐसी स्थितिमें मुगल सम्राट औरंगजेबको हस्तक्षेप करनेका अवसर प्राप्त हुआ, उसने मारवाड हेतु मुस्लिम शासनकर्ताकी नियुक्ति की, जिसने राठौर वंशको अत्यंत अस्वस्थ किया ।  दोनोंने एक-एक पुत्रको जन्म दिया । एक पुत्रकी मार्गमें ही मृत्यु हो गई और दूसरे पुत्र का नाम अजीत सिंह था । मारवाडके वास्तविक उत्तराधिकारीके जन्मके पश्चात, वहांके भद्र (सज्जन)व्यक्ति दुर्गादासके साथ शिशु अजीत सिंहको लेकर देहली गए तथा औरंगजेबसे अनुरोध किया कि इस शिशुको उसके स्वर्गवासी पिताजीकी संपत्ति एवं पदवीका उत्तराधिकारी घोषित किया जाए । औरंगजेबने पूरी तरहसे मना तो नहीं किया, किंतु सुझाव दिया कि अजीत सिंहकी सुरक्षा हेतु देहलीमें ही औरंगजेबके निरीक्षणमें उनका पालनपोषण हो ।

राठौर वंशके प्रमुखका पालनपोषण औरंगजेबके कट्टर मुस्लिम परिवारमें हो, यह उस वंशको स्वीकार नहीं था । राजकुमार अजीत सिंह अपनी माताजीके साथ नई देहलीके ‘झांदेवलन’ के निकट `भूली भटियारी’ प्रासादमें रहते थे । दुर्गादास तथा अन्य प्रतिनिधिमंडलने अजीत सिंहको देहलीसे बाहर ले जानेका निश्चय किया । दुर्गादास तथा उनके ३०० साथियोंने ठाकुर मोकम सिंह बलुंदा तथा मुकंद दास खिचीने योजना बनाई । योजनाके अनुसार मोकम सिंह बलुंदाकी पत्नी बाघेलीजीने अपनी शिशु कन्याको अजीत सिंहके स्थानपर रखा । जैसे ही वे शहरकी सीमातक पहुंचे, उन्होंने देखा कि मुगल पहरेदार दुर्गादास तथा उनके साथियोंका पीछा कर रहे थे, अपनेसे कई गुना अधिक संख्यामें मुगल सेनाके साथ युद्ध करते हुए उन्हें वहांसे निकल कर जाना था ।

बीच-बीचमें १५-२० राजपूत सैनिक रुककर देखते कि मुगल सेना कहातक पहुंची है, और मारे जाते । इस युद्धमें मोकम िंसह तथा उनके पुत्र हरि सिंह बलुंदा घायल हुए ,किंतु वे मुगलोंमें तथा अपनेमें अंतर रखनेमें सफल हुए । मोकम सिंह बलुंदाकी पत्नी बाघेली रानी उनके साथ थीं । यह सब संध्या समयतकतक चला । दुर्गादासके साथ अब ३०० मेंसे केवल ७ साथी बचे थे । किंतु उन्होंने अजीत सिंहको बलुंंदा मोकम सिंहकी पत्नीके पास सुरक्षित सौंपा, जहां महाराजा अजीत सिंह एक वर्षतक रहे । तदुपरांत अरवली पर्वतके निकट अबू सिरोली, दक्षिण मारवाडके दुर्गम क्षेत्रमें अत्यंत गोपनीय पद्धतिसे अजीत सिंहका पालनपोषण हुआ ।

 

३. देशभक्ति

        इस घटनाके पश्चात २० वर्षतक मारवाड मुगलोंके नियंत्रणमें था । अजीत सिंहके बडे होनेके पश्चात सिंहासनपर बैठाने तक वीर दुर्गादासजीको जोधपुर राज्यकी एकता एवं स्वतंत्रताके लिए दर-दरकी ठोकरें खानी पडी । औरंगजेबका बल एवं लोभ  दुर्गादासको नहीं डिगा सका ।  इस क्षेत्रके सारे व्यापारी मार्गोंकी लूट गुरिल्लाओंने (छापेमारोंने) की थी; जिन्होंने आजके राजस्थान एवं गुजरातके कई खजानोंको भी लूटा । इस अव्यवस्था तथा अशांतीके कारण साम्राजयकी अर्थव्यवस्थापर विपरित परिणाम हुआ ।
वर्ष १७०७ में औरंगजेबकी मृत्युके पश्चात उत्पन्न अशांतिका लाभ उठाकर दुर्गादासने जोधपुरपर विजय पाकर मुगलोंको सत्ताच्युत किया । अजीत सिंह जोधपुरके महाराजा घोषित किए गए । उन्होंने मुसलमानोंके द्वारा उध्वस्त किए मंदिरोंका पुनर्निर्माण किया । जोधपुरकी स्वतंत्रताके लिए दुर्गादासजीने अनुमाने २५ वर्षोंतक संघर्ष किया । जोधपुरमें सिंहासनके लिए होनवाले औरंगजेब संचालित षड्यंत्रोंके विरुद्ध लोहा लेते हुए अपने कर्तव्य-पथ पर डटे रहे । परंतु जीवनके अंतिम दिनोंमें दुर्गादासजीको मारवाड छोडना ही पडा ।

४. निस्वार्थ स्वामिभक्ति

        महाराज अजीत सिंहके कुछ लोगोंने दुर्गादासजीके विरुद्ध कान भर दिए थे, जिससे महाराज अजीत सिंह दुर्गादासजीसे अनमने रहने लगे । वस्तुस्तिथिको भांप कर दुर्गादासजीने मारवाड राज्य छोडना ही उचित समझा और वे मारवाड छोडकर उदयपुर, सादरी, रामपुरा, भानपुरा, रहकर कुछ दिनोंके पश्चात उज्जैनके महाकालके दर्शन हेतु निकल गए । वहीं क्षिप्रा नदीके तटपर उन्होंने अपने जीवनके अंतिम दिन बिताए एवं वहीं धर्म, रणनातिमें निपुण वीर दुर्गादासजीका  स्वर्गवास २२ नवंबर वर्ष १७१८ में हुआ । इनका अंतिम संस्कार क्षिप्रा नदीके तटपर किया गया था । ‘उनको न मुगलोंका धन विचलित कर सका और न ही मुगल शक्ति उनके दृढ हृदयको पीछे हटा सकी । वे एक ऐसे वीर थे, जिनमें राजपूती साहस एवं मुगलमंत्री समान कूटनीति थी ।’ दुर्गादासजी हमारी आनेवाली पीढियोंके लिए वीरता, देशप्रेम, बलिदान एवं स्वामिभक्तिकी प्रेरणा तथा आदर्श बने रहेंगे ।

५. भारतीय मुसलमानोंके लिए

आदर्श छत्रपती शिवाजी महाराज एवं वीर दुर्गादासजी राठोड

भारतीय मुसलमानोंमें आज अधिकतर वे मुसलमान हैं, जिनके पूर्वज बलपूर्वक हिंदुसे मुसलमान बनाए गए थे । उनके पूर्वजोंकी छातीपर तलवार रख दी गई, उनके जनेऊ तोड दिए गए और चोटी काट कर उन्हें बलात् मुसलमान बनाया गया ।

इसी कडीमें मुगल साम्राज्यमें सबसे अधिक इस्लामके निकट समझे जानेवाले औरंगजेबके समकालीन दो हिंदु राजाओं छत्रपति शिवाजी महाराज एवं वीर दुर्गादासजी राठोडको स्मरण करना चाहूंगा । छत्रपति शिवाजी महाराजका कार्यक्षेत्र महाराष्ट्र था, जबकि दुर्गादासजी राठोडका राजस्थान । यूं तो दोनों मातृभूमि और हिंदु धर्मकी रक्षाके लिए अपने जीवनको बलिवेदी पर समर्पित किए हुए थे; परंतु इन दोनों क्षत्रियोंके जीवनका एक अति विशिष्ट आचरण आजके नवयुवकोंके लिए अनुकरणीय हैं ।

८ वीं शताब्दीमें सिंधमें मुहम्मद बिन कासिमके आक्रमणसे लेकर अहमद शाह अब्दालीके कालमें लगभग १००० वर्षोंमें हिंदुओंको बलात् मुसलमान बनानेके व्यतिरिक्त बडे प्रमाणमें पर नारी जातिके अधिकारोंका शोषण भी हुआ । सिंधके राजा दाहिरकी पुत्रियोंको बंधक बनाकर बगदाद लेकर जाना अथवा खिलजीद्वारा रानी पद्मावतीको बलात् प्राप्त करनेका प्रयत्न करनेकी कहानियां तो जगत प्रसिद्ध हैं; परंतु इससे कहीं अधिक भयानक तो, युद्धके पश्चात् सैनिकोंद्वारा सहस्रों स्त्रियोंका बलात्कार करना अथवा उन्हें दासी (गुलाम) बनाकर गजनीके विपनीमें (बाजार) बेचना था ।

छत्रपति शिवाजी महाराज एवं दुर्गादासजी राठोड मुसलमानोंद्वारा नारी जातिकी ऐसी दुर्गतिसे भली-भांति परिचित थे; परंतु उनके वैदिक संस्कारोंकी विशेषता ही कहेंगेकी उन्होंने अपने विरोधियोंकी भांति पशुवत् व्यवहार नहीं अपनाया । छत्रपति शिवाजी महाराजके एक सैनिक अभियानमें उनके सेना नायकने कल्याणके मुस्लिम प्रांताधिपकी (सूबेदार) बहूको अपने अधिकारमें लेकर महाराजके सामने प्रस्तुत किया था; परंतु उन्होंने सर्वप्रथम लानेवाले सैनिकको दंडित किया और उस महिलाको माताकी उपाधिसे संबोधित कर क्षमा मांगकर उसे ससम्मान उसके स्थानपर पंहुचा दिया । अफजलखान जिसे परलोक पहुंचानेका श्रेय छत्रपति शिवाजी महाराजको जाता है ।

उसने छत्रपति शिवाजी महाराजसे प्रतापगढपर मिलनेसे पहले उनकी कुलदेवताका तथा अन्य अनेक मंदिर एवं मूर्तियां तोडी थीं । युद्धपर जानेसे पूर्व अपनी ६४ स्त्रियोंको केवल इस आशंकासे मार दिया था कि उसके लौट आने तक वे किसी औरसे संबंध न रखें । नारी जातिके प्रति कौन अनुसरण करने योग्य हैं, पाठकगण अबतक अवश्य समझ चुके होंगे । ऐसा ही वृतांत वीर दुर्गादासजी राठोडके जीवनसे हमें मिलता हैं । अपने सगे बापको कारागृहमें डालकर मारनेवाले तथा अपने सगे भाईयोंको राजसिंहासनके लिए मारनेवाले औरंगजेबका बेटा सलीम उससे विद्रोह कर दुर्गादासजी राठोडकी शरणमें आया था ।

कुछ समय पश्चात् किसी बातको लेकर अविश्वास होने पर वह सेनादल छोडकर भाग गया । वीर दुर्गादासजी राठोडके हाथ उसके बेटा-बेटी अर्थात् औरंगजेबके पोता-पोती आ गए । कहां तो औरंगजेबने मथुराके वीर गोकुलाको पकडकर उसके शरीरके टुकडे- टुकडे कर दिए और उसके बेटेकी सुन्नत कर उसे किसी मौलवीसे अरबी-फारसी सिखवा कर उसे आलिम-फाजिल बनवा दिया था तथा उसकी बेटीका (निकाह) विवाह बलात् एक मुसलमान नायकसे (सरदार) कर दिया था । उसका अनुसरण ना करके वीर दुर्गादासजी राठोडने आर्य मर्यादाका अनुसरण करते हुए औरंगजेबके पोता- पोतीको ससम्मान आगरा भिजवा दिया था । औरंगजेबको उन्हें पाकर ही मनः शांति मिली थी । हिंदु राजाओंका ऐसा शुद्ध आचरण सभी पंथोंके अनुयाइयोंके लिए आदर्श है । आशा है भारतीय मुसलमान इतिहासमें विशिष्ट परिचय रखनेवाले हिंदू राजाओंको अपना आदर्श मान कर उनके जीवनसे प्रेरणा लेंगे ।

संदर्भ : सर जदुनाथ सरकार, डॉ. विवेक आर्य (संकेतस्थल)