पुरुषों के अलंकार

१. पुरुष साधारणतः अलंकार क्यों नहीं पहनते ?

        पुरुष वैराग्यरूपी शिवतत्त्व का दर्शक है एवं अलंकार आकर्षण का प्रतीक है, इसलिए पुरुष साधारणतः अलंकार नहीं पहनते । पहले पुरुषों में अलंकार धारण करने की प्रथा थी; परंतु वर्तमानकाल में अधिकतर पुरुष अलंकार नहीं पहनते । पुरुषों का अलंकार पहनना उचित है अथवा अनुचित ? पुरुष सर्वव्यापी माया में विद्यमान वैराग्यरूपी शिवतत्त्व के दर्शक होते हैं । वैराग्यस्वरूप शिवतत्त्व माया के आलंबनद्वारा कार्य करता है; परंतु वह माया के स्वरूप को अपनी ओर आकर्षित नहीं करता । अलंकार आकर्षण का प्रतीक है, इसलिए साधारणतः पुरुष अलंकार धारण नहीं करते ।

२. अलंकारों के प्रकार

अ. रुद्राक्ष की बंधनमालाएं

रुद्राक्ष भगवान शिव के अंग का प्रतीक माना गया है। इसे धारण करने वाले के जीवन में कोई समस्याएं नहीं आती हैं। इसे धारण करने वाले व्यक्ति को कुछ नियमों का पालन करना पडता हैं, इसे कोई भी नहीं पहन सकता है। इसे अधिकतर गले में पहना जाता है। रुद्राक्ष भिन्न-भिन्न तरह के होते हैं और हर रुद्राक्ष के अलग-अलग फायदे होते हैं।

आपको बता दें कि सभी तरह के रुद्राक्ष धारण करने के एक जैसे ही नियम होते हैं। रुद्राक्ष हमारे जीवन में सभी तरह की सुख-समृधि लाता है पर इसे धारण करने के नियमों को अगर अपनाया ना जाए तो कई बार ये इससे कई नुकसान भी हो सकते है।

रूद्राक्ष पहनने के नियम

  • रुद्राक्ष धारण करने के बाद अंडे, मांस, मदिरा को त्याग देना चाहिए।
  • रात में सोते समय रुद्राक्ष उतार कर सोना चाहिए।
  • रुद्राक्ष को सिद्ध़ करने के बाद ही धारण करना चाहिए। साथ ही इसे किसी पवित्र दिन में ही धारण करना चाहिए।
  • श्मशान स्थल तथा शवयात्रा के दौरान भी रुद्राक्ष धारण नहीं करना चाहिए। इसके साथ ही जब किसी के घर में बच्चे का जन्म हो उस स्थल पर भी रुद्राक्ष धारण नहीं करना चाहिए।

प्राचीन काल में ऋषि-मुनि बाहु एवं कलाइयों पर रुद्राक्ष की बंधनमालाएं धारण करते थे । ये मालाएं हाथों के बिंदुओं पर पर्याप्त दबाव डालकर देह को बल प्रदान करतीं, कार्य के लिए देह में प्रेरणादायक शक्ति संक्रमित करती थीं तथा कार्य में अधीरता पर अंकुश रखती थीं ।’

रुद्राक्ष को हमेशा ह्रदय के पास धारण करना चाहिए, इससे हृदय रोग, हृदय का कम्पन और ब्लड प्रेशर आदि रोगों में आराम मिलता है।

आ. मुकुट

  • तेज के स्तर पर सूर्यनाडी द्वारा निरंतर सजगता और कार्यरतता बनाए रखना संभव होना : ‘प्राचीन काल में राजा का मुकुट, सिर की परिधि के बिंदुओं पर गोलाकार में समानरूप से दबाव उत्पन्न करता था । उसमें समाई रिक्ति द्वारा ब्रह्मांड की शक्तितत्त्वात्मक तरंगों को अपनी ओर आकृष्ट कर देह में तेज का संवर्धन करने हेतु पूरक सिद्ध होता था । अतः उनके लिए तेज के स्तर पर सूर्यनाडी द्वारा निरंतर सजगता एवं कार्यरतता बनाए रखना संभव होता था ।’

  • सात्त्विक राजाओं द्वारा स्वर्णमुकुट धारण करने से उनकी बुद्धि सात्त्विक होकर उनके लिए देवताओं से ज्ञान ग्रहण करना संभव होना एवं सर्व प्रसंगों में उचित निर्णय ले पाना : ‘सात्त्विक राजाओं द्वारा मुकुट धारण करने से उसमें विद्यमान सात्त्विकता के कारण उनकी बुद्धि सात्त्विक हो जाती थी । ब्रह्मदेव एवं श्री सरस्वती देवी से प्रक्षेपित ज्ञानतरंगें वे सहजता से ग्रहण कर पाते थे । अतः उनकी गहन विचार करने की वृत्ति थी एवं उनकी निर्णयक्षमता भी उत्तम थी । वे प्रजा को उचित निर्णय देते थे । प्रजा की सर्व समस्याओं पर उत्कृष्ट उपाय ढूंढते थे । ज्ञान के कारण उनकी बुद्धि सात्त्विक बनती थी तथा उनका विवेक सदैव जागृत रहता था । देवताओं द्वारा समय-समय पर प्राप्त मार्गदर्शन के कारण कठिन प्रसंगों में भी वे उचित निर्णय लेकर, न्याय कर पाते थे । इसलिए ऐसे राजाओं की संपूर्ण राजव्यवस्था भली-भांति चलती थी ।

  • मुकुट के रत्नों में उच्च देवताओं की शक्ति, चैतन्य, आनंद एवं शांति के स्तर की सूक्ष्मतर एवं सूक्ष्मतम तरंगें हीरों के रंगों के अनुसार आकृष्ट होना : ‘मुकुट का पार्श्व भाग स्वर्ण का बना होता है एवं उस पर विविध रत्न तथा हीरे जडे होते हैं । मुकुट के स्वर्ण में उच्च देवताओं की सूक्ष्मतम स्तर की तत्त्वतरंगें आकृष्ट होती हैं । मुकुट के रत्नों में उच्च देवताओं की शक्ति, चैतन्य, आनंद एवं शांति के स्तर की सूक्ष्मतर और सूक्ष्मतम तरंगें हीरों के रंगों के अनुसार आकृष्ट होती हैं, उदा. गुलाबी तथा लाल रंगों की ओर शक्ति की, पीले रंग की ओर चैतन्य की, नीले रंग की ओर आनंद की तथा श्वेत रंग की ओर शांति की तरंगें आकृष्ट होती हैं ।

  • मुकुट के रिक्त स्थान में उच्च देवताओं का निर्गुण तत्त्व कार्यरत होना : मुकुट के रिक्त स्थान में उच्च देवताओं का निर्गुण तत्त्व कार्यरत रहता है । मुकुट धारण करने से राजाओं को उच्च देवताओं के सगुण-निर्गुण दोनों स्तरों के तत्त्वों का लाभ मिलता था । उन्हें ज्ञान, पराक्रम, ऐश्वर्य, यश, कीर्ति इत्यादि गुणों की प्राप्ति होती थी और वे अपने कर्तव्य भली-भांति पूर्ण कर पाते थे ।

  • मुकुट धारण करने के उपरांत मुकुट का भार सिर पर पडता है, जिससे सिर के विविध बिंदुओं पर दबाव पडकर सूचीदाब (एक्यूप्रेशर) एवं आध्यात्मिक उपाय होते हैं ।’

इ. कुंडल

        ‘प्राचीन काल में ऋषि-मुनि एवं राजा कानों में कुंडल धारण करते थे । कुंडल पहनने से कर्णपालि के बिंदुओं पर दबाव पडता था और जीव की देह में वैराग्यभाव का संवर्धन होता था ।

र्इ. बाली

        कान में धारण की जानेवाली बाली पुरुषों के संयम में वृद्धि करती है, अर्थात क्रिया के स्तर पर संयम रखती है ।

संदर्भ ग्रंथ : सनातन का सात्त्विक ग्रंथ ‘स्त्री-पुरुषों के अलंकार

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