श्री गणेश मंत्र

साधनामंत्र

अ. ‘श्री गणेशाय नमः ।’ में ‘श्री’ अर्थात ‘श्रीं’ है तथा वह बीजमंत्र है । ‘गणेशाय’ मूल बीज की संकल्पना है, जबकि ‘नमः’ पल्लव है ।

आ. ‘ॐ गँ गणपतये नमः ।’

अर्थ : ‘ॐ’ अर्थात प्रणव, ‘गँ’ अर्थात मूल बीजमंत्र, ‘गणपतये’ अर्थात आकृति को एवं ‘नमः’ अर्थात नमस्कार करता हूं ।

बीजमंत्र

‘गँ’ गणपति का मूल बीजमंत्र है । गणपति की, अर्थात पंचमहाभूत के तेजप्रवाहों की उत्पत्ति जिस तेजसमूह से हुई, वह तेजसमूह ‘गँ’ इस बीजमंत्र में अंतर्भूत है । इसलिए ‘गँ’ का उच्चारण ‘गॅम्’ न होकर अनुनासिक ‘गम्’ ऐसा होता है । ‘ ँ ’ यह अनु-नासिकत्व का चिह्न है । अनुनासिक अर्थात मुखसहित नासिका से उच्चारित किया जानेवाला वर्ण । अथर्वशीर्ष में इस विषय में आगे दिए अनुसार उल्लेख है ।

गणादिं पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनन्तरम् ।
अनुस्वारः परतरः । अर्धेन्दुलसितम् ।
तारेण ऋद्धम् । एतत्तव मनुस्वरूपम् ।
गकारः पूर्वरूपम् । अकारो मध्यमरूपम् ।
अनुस्वारश्‍चान्त्यरूपम् । बिन्दुरुत्तररूपम् ।
नादः सन्धानम् । संहिता सन्धिः ।

अर्थ : (‘गँ’ मूलमंत्र का उच्चारण कैसा करें, यह बताया है ।) सर्वप्रथम गण शब्द में से ‘ग्’ उच्चारित करें; तदुपरांत वर्णों में पहला स्वर ‘अ’ उच्चारें; तत्पश्‍चात अनुस्वार उच्चारें, वह अर्धचंद्रयुक्त हो (सानुनासिक उच्चार करें) । यह ‘गँ’ ओंकारयुक्त होना चाहिए । (ओंकारसहित, अर्थात पहले ‘ॐ’ का उच्चारण कर पश्‍चात ‘गँ’ बीजमंत्र का उच्चारण करें ।) यह आपका मंत्रस्वरूप है । (यही स्पष्टीकरण पुनः दिया है ।) आरंभ में गकार, बीच में अकार, अंत में अनुस्वार तथा उत्तररूप बिंदु के एकत्रित उच्चारण से किया नाद, यह संहिता संधि है । यह वही गणेशविद्या (‘गँ’ बीजमंत्र लिखने का और उच्चारण करने का धर्मशास्त्रीय आधार) है ।

अ. ‘गँ’ के आवर्त्तन का परिणाम

१. मदार के मूल पर ‘गँ’ के आवर्त्तन का परिणाम : मदार के अर्थात श्‍वेत रुई के पेड के सामने ‘गँ’ के आवर्त्तन करने पर उस पौधे की एक जड ऊपर आती है । उसकी आकृति श्री गणेश के समान होती है । इसका कारण यह है कि ‘गँ’ के उच्चारण से उसके स्पंदन (शक्ति) वातावरण में निर्मित होते हैं । उसका पौधे की जड पर परिणाम होता है तथा ‘शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध एवं उससे संबंधित शक्ति का सह-आस्तत्व होता है’, अध्यात्म के इस सिद्धांत अनुसार, शक्ति के साथ ही श्री गणेश के रूप में जड बाहर आती है । सात-आठ वर्ष से अधिक आयु के श्‍वेत रुई के वृक्ष को भूमि से जडसहित उखाडने पर उसकी जड का आकार गणपति के समान दिखाई देता है ।

अंगारकयोग (मंगलवार की संकष्ट चतुर्थी) अथवा रविवार को पुष्य नक्षत्र हो, उस समय सात-आठ वर्ष से अधिक आयु के वृक्ष की षोडशोपचार पूजा कर अथर्वशीर्ष का पाठ करें । साधारणतः चतुर्थी से आरंभ कर दूसरी चतुर्थी तक एक सहस्र पाठ करें । इस पाठ के उपरांत हवन करने के इच्छुक हों, तो इस संदर्भ में पुरोहितों से पूछें । अंत में किसी से संभाषण तथा किसी को स्पर्श न करते हुए उस वृक्ष को जड से उखाडें । उसका आकार श्री गणेश समान ही होता है । इस संस्कारित मूर्ति को घर में स्थापित करें । इसकी पूजा से अनेक प्रकार की सिद्धियां एवं ऐश्‍वर्य प्राप्त होता है । मूर्ति की पूजा प्रतिदिन धूप, दीप एवं नैवेद्य दिखाकर अथर्वशीर्ष के पाठ से करें । शक्ति संक्रमित होकर नष्ट न हो, इस हेतु प्रायः ऐसी मूर्ति ढंककर रखते हैं ।

२. खारे पानी के चिकने छोटे गोल पत्थरों पर ‘गँ’ मंत्र का न्यूनतम वर्षभर उच्चारण करने पर उनकी आकृति गणपति के समान होती है । महान गणेशभक्त मोरया गोसावीजीने ऐसे अनेक गणपति बनाए थे ।

आ. गणेशविद्या – ध्वनि पर आधारित भारतीय लेखनशास्त्र

‘गँ’ बीजमंत्र की उचित प्रयोगपद्धति के बारे में ‘गणपति अथर्वशीर्ष’ स्तोत्र में उल्लेख है ।

अथर्वशीर्ष

थर्व अर्थात गरम, अथर्व अर्थात शांति एवं शीर्ष अर्थात मस्तक । जिसके पुरश्‍चरण से मस्तक को शांति प्राप्त होती है वह अथर्वशीर्ष है । भगवान जैमिनीऋषि के सामवेदीय शाखा के शिष्य मुद्गलऋषिने ‘साममुद्गल गणेशसूक्त’ लिखा । तदुपरांत उनके शिष्य गणकऋषिने ‘श्री गणपति अथर्वशीर्ष’ लिखा । अधिकांश मंत्रों में देवता का ध्यान, अर्थात मूर्ति का वर्णन पहले होता है एवं तदुपरांत स्तुति होती है । इसके विपरीत अथर्वशीर्ष में स्तुति पहले और तदुपरांत ध्यान होता है । अथर्वशीर्ष के तीन प्रमुख भाग हैं –

१. शांतिमंत्र : आरंभ में ‘ॐ भद्रं कर्णेभिः…।’ एवं ‘स्वस्तिन इन्द्रो…।’ यह मंत्र तथा अंत में ‘सह नाववतु …।’ मंत्र

२. ध्यानविधि : ‘ॐ नमस्ते गणपतये’ से ‘वरदमूर्तये नमः’तक के दस मंत्र

३. फलश्रुति : ‘एतदथर्वशीर्ष योऽधीते’ इत्यादि चार मंत्र

३. अ. अथर्वशीर्ष पाठ : इस स्तोत्र का पाठ करते समय यहां दी गई सूचनाओं की ओर ध्यान दें ।

  • उच्चारण बिलकुल स्पष्ट हो ।
  • स्तोत्रपाठ बिलकुल धीमे और एक ही गति में करें ।
  • स्तोत्रपाठ ‘तदर्थभावपूर्वक = तत् + अर्थ + भावपूर्वक’, अर्थात ‘उसका (स्तोत्र का) अर्थ समझकर उसे भावपूर्वक करना चाहिए ।’ केवल यंत्रवत प्राणहीन उच्चारण न हो । उच्चारण ऐसा हो, जिससे जपकर्ता भगवद्भावयुक्त एवं भगवच्छक्तियुक्त हो जाए ।
  • जब एक से अधिक बार स्तोत्रपठन होता है तब ‘वरदमूर्तये नमः ।’तक ही पठन करें । फलश्रुति का पठन अंतिम आवर्त्तन के उपरांत करें । ऐसे ही शांतिमंत्र का पठन भी प्रत्येक पाठ के पूर्व न कर केवल आरंभ में एक बार करें ।
  • इस स्तोत्र की इक्कीस आवृत्तियों का एक अभिषेक होता है ।
  • स्तोत्रपाठ से पूर्व स्नान करें ।
  • पीढे पर न बैठकर उसके स्थान पर धौतवस्त्र की तह, मृगाजिन, आसनी अथवा दर्भ की चटाई का उपयोग करें ।
  • सीधी सरल पालथी मारकर बैठें, जिससे पाठ पूर्ण होने तक उसी स्थिति में बैठ पाएं ।
  • दक्षिण दिशा के अतिरिक्त अन्य किसी भी दिशा की ओर मुख कर बैठें ।
  • पीठ झुकाकर न बैठें सीधे बैठें ।
  • पाठ करने से पूर्व माता, पिता तथा अपने गुरु को नमस्कार करें ।
  • पाठ आरंभ करने से पूर्व यदि संभव हो तो गणपति का पूजन कर उन्हें अक्षत, दूर्वा, शमी तथा लाल फूल अर्पण करें । पूजा न कर सकें तो न्यूनतम गणपति का एक मिनट ध्यान करें, उन्हें नमस्कार करें तथा तदुपरांत ही पाठ आरंभ करें ।
  • उच्चारण में चूक न हों, इसके लिए जानकार व्यक्ति से स्तोत्रपाठ सीख लें ।
  • स्तोत्रपाठ करते समय गणपति की मूर्ति की ओर अथवा ॐ की ओर देखकर करें, इससे एकाग्रता शीघ्र साध्य होती है ।

अथर्वशीर्षपठन के लाभ

१. स्तोत्र में फलश्रुति होती है । आत्मज्ञानसंपन्न ऋषिमुनियों को यह वाङ्मय परावाणी से प्राप्त होने तथा फलश्रुति के पीछे उनका संकल्प होने के कारण, स्तोत्र पढनेवाले को फलश्रुति के कारण फल प्राप्त होता है ।

२. स्तोत्रपाठ करनेवाले की सर्व ओर कवच का (संरक्षक आवरणका) निर्माण करने की क्षमता स्तोत्र में है; इसलिए अथर्वशीर्ष पढने से अनिष्ट शक्तियों की पीडा से रक्षा होती है ।

गणेश गायत्री

एकदन्ताय विद्महे । वक्रतुण्डाय धीमहि । तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ॥

अर्थ : जिनका एक दंत है, ऐसे गणपति को हम जानते हैं । वक्रतुंड का (गणपतिका) ध्यान करते हैं । वह गणपति (दन्ती) हमारी बुद्धि को सत्प्रेरणा दें ।

संदर्भ : सनातन का ग्रंथ, ‘श्री गणपति

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