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जेनेटिक परिवर्तित खाद्यपदार्थ स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होने के कारण जैविक खाद्य पदार्थों को प्राथमिकता दीजिए – आरोग्य साहाय्य समिति

केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय को भी ‘आरोग्य साहाय्य समिती’ की ओर से निवेदन

जेनेटिक परिवर्तन कर सुधारे (Genetically Modified) गए खाद्य पदार्थ जंतुओं से प्राप्त पदार्थ हैं, जिनका परिवर्तन प्राकृतिक रूप से नहीं किया जाता । जेनेटिक परिवर्तन के कारण कैन्सर, कुपोषण, रोगप्रतिरोधक शक्ति की कमी आदि गंभीर बीमारियां उत्पन्न हो सकती हैं । इस प्रकार के खाद्यपदार्थ में अधिक मात्रा में खाद, सिंचन और विषैले कीटकनाशकों का उपयोग करने के कारण स्वास्थ्य की अनेक समस्याएं उत्पन्न होती हैं । इसलिए पर्यावरण के संतुलन पर भी विपरीत परिणाम होता है । इसलिए भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण द्वारा जेनेटिक परिवर्तित खाद्य पदार्थों के स्थान पर जैविक खाद्य पदार्थों को (Organic Food) प्राथमिकता दी जाए, ऐसी मांग आरोग्य साहाय्य समिति ने केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री तथा भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण के मुख्य कार्यपालन अधिकारी को निवेदन देकर की है ।

भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण द्वारा जेनेटिक परिवर्तित खाद्य पदार्थों सहित (GM Food) अन्य खाद्य पदार्थों के उत्पादन, संग्रहण, वितरण, विक्रय और आयात इस संदर्भ में समाज से प्रतिक्रिया, अभिप्राय मंगवाए थे । उसके अनुसार आरोग्य साहाय्य समिति ने अपना निवेदन प्रस्तुत किया ।

इस संदर्भ में आरोग्य साहाय्य समिति ने आगे दी हुई मांगे की हैं –

1. जेनेटिक परिवर्तित खाद्यपदार्थों के कारण कैन्सर, कुपोषण, एंटीबॉडीज की कमी, इम्युनो-सप्रेशन आदि गंभीर स्वास्थ्य की समस्याएं उत्पन्न होती हैं तथा विषैले द्रव्यों का उत्पादन हानिकारक स्तर पर बढ सकता है ।

2. जेनेटिक परिवर्तन की हुई उपज में पोषण मूल्यों से समझौता किया जाता है । इसलिए जैविक उपज पर बल देना आवश्यक है ।

3. जेनेटिक परिवर्तन की हुई उपज की 3 बोआई के पश्‍चात भूमि का उपजाऊपन और अनाज का स्तर खराब होता है । इसलिए किसानों पर आर्थिक भार बढता है ।

4. भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण को जेनेटिक परिवर्तित बीजों के स्थान पर प्राकृतिक/जैविक बीजों का विचार करना चाहिए । जैविक बीज स्वास्थ्य के लिए, पर्यावरण के लिए तथा पर्यावरण के संतुलन के लिए अधिक अच्छा है ।

5. जेनेटिक परिवर्तित खाद्य पदार्थों के उत्पादन के कारण अथवा उनकी वृद्धि के कारण विकासशील देशों का औद्योगिक देशों पर अधिक मात्रा में निर्भर रहने का संकट बढ़ सकता है; क्योंकि आगामी काल में उनके द्वारा अन्न उत्पादन नियंत्रित किया जा सकता है ।

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