
महाराष्ट्र सरकार के राजस्व विभाग द्वारा प्रस्तावित ‘देवस्थान इनाम निर्मूलन अधिनियम, 2026’ के मसौदे को लेकर राज्य में विवाद गहरा गया है। महाराष्ट्र मंदिर महासंघ के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से भेंट कर इस विधेयक का कड़ा विरोध दर्ज किया है। इस कानून के जरिए मंदिरों की ऐतिहासिक जमीनों पर अवैध कब्जों को वैध करने और उन्हें निजी हाथों में सौंपने की साजिश रची जा रही है। वहीं वक्फ संपत्तियों को इस अधिनियम से बाहर रखा गया है।
प्रस्तावित मसौदे के तहत वर्ष 2011 से पहले के अवैध कब्जों को वैध बनाने तथा कब्जाधारियों को मालिकाना अधिकार देने का प्रावधान है, जिससे भू-माफिया को फायदा होगा।
यह ड्राफ्ट महाराष्ट्र सरकार के राजस्व विभाग द्वारा तैयार किया गया है, जिसमें देवस्थान इनाम यानी मंदिरों और धार्मिक संस्थानों को ऐतिहासिक रूप से दी गई जमीनों को समाप्त करने तथा उनके स्वामित्व, कब्जा अधिकार, हस्तांतरण, अतिक्रमण और किरायेदारी से जुड़े मामलों के लिए नया कानूनी ढांचा बनाने की बात कही गई है।
🚨 नागपूर: देवस्थान इनाम व मंदिरांच्या जमिनी कुळे/वहिवाटदारांना देण्याचा प्रस्तावित कायदा
हा अन्यायकारक मसुदा तात्काळ मागे घ्या ⚠️ — सुनील घनवट
अन्यथा राज्यभर तीव्र जनआंदोलन छेडले जाईल 🔥मंदिरांची जमीन ही श्रद्धा, संस्कृती व ओळखीचा आधार आहे 🙏@SanatanPrabhat pic.twitter.com/kJ0mYNdgs5
— Mandir Mahasangh (@mandirmahasangh) May 5, 2026
देवस्थान इनाम जमीन क्या हैं?
देवस्थान इनाम जमीन वे भूमि हैं जो पहले के समय में राजाओं द्वारा मंदिरों, धार्मिक संस्थानों और चैरिटेबल संस्थाओं को दी गई थीं। इन पर अक्सर लगान में छूट भी मिलती थी। मसौदे में इन्हें ऐसी भूमि बताया गया है जो गांव या गांव का कोई भाग, भूमि राजस्व या टैक्स छूट के रूप में धार्मिक संस्थानों को दी गई हो।
इस विधेयक में साफ तौर पर 1954 के हैदराबाद इनाम निर्मूलन अधिनियम, 1952 के आतियत कानून और 1995 के वक्फ अधिनियम के तहत आने वाली जमीनों को बाहर रखा गया है।
विधेयक का विरोध क्यों?
यह कानून मंदिरों की भूमि को किरायेदार, कब्जाधारी तथा निजी लोगों को हस्तांतर कराने का मार्ग खोल देगा। मंदिर की संपत्ति देवता की होती है और उसे न तो ट्रस्टी बेच सकती हैं और न ही सरकार ट्रांसफर कर सकती है।
इस विधायक में तीन मुख्य बिंदू है…
१. सरकार के पास देवस्थान जमीनों का स्वामित्व ही नहीं है, इसलिए वह इनके हस्तांतरण का कानून नहीं बना सकती। पहले के कानून केवल जमीन को सुरक्षित रखने के लिए थे, न कि उसे निजी हाथों में देने के लिए।
२. ये जमीनें ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से बहोत महत्वपूर्ण हैं और कई जमीनें छत्रपति शिवाजी महाराज जैसे मराठा शासकों या प्राचीन राजवंशों द्वारा दी गई थीं। ऐसे में इन्हें निजी हाथों में जाने देना मंदिर व्यवस्था को कमजोर करेगा।
३. कानून में वक्फ संपत्तियों को बचाया गया है किंतु हिंदू मंदिरों की जमीनों पर ही नियम लागू किए जा रहे हैं, जो असमान व्यवहार है।
यह कानून मंदिरों के स्वामित्व को कमजोर करेगा, अतिक्रमण को वैध बनाएगा, बिल्डरों और जमीन माफिया को फायदा देगा और मंदिरों की आर्थिक स्वतंत्रता को नुकसान पहुंचाएगा।
ड्राफ्ट कानून के मुख्य प्रावधान
देवस्थान इनाम समाप्त करना
धारा 3 के तहत सभी देवस्थान इनाम समाप्त कर दिए जाएँगे, केवल नकद अनुदान को छोड़कर। इससे मंदिरों की जमीनों पर पुराने कानूनी अधिकार खत्म हो जाएँगे।
कब्जाधारियों को अधिकार देना
धारा 4 के तहत खेती करने वाले किरायेदारों, मिरासदारों और अन्य धारकों को कब्जे के अधिकार दिए जाएँगे और उन्हें ऑक्यूपेंट क्लास-1 का दर्जा मिलेगा। इससे मंदिरों की जमीनों पर मजबूत मालिकाना अधिकार जैसा प्रभाव पड़ेगा।
2011 से पहले के कब्जे को वैध करना
मसौदे में कहा गया है कि 1 जनवरी 2011 से पहले जो लोग जमीन पर कब्जे में हैं, अगर कुछ शर्तें पूरी करते हैं तो उन्हें जमीन का अधिकार दिया जा सकता है। इसमें बाजार मूल्य का भुगतान और आर्थिक सीमा की शर्त भी शामिल हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में 2011 से पहले रहने वालों को बिना शुल्क के भी अधिकार दिए जा सकते हैं। आलोचकों का कहना है कि यह अतिक्रमण को वैध बनाने जैसा है।
अवैध कब्जे पर सख्त कार्रवाई
इसी कानून में अवैध कब्जे पर 2 से 5 साल की सजा, भारी जुर्माना और तत्काल बेदखली का प्रावधान भी है। सरकार पुराने कब्जों को वैध और नए कब्जों पर सख्ती दोनों कर रही है, लेकिन संगठन का कहना है कि इससे गलत संदेश जाएगा।
महासंघ ने वक्फ संपत्तियों को कानून से बाहर रखने पर कड़ा विरोध जताया है। उनका कहना है कि अगर वक्फ जमीनों को सुरक्षा दी जा सकती है तो मंदिरों की जमीनों को क्यों नहीं। इस मुद्दे ने अब जमीन सुधार से आगे बढ़कर धार्मिक संस्थानों के साथ असमान व्यवहार और मंदिर स्वायत्तता की बहस का रूप ले लिया है।
संवैधानिक चिंताएं
यह कानून अनुच्छेद 25, 26 और 300A का उल्लंघन करता है। मंदिरों की जमीनें पूजा-पाठ, प्रशासन, दान कार्य, पुजारियों के वेतन और धार्मिक गतिविधियों के लिए आवश्यक हैं।
महाराष्ट्र मंदिर महासंघ की मांगें
संगठन ने एक मेमोरेंडम दिया जिसमें ड्राफ्ट एक्ट को तुरंत वापस लेने, लैंड रिकॉर्ड में देवस्थान की ज़मीन को साफ़ तौर पर नॉन-ट्रांसफरेबल स्टेटस देने, मंदिर की जमीन के लिए एक सख़्त एंटी-लैंड ग्रैबिंग कानून बनाने, पिछले कब्जों और जाली रिकॉर्ड की SIT जांच कराने और मंदिर की जमीन के झगड़ों को छह महीने के अंदर सुलझाने के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट बनाने की मांग की गई।
महासंघ ने चेतावनी दी कि, यदि सरकार इस कानून पर आगे बढ़ती है, तो वह मंदिर ट्रस्ट, भक्तों और हिंदू संगठनों को शामिल करके पूरे राज्य में आंदोलन शुरू कर सकता है।
संक्षेप में कानूनी उत्तर
अ. प्रश्न : क्या कब्जाधारकों को मालिकाना हक देना ‘सामाजिक न्याय’ नहीं है ?
उत्तर : नहीं। सार्वजनिक धार्मिक संपत्ति समाज और देवता की होती है। उसे निजी संपत्ति बनाना सामाजिक और धार्मिक अन्याय है।
आ. प्रश्न : यदि भूमि पर कब्जा है, तो क्या मालिकाना हक मिल जाता है ?
उत्तर : बिल्कुल नहीं। देवता की भूमि पर किसी भी प्रकार का कब्जा या अतिक्रमण कानूनी नहीं माना जा सकता। अनेक उच्च न्यायालयों ने यह स्पष्ट किया है।
किसकी नजर है मंदिरों की भूमि पर ?
आज शहरों के पास स्थित देवस्थानों की भूमि की कीमतें आसमान छू रही हैं।
‘बिल्डर लॉबी’ का हस्तक्षेप
एक बार भूमि वहिवाटदारों या कब्जाधारकों के नाम हो गई, तो आगे चलकर उसे ‘गैर कृषि भूमि’ (NA) में बदलकर बिल्डरों को बेच दिया जाएगा। जिन भूमियों से मंदिरों का दीपक जलता है, वहां भविष्य में सीमेंट के जंगल खड़े हो जाएंगे।
क्या यह एक प्रकार की ‘लैंड ग्रैबिंग’ (भूमि हड़पने) की योजना नहीं है ? यह प्रश्न आज हर हिंदू के मन में उठना स्वाभाविक है।








