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पुणे की ऐतिहासिक धरोहर ‘जीरो माइल स्टोन’ उपेक्षा और तोडफोड का शिकार

सनातन प्रभात के विशेष सर्वेक्षण में सामने आई ‘जीरो माइल स्टोन’ की दुर्दशा

महापालिका प्रशासन की अक्षम्य लापरवाही और नागरिकों में राष्ट्रीय चेतना का अभाव !

बिजली के लैंप टूटे, प्रतिमाएं क्षतिग्रस्त, असामाजिक तत्वों द्वारा परिसर में तोडफोड

पुणे – पुणे महानगरपालिका ने 6 सितंबर 2019 को रेलवे स्टेशन के निकट स्थित मुख्य डाकघर के प्रवेशद्वार के पास ऐतिहासिक ‘जीरो माइल स्टोन’ का जीर्णोद्धार कराया था। दुर्लभ एवं प्राचीन बरगद के वृक्ष के समीप बड़ी राशि व्यय कर ग्रेनाइट की शिलाओं पर उभरी हुई आकृतियां बनाई गई थीं तथा फाइबर की प्रतिमाएं स्थापित की गई थीं। किंतु आज पुणे की इस ऐतिहासिक धरोहर की स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई है। यहां लगाए गए विद्युत् लैंप टूट चुके हैं, प्रतिमाएं क्षतिग्रस्त हो गई हैं तथा असामाजिक तत्वों द्वारा परिसर में व्यापक तोड़फोड़ की गई है। अंग्रेज़ों के समय से पुणे की पहचान रहे इस ऐतिहासिक धरोहर की ऐसी दुर्दशा होने के बावजूद महानगरपालिका प्रशासन उदासीन बना हुआ है।

प्रारंभ में यह पत्थर पूरी तरह उपेक्षित था। महानगरपालिका की लापरवाही के कारण यह फुटपाथ के नीचे आधे से अधिक दब गया था। कुछ जागरूक नागरिकों ने इस विषय को पुणे महानगरपालिका की विरासत समिति के समक्ष उठाया, जिसके बाद सितंबर 2019 में इसका जीर्णोद्धार किया गया। इस आयताकार संरचना पर विभिन्न स्थानों के नाम अंकित हैं। उस समय लगाए गए प्रकाश-स्तंभों के कारण यह स्थल रात में आकर्षक दिखाई देता था। यहां दी गई जानकारी अत्यंत महत्वपूर्ण है। लेखक जॉन की की पुस्तक ‘द ग्रेट आर्क’ के अंश भी सूचना फलक पर प्रदर्शित किए गए हैं, जिससे ‘जीरो माइल स्टोन’ का इतिहास समझाया गया है। इस विरासत को पुनर्जीवित करने में हिंदुस्तान टाइम्स के पूर्व संपादक अभय वैद्य ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

श्री अजय केळकर, विशेष वरिष्ठ प्रतिनिधि, कोल्हापुर

क्या है ‘जीरो माइल स्टोन’?

अधिकांश बड़े शहरों में एक ऐसा संदर्भ बिंदु होता है, जहां से अन्य शहरों और महत्वपूर्ण स्थानों की दूरियां मापी जाती हैं। यह बिंदु सर्वेक्षण और मानचित्र निर्माण के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।

पुणे के ‘जीरो माइल स्टोन’ पर सिंहगढ़, पौड, पुरंदर, सोलापुर, आळंदी, नासिक और बेंगलुरु जैसे स्थानों की दूरियां अंकित हैं। वर्ष 1872 में अंग्रेज़ों द्वारा मुख्य डाकघर के निर्माण के समय इस पत्थर की स्थापना की गई थी।

ऐतिहासिक धरोहर की उपेक्षा और तोड़फोड़

आज इस महत्वपूर्ण विरासत की पूरी तरह उपेक्षा हो रही है। परिसर में स्थापित लगभग सभी फाइबर प्रतिमाओं को क्षतिग्रस्त कर दिया गया है। रात में जानकारी पढ़ने के लिए लगाए गए सभी विद्युत् लैंप तोड़ दिए गए हैं। प्रतिमाओं पर ईसाई धर्म-प्रचार सभाओं के पोस्टर चिपका दिए गए हैं। ‘जीरो माइल स्टोन’ पर पक्षियों को दाना डालने से परिसर गंदा हो गया है।

वास्तव में, जैसे ही इस धरोहर को क्षति पहुंचनी शुरू हुई थी, उसी समय महानगरपालिका को सीसीटीवी कैमरे लगाने, सुरक्षा रक्षक नियुक्त करने और अन्य आवश्यक सुरक्षा उपाय करने चाहिए थे; किंतु प्रशासन ने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया। इतना ही नहीं, पुणे की इस ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण के बजाय कुछ नागरिकों ने उसकी तोडफोड में ही संतोष माना।

जीरो माइल स्टोन के जीर्णोद्धार के समय स्थापित शिलालेख
जीरो माइल स्टोन पर जानकारी देने हेतु लगाए गए पत्थर के सूचना-फलक पर लगे विद्युत् दीपाें की तोड़फोड़

जीरो माइल स्टोन के समीप स्थित प्रतिमा पर ईसाई धर्म-प्रचार सभा का पोस्टर चिपकाया गया।

“ऐसी महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहर का संरक्षण न होना दुर्भाग्यपूर्ण है” – अभय वैद्य, पूर्व संपादक, हिंदुस्तान टाइम्स

पुणे की ऐतिहासिक धरोहरों में से एक ‘जीरो माइल स्टोन’ और उसके आसपास की वर्तमान दुर्दशा अत्यंत दुखद है। राष्ट्र की दृष्टि से महत्वपूर्ण इस स्मारक का रखरखाव प्रशासन द्वारा न किया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है। आज की युवा पीढ़ी को भी ऐसी धरोहरों के संरक्षण के प्रति जागरूक होना चाहिए। महानगरपालिका को शीघ्र इसकी मरम्मत कर इस सुंदर विरासत को पुनः लोगों के सामने उसके गौरवपूर्ण स्वरूप में प्रस्तुत करना चाहिए।

“शहर की पहचान बनी इस धरोहर का संरक्षण और संवर्धन अत्यावश्यक है” – डॉ. पांडुरंग बलकवडे, इतिहास शोधकर्ता

‘जीरो माइल स्टोन’ का इतिहास 150 वर्ष से भी अधिक पुराना है। यह पत्थर केवल एक स्मारक नहीं, बल्कि पुणे शहर का केंद्रबिंदु और उसकी पहचान है। इसलिए इसका संरक्षण प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। यह पुणे का गौरव-चिह्न है और इसका सम्मान होना चाहिए। इस ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण और संवर्धन के लिए डाक विभाग तथा महानगरपालिका प्रशासन को तत्काल पहल करनी चाहिए।

स्रोत : सनातन प्रभात

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