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चेंबूर हादसा : जांच समिति ने कंक्रीटीकरण को ठहराया जिम्मेदार; ‘सुराज्य अभियान’ की मांगों को मिली पुष्टि

  • पेड गिरने का कारण उसके चारों ओर किया गया कंक्रीटीकरण ही था!

  • स्कूल बस पर पेड़ गिरने से छात्र की मृत्यु के मामले में मुंबई महानगरपालिका की जांच समिति का निष्कर्ष

चेंबूर : यहां स्कूल बस पर पेड़ गिरने की दुर्घटना के पीछे पेड़ के आसपास किया गया कंक्रीटीकरण ही मुख्य कारण था। कंक्रीटीकरण के कारण पेड़ की जड़ें कमजोर हो गईं और अंततः पेड़ गिर गया। यह निष्कर्ष मुंबई महानगरपालिका द्वारा गठित जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट में दिया है।

चेंबूर में एक स्कूल बस पर पीपल का विशाल पेड़ गिर गया, जिसमें 11 वर्षीय छात्र विहान श्रीवास्तव की मृत्यु हो गई। इस घटना की जांच के लिए मुंबई महानगरपालिका ने उपायुक्त (विशेष अभियांत्रिकी) पुरुषोत्तम मालवदे तथा उपायुक्त (अभियांत्रिकी) शशांक भोरे की समिति गठित की। महानगरपालिका आयुक्त अश्विनी भिडे ने समिति को निर्देश दिए थे कि वह वृक्ष विशेषज्ञों की सहायता से जांच करे तथा भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के उपाय सुझाए।
समिति ने वृक्ष विशेषज्ञों के साथ घटनास्थल का निरीक्षण किया तथा गिरे हुए पेड़ की जड़ों की भी जांच की। इसके अतिरिक्त संबंधित विभाग के अधिकारियों एवं कर्मचारियों से जानकारी लेकर अपनी रिपोर्ट महानगरपालिका को सौंप दी।
इससे पहले महानगरपालिका आयुक्त अश्विनी भिडे ने यह मानने से इंकार किया था कि पेड़ों के तने के पास किया गया कंक्रीटीकरण उनके गिरने का कारण है; किंतु मुंबई की महापौर ऋतु तावड़े ने मीडिया से बातचीत में स्वीकार किया कि कंक्रीटीकरण से पेड़ों को नुकसान पहुंचा है।

समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि यह पीपल का पेड़ लगभग 60 वर्ष पुराना था। उसका एक भाग फुटपाथ और सड़क से सटा हुआ था। सड़क के कंक्रीटीकरण के कारण जड़ों तक पर्याप्त पानी नहीं पहुंच पा रहा था, जिससे पेड़ कमजोर होकर गिर गया। समिति ने भविष्य के लिए पेड़ों के आसपास कंक्रीटीकरण से बचने, जड़ों तक पानी पहुंचाने की व्यवस्था करने तथा यदि किसी निर्माण या सेवा लाइन के कार्य से पेड़ों को क्षति पहुंचे तो संबंधित ठेकेदारों के विरुद्ध कार्रवाई करने की सिफारिश की है।

जांच समिति के निष्कर्ष से ‘सुराज्य अभियान’ की मांगों को मिली पुष्टि

मुंबई महानगरपालिका की जांच समिति ने स्पष्ट किया है कि पेड़ों के तनों के आसपास किए गए कंक्रीटीकरण के कारण ही पेड़ कमजोर होकर गिर रहे हैं। इसी मुद्दे को लेकर ‘सुराज्य अभियान’ लंबे समय से प्रशासन के समक्ष ज्ञापन देकर पेड़ों के आसपास कंक्रीटीकरण रोकने, नियमों का उल्लंघन करने वाले ठेकेदारों पर कार्रवाई करने तथा वृक्ष संरक्षण के लिए प्रभावी व्यवस्था स्थापित करने की मांग करता रहा है। समिति के निष्कर्ष से ‘सुराज्य अभियान’ की इन मांगों को एक प्रकार से पुष्टि मिल गई है।

सन्दर्भ : सनातन प्रभात 


नवी मुंबई में पेडों की ‘मूक हत्या’ रोकने के लिए प्रशासन प्रभावी व्यवस्था स्थापित करें – सुराज्य अभियान

९ जुलाई २०२६ 

वृक्ष संरक्षण और सार्वजनिक सुरक्षा के लिए प्रशासन के दावों पर सवाल!

नवी मुंबई महानगरपालिका आयुक्त एवं महापौर को सौंपा गया ज्ञापन

नवी मुंबई की महापौर सुजाता पाटील को ज्ञापन सौंपते हुए सुराज्य अभियान का प्रतिनिधिमंडल

नवी मुंबई – महानगरपालिका ने मानसून से पहले हजारों पेड़ों की छंटाई तथा खतरनाक पेड़ों को हटाने का दावा किया था, लेकिन इसके बावजूद अब तक शहर में 150 से अधिक पेड़ों के गिरने की घटनाएँ सामने आ चुकी हैं। यदि प्रशासन पेड़ों की सुरक्षा और आपात कार्रवाई के लिए प्रभावी व्यवस्था तत्काल स्थापित नहीं करता, तो यह वृक्ष संरक्षण और सार्वजनिक सुरक्षा – दोनों के लिए गंभीर चिंता का विषय होगा। इस संबंध में शीघ्र प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो न्यायालयीन लड़ाई तथा जनजागरण आंदोलन के माध्यम से आगे कठोर कदम उठाए जाएंगे। यह मांग सुराज्य अभियान की ओर से नवी मुंबई महानगरपालिका के आयुक्त एवं महापौर को दिए गए ज्ञापन में की गई।

ज्ञापन सौंपते समय सुराज्य अभियान के समन्वयक डॉ. उदय धुरी के साथ गोविंद प्रसाद दुबे, बलराज जिरे, गुलशन दुबे, अनंत सातपुते तथा अशोक सावंत उपस्थित थे।

ज्ञापन की एक प्रति महानगरपालिका के अतिरिक्त आयुक्त सुनील पवार को भी सौंपी गई।

नवी मुंबई महानगरपालिका के अतिरिक्त आयुक्त सुनील पवार को ज्ञापन सौंपते हुए सुराज्य अभियान का प्रतिनिधिमंडल

ज्ञापन में प्रमुख बातें

1. सड़कों और फुटपाथों के सौंदर्यीकरण के नाम पर पेड़ों की जड़ों के आसपास किए जा रहे कंक्रीटीकरण के कारण पेड़ों की ‘मूक हत्या’ हो रही है। प्रशासन के दावों के बावजूद इस समस्या पर कोई ठोस सुधार नहीं हुआ है।

2. राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के आदेशों का उल्लंघन करते हुए ठेकेदार पेड़ों के तनों तक कंक्रीट डाल रहे हैं। इससे पेड़ों की जड़ों को पर्याप्त हवा नहीं मिलती, उनका अस्तित्व खतरे में पड़ जाता है और पेड़ों के गिरने की घटनाएँ बढ़ रही हैं।

3. शहर में पेड़ों पर कीलें ठोककर तथा विज्ञापन बोर्ड लगाकर उनका विद्रूपीकरण किया जा रहा है। यह ‘महाराष्ट्र वृक्ष संरक्षण एवं संवर्धन अधिनियम, 1975’ के अंतर्गत अवैध है। प्रशासन को इस पर तत्काल ठोस कार्रवाई करनी चाहिए।

सुराज्य अभियान की प्रमुख मांगें

1. NGT के नियमों का उल्लंघन कर पेड़ों के चारों ओर कंक्रीट डालने वाले ठेकेदारों तथा पेड़ों को नुकसान पहुँचाने वालों के विरुद्ध आपराधिक मामले दर्ज किए जाएँ।

2. यदि पेड़ गिरने से किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है, तो संबंधित ठेकेदार तथा जिम्मेदार अधिकारियों पर गैर-इरादतन हत्या (Culpable Homicide) का मामला दर्ज किया जाए।

3. पेड़ गिरने से वाहनों एवं अन्य संपत्ति को हुए नुकसान का मुआवजा महानगरपालिका द्वारा दिया जाए। केवल ठेकेदार पर कार्रवाई करने के बजाय, जिन अधिकारियों की निगरानी में नियमों का उल्लंघन हुआ है, उनके विरुद्ध भी कड़ी प्रशासनिक कार्रवाई की जाए।

4. दिल्ली मॉडल की तर्ज पर पेड़ों के आसपास कंक्रीटीकरण रोकने तथा पेड़ों पर लगाए गए अवैध बोर्ड एवं कीलें हटाने के लिए 24 घंटे के भीतर कार्रवाई सुनिश्चित करने वाली मानक कार्यप्रणाली (SOP) लागू की जाए।

5. सड़कों और फुटपाथों के नए ठेकों में यह अनिवार्य शर्त जोड़ी जाए कि पेड़ों के चारों ओर कम-से-कम 1 मीटर क्षेत्र खुला छोड़े बिना ठेकेदार का भुगतान स्वीकृत नहीं किया जाएगा। साथ ही, पिछले 3 वर्षों के वृक्षारोपण अभियानों का किसी स्वतंत्र संस्था से ऑडिट कराकर पेड़ों की वास्तविक स्थिति संबंधी आँकड़े सार्वजनिक किए जाएँ।


9 जुलाई

बरसात में पेडों का गिरना केवल प्राकृतिक घटना नहीं, अपितु मानव-निर्मित आपदा है – सुराज्य अभियान

पेड़ों की जड़ों का दम घोंटकर नागरिकों के जीवन को खतरे में डालने वालों पर ‘सदोष मनुष्यवध’ का मामला दर्ज किया जाए!

बाई ओर से श्री. सतीश कोचरेकर और (बोलते हुए) श्री. अभिषेक मुरुकटे

मुंबई : बरसात के मौसम में बार-बार पेड़ों के गिरने की घटनाएँ केवल प्राकृतिक आपदा नहीं हैं, बल्कि पेड़ों की जड़ों के चारों ओर किए जा रहे अवैध कंक्रीटीकरण, वृक्षों की छंटाई में बरती जा रही लापरवाही, प्रशासनिक उदासीनता तथा राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के आदेशों के खुले उल्लंघन से उत्पन्न मानव-निर्मित आपदा हैं। यह गंभीर चेतावनी ‘सुराज्य अभियान’ ने आज मुंबई में आयोजित पत्रकार परिषद में दी। इस पत्रकार परिषद में ‘सुराज्य अभियान’ के महाराष्ट्र राज्य समन्वयक श्री अभिषेक मुरुकटे ने राज्यभर में बढ़ रही पेड़ों के गिरने की घटनाओं की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए प्रशासन की जिम्मेदारी पर गंभीर प्रश्न उठाए। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के आदेश का उल्लंघन करने के मामले में ठेकेदार तथा संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध भी न्यायालय की अवमानना (कॉन्टेम्प्ट ऑफ कोर्ट) का मामला दर्ज किया जाना चाहिए। इस अवसर पर हिंदू जनजागृति समिति के प्रवक्ता श्री सतीश कोचरेकर भी उपस्थित थे।

श्री. मुरुकटे ने कहा कि प्रत्येक वर्ष बरसात के दौरान सैकड़ों पेड़ गिरते हैं, सड़कें बंद हो जाती हैं, वाहनों को नुकसान पहुँचता है, नागरिक घायल होते हैं और अनेक निर्दोष लोगों की जान चली जाती है। किंतु हर बार इसका कारण केवल “भारी वर्षा” या “तेज हवाए” बताकर मामला समाप्त कर दिया जाता है। जबकि यह जांच ही नहीं की जाती कि पेड़ भीतर से कमजोर क्यों हो गए, उनकी जड़ों को पर्याप्त हवा और पानी मिला या नहीं तथा उनकी संरचनात्मक जांच हुई या नहीं।’सुराज्य अभियान’ ने विश्व पृथ्वी दिवस के अवसर पर मुंबई, पुणे, कोल्हापुर, सातारा, सांगली और सोलापुर में पत्रकार परिषद आयोजित कर इस गंभीर विषय को उजागर किया था। इसके साथ ही मुंबई, पुणे, नाशिक, नागपुर और जळगांव में जिलाधिकारियों, आयुक्तों, मुख्य अधिकारियों तथा वृक्ष अधिकारियों को ज्ञापन देकर तत्काल डी-कंक्रीटीकरण अभियान चलाने की मांग की गई थी। ज्ञापनों में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया था कि पेड़ों को नुकसान पहुँचाना ‘महाराष्ट्र वृक्ष संरक्षण एवं संवर्धन अधिनियम, 1975’ के अंतर्गत दंडनीय अपराध है। साथ ही यह भी मांग की गई थी कि यदि पेड़ों की जड़ों के आसपास किए गए कंक्रीटीकरण के कारण पेड़ गिरने से जन-धन की हानि होती है तो संबंधित विभाग के कार्यकारी अभियंताओं एवं ठेकेदारों को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराया जाए। किंतु इन पूर्व चेतावनियों की पूरी तरह अनदेखी की गई। इक्का-दुक्का वृक्ष संरक्षण अभियानों को छोड़कर सड़क, फुटपाथ, ड्रेनेज, मेट्रो, पुनर्विकास और सौंदर्यीकरण के कार्यों में आज भी पेड़ों के तनों के आसपास कंक्रीट, डामर तथा पेवर ब्लॉक बिछाने की प्रथा जारी है।

महाराष्ट्र की हाल की घटनाओं ने इस समस्या की गंभीरता और अधिक स्पष्ट कर दी है। 30 जून को चेंबूर में एक स्कूल बस पर विशाल पीपल का पेड़ गिरने से 11 वर्षीय विहान श्रीवास्तव की घटनास्थल पर ही मृत्यु हो गई। इससे पहले 10 मई को खार स्थित लिंकिंग रोड पर एक रिक्शे पर पेड़ गिरने से 15 वर्षीय आरिका श्रीवास्तव की मृत्यु हुई थी। इसके बाद सांताक्रूज़ (प.) स्थित रहेजा कॉलेज के पास एक निजी इमारत परिसर में पेड़ गिरने से 8 लोग घायल हो गए। इसी प्रकार चर्चगेट रेलवे स्टेशन तथा मरीन लाइन्स क्षेत्र में भी बड़े-बड़े बरगद के पेड़ उखड़कर गिर गए। आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार हाल के वर्षाकाल में मुंबई में कुल 91 पेड़ों एवं बड़ी शाखाओं के गिरने की घटनाए दर्ज की गईं, जिनमें 13 शहर क्षेत्र में, 22 पूर्वी उपनगरों में तथा 56 पश्चिमी उपनगरों में हुईं। यह आँकड़े स्थिति की गंभीरता को दर्शाते हैं। उच्च न्यायालय की निगरानी में हुए संयुक्त सर्वेक्षण में पाया गया कि लगभग 65 प्रतिशत सड़क किनारे के पेड़ कंक्रीट के जाल में फँसे हुए हैं। इसके अतिरिक्त 3,691 पेड़ सीमेंट के घेरे में होने पर मुंबई उच्च न्यायालय ने भी गंभीर नाराज़गी व्यक्त की है, ऐसा श्री. सतीश कोचरेकर ने बताया।

श्री.अभिषेक मुरुकटे ने कहा, “जब पेड़ गिरता है तब हम केवल उसका परिणाम देखते हैं, लेकिन उसकी जड़ें पहले ही दम घुटने से कमजोर हो चुकी होती हैं। समस्या वर्षा की नहीं, बल्कि यह है कि पेड़ों की जड़ों की सांस कौन रोक रहा है।” पेड़ों की जड़ों के आसपास किए जा रहे अवैध कंक्रीटीकरण तथा वृक्षों की छंटाई में बरती जा रही लापरवाही से उनका प्राकृतिक संतुलन बिगड़ रहा है। ऊपर से पेड़ हरा-भरा दिखाई देता है, किंतु भीतर से उसका आधार कमजोर होता जाता है और वह अचानक गिर जाता है। ऐसी घटनाओं में संबंधित अधिकारियों एवं ठेकेदारों पर केवल लापरवाही (भारतीय न्याय संहिता की धारा 106) का मामला दर्ज करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि भारतीय न्याय संहिता की धारा 105 के अंतर्गत ‘सदोष मनुष्यवध’ का मामला दर्ज कर उन्हें व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी ठहराया जाना चाहिए। सुराज्य अभियान ने यह मांग जोरदार ढंग से उठाई।

सुराज्य अभियान की प्रमुख मांगें

  • राज्यभर में सभी पेड़ों की जड़ों की तत्काल संरचनात्मक जांच कराई जाए।
  • प्रत्येक बड़े पेड़ गिरने की घटना के बाद उसके मूल कारणों की वैज्ञानिक जांच अनिवार्य की जाए।
  • अवैध कंक्रीटीकरण करने वाले दोषी अधिकारियों एवं ठेकेदारों के विरुद्ध NGT Act, 2010 की धारा 26 के अंतर्गत आपराधिक कार्रवाई की जाए।
  • सभी पेड़ों के चारों ओर कम से कम 1 मीटर खुली मिट्टी रखने संबंधी NGT के आदेश का तत्काल पालन कराया जाए।
  • पूरे राज्य में विशेष डी-कंक्रीटीकरण अभियान चलाकर उसकी एक्शन टेकन रिपोर्ट (ATR) सार्वजनिक की जाए।
  • पिछले तीन वर्षों में हुए वृक्षारोपण एवं वृक्ष प्रत्यारोपण का स्वतंत्र थर्ड पार्टी ऑडिट कर उसकी रिपोर्ट जनता के समक्ष प्रस्तुत की जाए।

श्री अभिषेक मुरुकटे ने कहा, “एक ओर वृक्ष संरक्षण के बड़े-बड़े बोर्ड लगाए जाते हैं और दूसरी ओर उन्हीं पेड़ों की जड़ों को सीमेंट के नीचे दबा दिया जाता है। यह दोहरा रवैया अब बंद होना चाहिए। यह केवल पर्यावरण का विषय नहीं, बल्कि सीधे नागरिकों के जीवन से जुड़ा अत्यंत गंभीर मुद्दा है।”उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इस विषय पर तत्काल प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो न्यायालयीन संघर्ष, अवमानना याचिका तथा जनजागरण आंदोलन के माध्यम से आगे और कठोर कदम उठाए जाएंगे।


22 अप्रैल

‘नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल’ के नियमों का उल्लंघन करनेवाले ठेकेदारों पर आपराधिक मामले दर्ज करें! – सुराज्य अभियान

नियमों को ताक पर रखकर वृक्षों की ‘मूक हत्या’; लगाए गए 17,000 पेड़ ‘लापता’!

बाएँ से हिंदू जनजागृति समिति के प्रवक्ता डॉ. उदय धुरी, ‘सुराज्य अभियान’ के राज्य समन्वयक श्री अभिषेक मुरुकटे, अधिवक्ता प्रथमेश गायकवाड़ और अधिवक्ता गणेश कोळी।

मुंबई – सड़कों के विकास और सौंदर्यीकरण के नाम पर स्वयं प्रशासन द्वारा ही शहरों के ‘फेफड़े’ माने जाने वाले पेड़ों का गला घोंटा जा रहा है, यह भयावह वास्तविकता ‘सुराज्य अभियान’ के राज्यव्यापी निरीक्षण में सामने आई है। मुंबई महानगरपालिका ने 1 अप्रैल 2026 से ‘वृक्ष संजीवनी’ अभियान शुरू कर पेड़ों के आसपास का कंक्रीट हटाने की पहल की है, लेकिन सुराज्य अभियान ने इस प्रकार के अभियानों के मूल उद्देश्य पर ही गंभीर प्रश्न उठाए हैं। “पेड़ों के आसपास का कंक्रीट हटाना केवल एक महीने का ‘इवेंट’ नहीं होना चाहिए। आखिर ऐसी मुहिम चलाने की नौबत ही क्यों आती है? सड़क निर्माण के दौरान ‘नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल’ के आदेशों का खुला उल्लंघन करते हुए पेड़ों के तनों तक कंक्रीट भर देना, क्या यही सबसे बड़ी गलती नहीं है? ‘कंक्रीट हटाओ’ अभियान चलाने के बजाय, इन उल्लंघनों के दोषियों पर NGT Act 2010 की धारा 26 के तहत ‘आपराधिक कार्रवाई’ क्यों नहीं की जाती?” – ऐसा सीधा सवाल ‘सुराज्य अभियान’ के राज्य समन्वयक श्री अभिषेक मुरुकटे ने आज ‘विश्व पृथ्वी दिवस’ के अवसर पर मुंबई मराठी पत्रकार संघ में आयोजित पत्रकार परिषद में उठाया। इस अवसर पर हिंदू जनजागृति समिति के प्रवक्ता डॉ. उदय धुरी, अधिवक्ता प्रथमेश गायकवाड़, अधिवक्ता गणेश कोली उपस्थित थे।

 ‘सुराज्य अभियान’ द्वारा महाराष्ट्र के पुणे, मुंबई, नागपुर, नाशिक, सोलापुर, सांगली, सातारा, कोल्हापुर, जळगांव तथा कर्नाटक के हुबली-कारवार क्षेत्र में किए गए निरीक्षण में पेड़ों की स्थिति अत्यंत दयनीय पाई गई। जीवित पेड़ों के चारों ओर कंक्रीट डालकर उनका दम घोंटा जा रहा है। वहीं दूसरी ओर एक चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि पुणे महानगरपालिका ने पिछले दो वर्षों में लगाए गए 17,533 पेड़ों की वर्तमान स्थिति (Survival Data) के संबंध में कोई आधिकारिक डेटा उपलब्ध नहीं होने की बात स्वीकार की है। चाहे वृक्ष संरक्षण हो या नया वृक्षारोपण, प्रशासन पर्यावरण के साथ क्रूर मजाक कर रहा है। 17 हजार पेड़ों का कोई हिसाब न होना, जनता के करोड़ों रुपये की सीधी बर्बादी है, ऐसा श्री. मुरुकटे ने आगे कहा। वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो पेड़ों के आसपास कंक्रीट होने के कारण भूजल पुनर्भरण की प्रक्रिया बाधित हो रही है और शहरों में बढ़ती गर्मी (Urban Heat Island Effect) के लिए प्रशासन पूरी तरह जिम्मेदार है, ऐसा आरोप भी लगाया गया।

 

माननीय ‘नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल’ के आदेशानुसार, शहरी क्षेत्रों में पेड़ों के आसपास कम से कम 1 मीटर क्षेत्र कच्चा रखना सभी स्थानीय स्वशासन संस्थाओं के लिए अनिवार्य है। पेड़ों पर कील ठोककर विज्ञापन या बोर्ड लगाना और उन्हें नुकसान पहुंचाना भी अवैध है। इसके बावजूद केवल ‘इवेंट’ के रूप में एक महीने का अभियान चलाकर प्रशासन अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता। सड़क या फुटपाथ निर्माण के दौरान ही नियमों का पालन क्यों नहीं किया जाता? ‘महाराष्ट्र वृक्ष संरक्षण एवं संवर्धन अधिनियम 1975’ के अनुसार पेड़ों को नुकसान पहुंचाना दंडनीय अपराध है, फिर भी प्रशासन उल्लंघन करने वाले ठेकेदारों और जिम्मेदार अधिकारियों के नाम सार्वजनिक कर उन्हें जवाबदेह क्यों नहीं ठहराता? – ऐसा सवाल भी ‘सुराज्य अभियान’ ने उठाया है।

पेड़ों की इस गंभीर स्थिति पर तत्काल कार्रवाई की जाए तथा दिल्ली की तरह SOP तैयार की जाए, इस मांग को लेकर ‘सुराज्य अभियान’ ने आज मुंबई, पुणे, कोल्हापुर, सातारा, सांगली, सोलापुर में पत्रकार परिषदें आयोजित कीं। साथ ही मुंबई के महापौर, महानगरपालिका आयुक्त, मुख्यमंत्री और पर्यावरण मंत्री तथा नाशिक, नागपुर, जळगांव में जिलाधिकारी, आयुक्त/मुख्याधिकारी और वृक्ष अधिकारियों को ज्ञापन देकर त्वरित कार्रवाई की मांग की गई है। राज्य के सभी शहरों में तुरंत ‘डी-कंक्रीटीकरण’ अभियान चलाया जाए, लेकिन यह केवल अस्थायी न होकर एक जिम्मेदार और निरंतर प्रक्रिया होनी चाहिए। वर्तमान में कंक्रीट से घिरे पेड़ों को मुक्त किया जाए और भविष्य में सड़क व फुटपाथ के ठेकों में यह शर्त शामिल की जाए कि पेड़ों के आसपास 1 मीटर जगह छोड़े बिना ठेकेदारों का भुगतान मंजूर नहीं किया जाएगा। साथ ही पिछले 3 वर्षों में हुए वृक्षारोपण का ‘थर्ड पार्टी ऑडिट’ कर वास्तविक आंकड़े सार्वजनिक किए जाएं। यदि अगले 7 कार्यदिवसों में प्रशासन ने ठोस कार्रवाई नहीं की, तो ‘सुराज्य अभियान’ की ओर से NGT Act 2010 की धारा 26 के तहत आपराधिक शिकायत और माननीय ‘नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल’ में ‘अवमानना याचिका’ दायर की जाएगी, ऐसी चेतावनी भी दी गई।

मुंबई : शहर के 29.75 लाख वृक्षों की रक्षा के लिए मुंबई महानगरपालिका ने 1 अप्रैल 2026 के दिन ‘वृक्ष संजीवनी’ अभियान घोषित किया है। क्या यह केवल एक दिन का ‘ऊपरी उपचार’ है और प्रशासन इसे केवल एक ‘इवेंट’ के रूप में देख रहा है? वृक्षों के आसपास का कंक्रीट हटाना और उन्हें कीलों से मुक्त करना कोई स्वैच्छिक सेवा नहीं है, बल्कि माननीय नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के आदेशानुसार की जाने वाली अनिवार्य कानूनी कार्यवाही है। पेड़ों पर हजारों कीलें ठोककर विज्ञापन लगाना और उनके तने तक कंक्रीट डालकर उनका गला घोंटना और प्राकृतिक विकास रोकना, ‘महाराष्ट्र वृक्ष संरक्षण एवं संवर्धन अधिनियम, 1975’ के साथ नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के स्पष्ट आदेशों का सीधा अवमान है। इन गंभीर उल्लंघनों की अनदेखी कर केवल जन-जागरूकता के कार्यक्रम चलाने के बजाय, दोषियों पर सीधे फौजदारी (Criminal) मामले दर्ज कर कठोर दंडात्मक कार्रवाई की जाए, ऐसी पुरजोर मांग हिंदू जनजागृति समिति के ‘सुराज्य अभियान’ ने की है।

इस संदर्भ में जलगांव और सतारा जिला प्रशासन को पहले ही विशेष ज्ञापन दिए जा चुके हैं और नागपुर सहित मुंबई महानगरपालिका के महापौर और आयुक्त को भी ज्ञापन दिया गया है। राज्य में स्थिति अत्यंत भयावह है; केवल मुंबई में ही पिछले एक साल में पेड़ों से 17.43 किलो कीलें और 1460 अवैध विज्ञापन बोर्ड हटाए गए हैं। वृक्षों के चारों ओर 1 मीटर जगह कच्ची यानी ‘अनपेव्ड’ (Unpaved) रखने के उच्च न्यायालय के निर्देश होने के बावजूद, विकास कार्यों में हजारों पेड़ों के आसपास सीमेंट की परतें कैसे बिछाई जाती हैं? इतनी बड़ी संख्या में वृक्ष संपदा संकट में होने के बावजूद प्रशासन विज्ञापनदाता या ठेकेदार पर मामला दर्ज क्यों नहीं करता?, यह चिंता का विषय है। पेड़ों की जड़ों को ऑक्सीजन मिलना बंद होने के कारण वे कमजोर होकर गिरने की घटनाएं बढ़ी हैं, जिसके लिए पूरी तरह से प्रशासनिक लापरवाही जिम्मेदार है।

हमारी मांगों में ‘Polluter Pays’ (प्रदूषण फैलाने वाला भुगतान करे) सिद्धांत के अनुसार पेड़ों के आसपास का कंक्रीट दोषी ठेकेदारों के स्वयं के खर्च पर हटाया जाए। ऐसे ठेकेदारों को केवल नोटिस न देकर तत्काल ‘ब्लैकलिस्ट’ किया जाए। सरकारी निविदा (Tender) में ही पेड़ों के आसपास जगह छोड़ने की शर्त अनिवार्य हो। इसका उल्लंघन होने पर ठेकेदार का भुगतान रोका जाए। ‘वृक्ष संजीवनी’ जैसी मुहिम केवल एक शहर तक सीमित न रखकर, इसे पूरे महाराष्ट्र में प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए राज्य सरकार तत्काल आदेश जारी करे। प्रशासन केवल एक दिन का ‘इवेंट’ न कर कानून का कड़ाई से पालन करे। पूरे महाराष्ट्र में वृक्ष मुक्त सांस ले सकें, ऐसी स्थायी कानूनी व्यवस्था निर्माण की जाए। जब तक नियम तोड़ने वाले व्यावसायिक संस्थानों और ठेकेदारों पर कानून का डर पैदा नहीं होता, तब तक यह वृक्ष संपदा सुरक्षित नहीं होगी, ऐसी भूमिका सुराज्य अभियान के समन्वयक श्री. अभिषेक मुरुकटे ने रखी है।

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