Menu Close

‘नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल’ के नियमों का उल्लंघन करनेवाले ठेकेदारों पर आपराधिक मामले दर्ज करें! – सुराज्य अभियान

नियमों को ताक पर रखकर वृक्षों की ‘मूक हत्या’; लगाए गए 17,000 पेड़ ‘लापता’!

बाएँ से हिंदू जनजागृति समिति के प्रवक्ता डॉ. उदय धुरी, ‘सुराज्य अभियान’ के राज्य समन्वयक श्री अभिषेक मुरुकटे, अधिवक्ता प्रथमेश गायकवाड़ और अधिवक्ता गणेश कोळी।

मुंबई – सड़कों के विकास और सौंदर्यीकरण के नाम पर स्वयं प्रशासन द्वारा ही शहरों के ‘फेफड़े’ माने जाने वाले पेड़ों का गला घोंटा जा रहा है, यह भयावह वास्तविकता ‘सुराज्य अभियान’ के राज्यव्यापी निरीक्षण में सामने आई है। मुंबई महानगरपालिका ने 1 अप्रैल 2026 से ‘वृक्ष संजीवनी’ अभियान शुरू कर पेड़ों के आसपास का कंक्रीट हटाने की पहल की है, लेकिन सुराज्य अभियान ने इस प्रकार के अभियानों के मूल उद्देश्य पर ही गंभीर प्रश्न उठाए हैं। “पेड़ों के आसपास का कंक्रीट हटाना केवल एक महीने का ‘इवेंट’ नहीं होना चाहिए। आखिर ऐसी मुहिम चलाने की नौबत ही क्यों आती है? सड़क निर्माण के दौरान ‘नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल’ के आदेशों का खुला उल्लंघन करते हुए पेड़ों के तनों तक कंक्रीट भर देना, क्या यही सबसे बड़ी गलती नहीं है? ‘कंक्रीट हटाओ’ अभियान चलाने के बजाय, इन उल्लंघनों के दोषियों पर NGT Act 2010 की धारा 26 के तहत ‘आपराधिक कार्रवाई’ क्यों नहीं की जाती?” – ऐसा सीधा सवाल ‘सुराज्य अभियान’ के राज्य समन्वयक श्री अभिषेक मुरुकटे ने आज ‘विश्व पृथ्वी दिवस’ के अवसर पर मुंबई मराठी पत्रकार संघ में आयोजित पत्रकार परिषद में उठाया। इस अवसर पर हिंदू जनजागृति समिति के प्रवक्ता डॉ. उदय धुरी, अधिवक्ता प्रथमेश गायकवाड़, अधिवक्ता गणेश कोली उपस्थित थे।

 ‘सुराज्य अभियान’ द्वारा महाराष्ट्र के पुणे, मुंबई, नागपुर, नाशिक, सोलापुर, सांगली, सातारा, कोल्हापुर, जळगांव तथा कर्नाटक के हुबली-कारवार क्षेत्र में किए गए निरीक्षण में पेड़ों की स्थिति अत्यंत दयनीय पाई गई। जीवित पेड़ों के चारों ओर कंक्रीट डालकर उनका दम घोंटा जा रहा है। वहीं दूसरी ओर एक चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि पुणे महानगरपालिका ने पिछले दो वर्षों में लगाए गए 17,533 पेड़ों की वर्तमान स्थिति (Survival Data) के संबंध में कोई आधिकारिक डेटा उपलब्ध नहीं होने की बात स्वीकार की है। चाहे वृक्ष संरक्षण हो या नया वृक्षारोपण, प्रशासन पर्यावरण के साथ क्रूर मजाक कर रहा है। 17 हजार पेड़ों का कोई हिसाब न होना, जनता के करोड़ों रुपये की सीधी बर्बादी है, ऐसा श्री. मुरुकटे ने आगे कहा। वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो पेड़ों के आसपास कंक्रीट होने के कारण भूजल पुनर्भरण की प्रक्रिया बाधित हो रही है और शहरों में बढ़ती गर्मी (Urban Heat Island Effect) के लिए प्रशासन पूरी तरह जिम्मेदार है, ऐसा आरोप भी लगाया गया।

 

माननीय ‘नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल’ के आदेशानुसार, शहरी क्षेत्रों में पेड़ों के आसपास कम से कम 1 मीटर क्षेत्र कच्चा रखना सभी स्थानीय स्वशासन संस्थाओं के लिए अनिवार्य है। पेड़ों पर कील ठोककर विज्ञापन या बोर्ड लगाना और उन्हें नुकसान पहुंचाना भी अवैध है। इसके बावजूद केवल ‘इवेंट’ के रूप में एक महीने का अभियान चलाकर प्रशासन अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता। सड़क या फुटपाथ निर्माण के दौरान ही नियमों का पालन क्यों नहीं किया जाता? ‘महाराष्ट्र वृक्ष संरक्षण एवं संवर्धन अधिनियम 1975’ के अनुसार पेड़ों को नुकसान पहुंचाना दंडनीय अपराध है, फिर भी प्रशासन उल्लंघन करने वाले ठेकेदारों और जिम्मेदार अधिकारियों के नाम सार्वजनिक कर उन्हें जवाबदेह क्यों नहीं ठहराता? – ऐसा सवाल भी ‘सुराज्य अभियान’ ने उठाया है।

पेड़ों की इस गंभीर स्थिति पर तत्काल कार्रवाई की जाए तथा दिल्ली की तरह SOP तैयार की जाए, इस मांग को लेकर ‘सुराज्य अभियान’ ने आज मुंबई, पुणे, कोल्हापुर, सातारा, सांगली, सोलापुर में पत्रकार परिषदें आयोजित कीं। साथ ही मुंबई के महापौर, महानगरपालिका आयुक्त, मुख्यमंत्री और पर्यावरण मंत्री तथा नाशिक, नागपुर, जळगांव में जिलाधिकारी, आयुक्त/मुख्याधिकारी और वृक्ष अधिकारियों को ज्ञापन देकर त्वरित कार्रवाई की मांग की गई है। राज्य के सभी शहरों में तुरंत ‘डी-कंक्रीटीकरण’ अभियान चलाया जाए, लेकिन यह केवल अस्थायी न होकर एक जिम्मेदार और निरंतर प्रक्रिया होनी चाहिए। वर्तमान में कंक्रीट से घिरे पेड़ों को मुक्त किया जाए और भविष्य में सड़क व फुटपाथ के ठेकों में यह शर्त शामिल की जाए कि पेड़ों के आसपास 1 मीटर जगह छोड़े बिना ठेकेदारों का भुगतान मंजूर नहीं किया जाएगा। साथ ही पिछले 3 वर्षों में हुए वृक्षारोपण का ‘थर्ड पार्टी ऑडिट’ कर वास्तविक आंकड़े सार्वजनिक किए जाएं। यदि अगले 7 कार्यदिवसों में प्रशासन ने ठोस कार्रवाई नहीं की, तो ‘सुराज्य अभियान’ की ओर से NGT Act 2010 की धारा 26 के तहत आपराधिक शिकायत और माननीय ‘नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल’ में ‘अवमानना याचिका’ दायर की जाएगी, ऐसी चेतावनी भी दी गई।

मुंबई : शहर के 29.75 लाख वृक्षों की रक्षा के लिए मुंबई महानगरपालिका ने 1 अप्रैल 2026 के दिन ‘वृक्ष संजीवनी’ अभियान घोषित किया है। क्या यह केवल एक दिन का ‘ऊपरी उपचार’ है और प्रशासन इसे केवल एक ‘इवेंट’ के रूप में देख रहा है? वृक्षों के आसपास का कंक्रीट हटाना और उन्हें कीलों से मुक्त करना कोई स्वैच्छिक सेवा नहीं है, बल्कि माननीय नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के आदेशानुसार की जाने वाली अनिवार्य कानूनी कार्यवाही है। पेड़ों पर हजारों कीलें ठोककर विज्ञापन लगाना और उनके तने तक कंक्रीट डालकर उनका गला घोंटना और प्राकृतिक विकास रोकना, ‘महाराष्ट्र वृक्ष संरक्षण एवं संवर्धन अधिनियम, 1975’ के साथ नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के स्पष्ट आदेशों का सीधा अवमान है। इन गंभीर उल्लंघनों की अनदेखी कर केवल जन-जागरूकता के कार्यक्रम चलाने के बजाय, दोषियों पर सीधे फौजदारी (Criminal) मामले दर्ज कर कठोर दंडात्मक कार्रवाई की जाए, ऐसी पुरजोर मांग हिंदू जनजागृति समिति के ‘सुराज्य अभियान’ ने की है।

इस संदर्भ में जलगांव और सतारा जिला प्रशासन को पहले ही विशेष ज्ञापन दिए जा चुके हैं और नागपुर सहित मुंबई महानगरपालिका के महापौर और आयुक्त को भी ज्ञापन दिया गया है। राज्य में स्थिति अत्यंत भयावह है; केवल मुंबई में ही पिछले एक साल में पेड़ों से 17.43 किलो कीलें और 1460 अवैध विज्ञापन बोर्ड हटाए गए हैं। वृक्षों के चारों ओर 1 मीटर जगह कच्ची यानी ‘अनपेव्ड’ (Unpaved) रखने के उच्च न्यायालय के निर्देश होने के बावजूद, विकास कार्यों में हजारों पेड़ों के आसपास सीमेंट की परतें कैसे बिछाई जाती हैं? इतनी बड़ी संख्या में वृक्ष संपदा संकट में होने के बावजूद प्रशासन विज्ञापनदाता या ठेकेदार पर मामला दर्ज क्यों नहीं करता?, यह चिंता का विषय है। पेड़ों की जड़ों को ऑक्सीजन मिलना बंद होने के कारण वे कमजोर होकर गिरने की घटनाएं बढ़ी हैं, जिसके लिए पूरी तरह से प्रशासनिक लापरवाही जिम्मेदार है।

हमारी मांगों में ‘Polluter Pays’ (प्रदूषण फैलाने वाला भुगतान करे) सिद्धांत के अनुसार पेड़ों के आसपास का कंक्रीट दोषी ठेकेदारों के स्वयं के खर्च पर हटाया जाए। ऐसे ठेकेदारों को केवल नोटिस न देकर तत्काल ‘ब्लैकलिस्ट’ किया जाए। सरकारी निविदा (Tender) में ही पेड़ों के आसपास जगह छोड़ने की शर्त अनिवार्य हो। इसका उल्लंघन होने पर ठेकेदार का भुगतान रोका जाए। ‘वृक्ष संजीवनी’ जैसी मुहिम केवल एक शहर तक सीमित न रखकर, इसे पूरे महाराष्ट्र में प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए राज्य सरकार तत्काल आदेश जारी करे। प्रशासन केवल एक दिन का ‘इवेंट’ न कर कानून का कड़ाई से पालन करे। पूरे महाराष्ट्र में वृक्ष मुक्त सांस ले सकें, ऐसी स्थायी कानूनी व्यवस्था निर्माण की जाए। जब तक नियम तोड़ने वाले व्यावसायिक संस्थानों और ठेकेदारों पर कानून का डर पैदा नहीं होता, तब तक यह वृक्ष संपदा सुरक्षित नहीं होगी, ऐसी भूमिका सुराज्य अभियान के समन्वयक श्री. अभिषेक मुरुकटे ने रखी है।

Latest News