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अफ़ग़ानिस्तान : सिखों के हालात कितने ख़राब ?

भाद्रपद अमावस्या, कलियुग वर्ष ५११६

क़रीब १८ घंटे तक एक कंटेनर में बंद रहे कुछ अप्रवासी अफ़ग़ान सिखों को कुछ दिन पहले ब्रिटेन के एक बंदरगाह पर बचाया गया था।

उन ३५ लोगों में औरतें और बच्चे भी थे। ४० साल के मीत सिंह कपूर ने तो दम तोड़ दिया, बाक़ी ३४ को अस्पताल ले जाया गया जहाँ वे ठीक हैं।

ये निश्चित होने के बाद कि ये अफ़ग़ान सिख हैं, ब्रिटिश अधिकारियों ने स्थानीय गुरूद्वारे से संपर्क किया।

कंवलजीत सिंह मटरू अफ़ग़ान सिखों से मिले, जिन्होंने बताया कि कुछ देर और होती तो उनका बचना मुश्किल था।

कंवलजीत सिंह मटरू ने कहा, "उन्होंने बताया कि और १५-२० मिनट में हम ख़त्म हो जाते, तब हमने कंटेनर को पीटना शुरू किया ताकि कोई आवाज़ सुनकर हमें बचा सके।"

मगर असल सवाल तो ये है कि आख़िर ये लोग अफ़ग़ानिस्तान से जान जोखिम में डालकर भागे क्यों ?

दमन की शिकायत

                                         टिलबरी बंदरगाह के इन्हीं कंटेनरों में सिख बंद थे।

अफ़ग़ानिस्तान में सिख पिछले कोई दो सदी पहले से बसे हैं।

७० के दशक में वहाँ उनकी आबादी लगभग दो लाख थी, मगर समझा जाता है कि अब वहाँ मुश्किल से पाँच हज़ार से भी कम सिख रह गए हैं, बल्कि कुछ तो ये संख्या दो-तीन हज़ार के आस-पास बताते हैं।

वहाँ से सिखों का बड़ा पलायन हुआ १९८० के दशक में जब सोवियत सेना ने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला किया और फिर वहाँ गृहयुद्ध चला।

इसके बाद १९९२ में भी अफ़ग़ानिस्तान की कम्युनिस्ट सरकार के पतन के बाद बड़ी संख्या में सिखों ने वहाँ से पलायन किया।

अफ़ग़ानिस्तान में दशकों से जारी संघर्ष के बीच अल्पसंख्यक लगातार दमन की शिकायत करते रहे हैं।

कंटेनर में मारे गए मीत सिंह कपूर के जलालाबाद शहर में रहने वाले चाचा दिलीप सिंह ने बताया कि अफ़ग़ानिस्तान में सिखों की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं।

ब्रिटेन में शरण

उन्होंने बताया, "हमें धमकियां मिलती हैं। हम मदद मांगने के लिए गवर्नर के पास गए और बताया कि हमें उगाही के लिए फ़ोन कॉल आते हैं, वे हमें धमकाते हैं।"

काबुल में बसे सिख बताते हैं कि उन्हें कोई वहां अपना भविष्य नहीं दिखता, और इसलिए वे अफ़ग़ानिस्तान से निकलना चाहते हैं।

एक स्थानीय सिख ने कहा, "यहाँ कोई नौकरी नहीं, ना सुरक्षा है, इसलिए लोग यूरोप भाग रहे हैं, जहाँ सैलरी अच्छी है, ज़िंदगी अच्छी है।"

एक अन्य स्थानीय सिख का कहना था, "पहले ५० फ़ीसदी कारोबार अफ़ग़ान सिखों के हाथ में था, अब ये एक फ़ीसदी भी नहीं रह गया है। हमसे हफ़्ता मांगा जाता है, संपत्ति हड़प ली जाती है।"

फ़िलहाल ब्रिटेन में बसे सिख, अफ़ग़ानिस्तान से आए सिखों की मदद कर रहे हैं और उनके लिए सामान भेज रहे हैं।

ब्रिटेन के गृह मंत्रालय ने भी कहा है कि इन ३४ अफ़ग़ान सिखों को ब्रिटेन में शरण देने के बारे में विचार किया जा रहा है।

स्त्रोत : बीबीसी हिन्दी

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