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धर्मांधों को नतमस्तक करने वाले भाग्यनगर (हैदराबाद) के हिन्दू संगठन !

भाद्रपद शुक्ल पक्ष तृतीया, कलियुग वर्ष ५११६

१. प्राचीन श्री भाग्यलक्ष्मी मंदिर का इतिहास !

 

आजतक एक भी धर्मांध के लिए श्री भाग्यलक्ष्मी मंदिर को तोडना असंभव रहा है, यह इस मंदिर का इतिहास है । इस मंदिरमें सैकडों वर्षसे विशेषरूप से दशहरा एवं दीवाली मनाई जाती है । कुतुबशाहने अपनी पत्नीके स्मरणार्थ इ.स. १५९१ में चारमीनार का निर्माणकार्य किया था । उसकी पत्नी भागमती नामक एक हिन्दू महिला थी । जिस समय उसने चारमीनार का निर्माण कार्य किया, उस कालावधि में भी श्री भाग्यलक्ष्मी मंदिर एक छोटी शिला के रूप में वहीं था । जब चारमीनार का निर्माणकार्य आरंभ हुआ उस समय अनेक लोगों ने कुतुबशाह को चारमीनारका निर्माणकार्य अधिक भव्य करने के लिए मंदिररूपी इस शिला को हटाने का सुझाव दिया था; किन्तु कुतुबशाह ने उन्हें समझाया कि यदि किसी ने यह मंदिर हटाया, तो उसका सर्वनाश होगा, ऐसा इस मंदिर का इतिहास है । इस भय के कारण कुतुबशाह ने मंदिर को स्पर्श भी नहीं किया । मंदिर की सीमा को धक्का न पहुंचाकर चारमीनार का निर्माण कार्य किया गया । अनेक निजामी शासकों ने यह मंदिर गिराया; किन्तु प्रतिमाको स्पर्श भी करनेमें वे असमर्थ रहे । जिस समय वे मंदिर गिराते थे, उस समय हिन्दू मंदिरके पुर्ननिर्माण का कार्य करते थे ।

 

२. साधारण कारणसे हिंसा कर श्री भाग्यलक्ष्मी मंदिर का लक्ष्य करनेवाले धर्मांध ! 

 वर्ष १९७९ में मंदिर के परिसर में एक हिन्दू मोटरसाईकलसवार तथा एक धर्मांधकी ऑटोरिक्शाका अपघात हुआ तथा उसी कारण वहां हिंसा हुई । उस समय धर्मांधने बलपूर्वक वहां से जानेवाली बस को ही अधिकारमें लिया तथा वह सीधी मंदिरपर टकराई । अतः मंदिर गिर गया । उस समय एम.चेन्ना रेड्डी आंध्रप्रदेशके मुख्यमन्त्री थे । जब हिन्दुओं द्वारा इस घटना का विरोध किया गया, तो ४ हिन्दुओं की हत्या हुई; किंतु एक भी धर्मांध की हत्या नहीं हुई; क्योंकि इस पुराने नगर परिसर में धर्मांधो की संख्या अधिक, तो हिन्दुओं की संख्या न्यून है; इसीलिए यहां हिन्दुओं को निरंतर पिटाई का सामना करना पडता है; किंतु वे कभी भी वहां से पीछे नहीं हटे । मंदिर गिराने के पश्चात मुख्यमंत्री एम.चेन्ना रेड्डी ने त्वरित मंदिरका पुर्ननिर्माणकार्य किया । उसके पश्चात कभी भी कोई मंदिर के निकट नहीं गया ।

 

३. गोहत्या के विरोध का कानून निरन्तर पैरोंतले रौंदकर सुदृढ गौओं की हत्या करनेवाले उद्दंड धर्मांध !

वर्ष १९७७ में गोहत्या के विरोध में किए गए अधिनियमानुसार –

१. कोई भी अवैध मार्ग से गौओं की हत्या नहीं कर सकता ।

२. अशक्त एवं मरणासन्न अवस्था वाली गौओं की ही हत्या करने की अनुमति दी गई है । किन्तु गाय अशक्त एवं मरणासन्न है, पशुवैद्यकीय अधिकारी द्वारा ऐसा प्रमाणपत्र प्राप्त करना बन्धनकारक है । किन्तु यह अधिनियम खुले आम पैरोंतले रौदकर धर्मांध सुदृढ एवं निरोगी गौएं तथा बछडों की हत्या करते हैं । इस अधिनियम के आधार पर यह प्रस्तुत किया गया है कि उच्च न्यायालय में हमारे याचिका प्रविष्ट करने के पश्चात् यदि न्यायालय द्वारा हमारे पक्षमें आदेश देते समय गायकी हत्या की जानेकी सूचना यदि किसी ने पुलिस को दी, तो पुलिस उस पर कार्रवाई करेगी । केवल सूचना देने का ही कार्य हमने किया ।

 

४. यदि गाय की हत्या की गई, तो कसाई की भी हत्या की जाएगी, ऐसे हिन्दुओं द्वारा चेतावनी देने के पश्चात बकरी ईद के दिन गोहत्या बंद !

एम.आइ.एम. के संसद सदस्य तथा विधायकोंके पशुवधगृह यहां अधिक मात्रामें हैं । इन पशुवधगृहोंमें प्रतिदिन सहस्रोंकी संख्यामें गौओंकी हत्या की जाती है । प्रतिवर्ष बकरी ईदके समय हमारी संस्थाद्वारा गोरक्षाका कार्य किया जाता है । इस वर्ष बकरी ईद के समय हमने नगर में एक भी गाय लाने की अनुमति नहीं दी तथा हत्या करनेके लिए भी नहीं दिया । हमने एक बडी सभा का आयोजन कर पुलिस को अंतिम चेतावनी दी कि यदि गाय की हत्या की गई, तो कसाई की भी हत्या की जाएगी । हम चुप नहीं बैठेंगे । सभामें ऐसी चेतावनी देने के पश्चात पुलिस महासंचालक द्वारा अधिनियम एवं सुव्यवस्था की रक्षा करने हेतु एक बैठक आंमत्रित कर उसमें हत्या के लिए गौओं को नगर में लाने के लिए अनुमति न देने का निर्णय अपनाया गया । पुलिस तथा धर्मांधो के बीच टकराव हुआ । धर्मांध गौओं को नगर में लाने का प्रयास कर रहे थे तथा पुलिस उनकी पिटाई कर भगा रही थी । साथ ही गौओं को उनके चंगुल से मुक्त कर गोशाला में भेज रही थी ।

 

५. … तथा ओवैसी क्रोध से भडक गया !

बकरी ईद के दिन एक भी गाय की हत्या न होने के कारण अकबरुद्दीन ओवैसी  क्रोध से भडक गया तथा उन्होंने हिन्दुओं के कार्यक्रम में बाधाएं उत्पन्न करने का प्रयास किया । उस समय दीवाली आरंभ होने वाली थी । दीवाली में श्री भाग्यलक्ष्मी मंदिर में भारी संख्या में हिन्दू दर्शनके लिए आते हैं । अतः ओवैसी ने यह झूठा वक्तव्य दिया कि यह मंदिर अवैध है ।

 

६. ओवैसी की धर्मांधता एवं तत्कालीन कांग्रेस के मुख्यमन्त्रीकी चतुराई !

दीवाली से पूर्व श्री भाग्यलक्ष्मी मंदिर सुशोभित किया जाता है । मंदिर के लक्ष्मीपूजन के लिए लक्षावधि हिन्दू उपस्थित रहते हैं । प्रतिवर्ष मंदिर का पुराना छप्पर निकालकर नया छप्पर डाला जाता है । मंदिर का पुराना छप्पर निकालनेके पश्चात धर्मांधोने त्वरित उच्च न्यायालयमें याचिका प्रविष्ट की । उस याचिकामें यह अंकित किया कि मंदिर का निर्माणकार्य भव्य रूप से आरंभ किया है तथा उसके लिए चारमीनार में एक छिद्र लगाकर उसमें मंदिर का स्तम्भ लगाने के प्रयास हिन्दुओंद्वारा हो रहे हैं । इस परिवाद पर उच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि चारमीनार एक प्राचीन कलाकृति है । यदि श्री भाग्यलक्ष्मी मंदिर का निर्माणकार्य भव्यरूप का करते हुए चारमीनार की कुछ हानि होगी, तो कानून का उल्लंघन होगा । इसपर हमारे हिन्दू विधिज्ञ एवं मंदिरकी व्यवस्था देखनेवाले श्री. शशिजीने पुनः उच्च न्यायालयमें याचिका प्रविष्ट कर यह बताया कि हम चारमीनार को किसी भी प्रकार की हानि नहीं पहुंचने देंगे; क्योंकि मंदिर चारमीनार से ४ फीट की दूरी पर है । मंदिर का पुराना छप्पर निकालकर नया छप्पर डालने का कार्य प्रतिवर्ष किया जाता है । इसपर पुनः उच्च न्यायालय द्वारा यह आदेश प्राप्त हुआ कि इस मंदिर का छोटा अथवा बडा निर्माण कार्य करनेके लिए अनुमति नहीं है । मंदिर जिस स्थितिमें है, उसी स्थितिमें रहना चाहिए । उस समय तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री. किरण कुमार रेड्डी ने पुलिस सुरक्षा में मंदिर पर पुनः छप्पर डाला । ऐसा कृत्य करने वाले वे कांग्रेस के प्रथम ही मुख्यमन्त्री थे ।

 

७. धर्मांध एम.आइ.एम. द्वारा कांग्रेस को सहयोग करने से अस्वीकृति !

मुख्यमन्त्री की इसी भूमिका के कारण एम.आइ.एम. द्वारा कांग्रेस को सहयोग करने के लिए अस्वीकृति दी गई । एम.आइ.एम. पक्षमें १संसद सदस्य, ७ विधायक तथा भाग्यनगर महानगरपालिका के ४५ नगरसेवक अंतर्भूत हैं ।

 

८. ओवैसी द्वारा हिन्दुओं के विरोध में प्रक्षोभक वक्तव्य !

जब यह युति समाप्त हुई, उस समय से ओवैसी ने प्रक्षोभक वक्तव्य देना आरंभ किया । प्रथम उसने निजामाबादमें वक्तव्य किया । उस समय उनपर कार्रवाई करने के लिए त्वरित पुलिस महासंचालकों को निवेदन प्रस्तुत किया । तदुपरान्त उसने निर्मल में अति प्रक्षोभक वक्तव्य किया । उसका यह वक्तव्य हम सभी ने सुना है । उसमें उसने यह वक्तव्य दिया था कि यदि पुलिस को हटाया गया, तो २५ करोड धर्मांध १५ मिनटमें १०० करोड हिन्दुओंको नष्ट करेंगे । हम गायका मांस भक्षण करते हैं । आप भी भक्षण कर, इस बातका अनुभव करें कि वह कितना अच्छा लगता है ! तत्पश्चात सुदर्शन समाचारप्रणाल ने उसके इस वक्तव्यका बडा विषय बनाया । उस समय शासन ने उसे कारागृह में बन्दी बनाया । तत्पश्चात वह चुप हुआ ।

 

९. विधानसभा में श्री भाग्यलक्ष्मी मंदिर को `धब्बा’, (कलंक) ऐसा सम्बोधन करने वाला हिन्दूद्वेष्टा ओवैसी तथा मतों के लिए उसे प्रत्युत्तर न देनेवाले, उसकी चापलूसी करनेवाले हिन्दू विधायक एवं मन्त्री !

आंध्रप्रदेश की विधानसभा का सत्र आरंभ था, उस समय ओवैसी ने श्री भाग्यलक्ष्मी मंदिर को धब्बा कहकर सम्बोधित किया था । उस समय वहां उपस्थित मन्त्री तथा सर्व दलोंके (उदा. कांग्रेस, भाजपा, तेलगूदेसम्) हिन्दू विधायको में से किसी एक ने भी इसपर आपत्ति नहीं उठाई । क्योंकि हमारे नेता नपुंसक हैं । प्रत्येक नेता को धर्मांधोके मतों की आवश्यकता है । किन्तु धर्मांध हिन्दू नेता को कभी मत नहीं देते, यह बात उनकी समझमें नहीं आती ।

 

१०. हिन्दुओं द्वारा संगठित प्रतिकार की अपेक्षा

धर्मांध आवैसी के विरोध में यदि हिन्दू संगठित हुए, तो ही उनपर कार्रवाई की जाएगी । यदि हिन्दू इस प्रकार ही निद्रिस्त रहेंगे एवं जबतक प्रतिकार नहीं करेंगे, तबतक वे अपनी तथा अपने परिवारकी रक्षा नहीं कर सवेंâगे । जो हिन्दू स्वयंकी रक्षा करनेमें असमर्थ हैं, वे भारतकी रक्षा क्या करेंगे ? हिन्दुओंको संगठित होकर प्रतिकार करनेकी आवश्यकता है ।

 

११. धर्मांध की टोपी पहनकर इस्लाम को सलाम करनेवाले जनप्रतिनिधियों की बढती हुई संख्या !

धर्मांधोके संगठित होने का स्थान अर्थात मस्जिद ! कौन से राजनीतिक दल को सहयोग करना है, यह बात वहीं निश्चित की जाती है । जो धर्मांधोकी दासता स्वीकार करते हैं अथवा उनकी टोपी पहनकर इस्लाम को सलाम करते हैं, उन्हें ही धर्मांध सहयोग करते हैं । धर्मांध अल्प तथा हिन्दू अधिक संख्या में रहने वाले क्षेत्र में जो राजनीतिक दल उनके सामने झुककर सलाम करता है, उन्हें ही धर्मांध सहयोग करते हैं । ऐसे लोगों की संख्या अब बढ रही है ।

 

१२. धर्मनिरपेक्ष नहीं, अपितु छत्रपति शिवाजी महाराज के समान सिद्ध नेता होने चाहिए !

यदि धर्मनिरपेक्ष नेता अधिक उत्पन्न हुए, तो वे कंगन पहनकर घर में बैंठेंगे तथा एक समय ऐसा आएगा कि हमें तिलक लगाने के लिए तथा स्वयं को हिन्दू कहलवाने के लिए भी विचार करना पडेगा । जबतक स्वयं को धर्मनिरपेक्ष कहलवानेवाले नेता भारत में होंगे, तबतक हिन्दू राष्ट्र की स्थापना करने के लिए हमें अत्याधिक परिश्रम करने पडेंगे । जो गोरक्षा तथा हिन्दू हितका कार्य करेगा, उसे ही हमारा मत होगा, यह हमारी घोषणा है । हिन्दुओ, हरएक को यह बताईए कि हमें धर्मनिरपेक्ष नेता नहीं चाहिए, हिन्दूनिष्ठ नेता चाहिए, जो समय आनेपर छत्रपति शिवाजी महाराज के अनुसार तलवार उठाकर जैसे को तैसा उत्तर देगा । यदि ऐसे नेता निर्माण हुए, तो ही हिन्दुओं की एवं इस राष्ट्र की रक्षा होगी ।

 

१३. हिन्दुओं की रक्षा करना, यही आद्यकर्तव्य !

बंधुओ, हमें सतर्क रहकर अभियान करना है । प्रत्येक क्षेत्र में इन विचारों से कार्य का आरम्भ करें । जहां आपको हमारी आवश्यकता है, वहां हम उपस्थित रहेंगे । आपके हाथ में हाथ मिलाकर आपके क्षेत्र में कार्य करेंगे; क्योंकि हमारा जीवन हिन्दू समाज के लिए समर्पित है । हिन्दू धर्म में जन्म हुआ है, इस बात का हमें अभिमान होना चाहिए । हमें धन इकट्ठा कर चैन से नहीं रहना है । हिन्दू समाज की रक्षा करना ही हमारा प्रमुख कर्तव्य है; इसलिए हमें उसके लिए समय निकालना ही चाहिए ।

जय श्रीराम । जय गोमाता !

आमदार श्री. राजासिंह ठाकूर, संस्थापक एवं अध्यक्ष, श्रीराम युवा सेना, भाग्यनगर, आंध्रप्रदेश.

 

स्त्राेत : दैनिक सनातन प्रभात

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