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जलमार्ग केवल अमीरों तक सीमित न रहे, आम लोगों के लिए ‘यात्री जल परिवहन’ शुरू करें – हिन्दू विधिज्ञ परिषद का सरकार से आवाहन

मुंबई : विमान, रेलवे और सड़क परिवहन की तुलना में अधिक सस्ता, पर्यावरण के अनुकूल और दुर्घटना-मुक्त होने के बावजूद, राज्य सरकार जल परिवहन की अनदेखी कर रही है। सरकार सड़क निर्माण, भूमि अधिग्रहण और पुलों के काम पर करोड़ों रुपये खर्च करती है, लेकिन प्रकृति प्रदत्त जलमार्गों का उपयोग यात्री परिवहन के लिए नहीं किया जा रहा है। बढ़ती आबादी और सड़क-रेल परिवहन पर पड़ने वाले भारी दबाव को देखते हुए, सरकार को जलमार्गों का उपयोग केवल अमीरों के ‘क्रूज़ पर्यटन’ तक सीमित न रखकर आम लोगों के लिए भी यात्री जल परिवहन शुरू करना चाहिए। यह आवाहन हिन्दू विधिज्ञ परिषद ने किया है। परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष अधिवक्ता वीरेंद्र इचलकरंजीकर ने इस संबंध में गृह सचिव (बंदरगाह और परिवहन) और मैरीटाइम बोर्ड को एक विस्तृत पत्र भेजा है।

केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, सड़क परिवहन की लागत 3.78 रुपये प्रति किलोमीटर और रेलवे की 1.96 रुपये है। इसकी तुलना में, जल परिवहन के लिए यह खर्च केवल 1.80 रुपये प्रति किलोमीटर है। यह किफायती विकल्प विशेष रूप से कोंकणवासियों के लिए अत्यंत आवश्यक हो गया है। वर्तमान में कोंकण से होकर जाने वाली अधिकांश ट्रेनें दिल्ली, चेन्नई जैसी लंबी दूरी से आती हैं, इसलिए वे पहले से ही आरक्षित होती हैं। रेलवे के सामान्य डिब्बों में भी स्थानीय लोगों को जगह पाने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ता है। नतीजतन, स्थानीय लोगों की तुलना में अन्य राज्यों के नागरिकों को इन ट्रेनों का अधिक लाभ मिलता है। कोंकण रेलवे पर इस भारी दबाव को देखते हुए, जल परिवहन का विकल्प उपलब्ध होने पर कोंकणवासियों की यात्रा अधिक आरामदायक हो जाएगी, ऐसा अधिवक्ता इचलकरंजीकर ने पत्र में कहा है। चूंकि जल परिवहन सड़क परिवहन की तुलना में आधे से भी कम खर्चीला है, इसलिए पड़ोसी राज्य गुजरात में ‘हजीरा से घोघा’ जल परिवहन सफलतापूर्वक शुरू किया गया है। इसके अलावा, दक्षिण अमेरिका में भी 58 नॉट्स (knots) की गति से चलने वाली यात्री नावें चल रही हैं। कुछ साल पहले, महाराष्ट्र में भी ‘कोंकण शक्ति’, ‘कोंकण सेवक’ और ‘दमानिया कैटामरान’ जैसी यात्री जल परिवहन सेवाएं शुरू थीं। हालांकि, अन्य क्षेत्रों में प्रगति करने वाला महाराष्ट्र इस मामले में पिछड़ गया और पुरानी व्यवस्था को भी बनाए नहीं रख सका। सड़क और पुलों के निर्माण से ठेकेदार पैसे ऐंठते हैं, और संबंधित पक्षों को टोल (पथकर) से भी अपना हिस्सा मिलता है। परिषद ने इस पत्र में एक जायज संदेह भी उठाया है कि क्या इन्ही आर्थिक हितों के कारण जानबूझकर जल परिवहन की अनदेखी की जा रही है।

इस पूरी स्थिति की पृष्ठभूमि में, हिन्दू विधिज्ञ परिषद ने सरकार के समक्ष प्रमुख मांगें रखी हैं। मुंबई से मंगलुरु (कर्नाटक) तक ‘रो-पैक्स’ (Ro-Pax) यात्री जल परिवहन एक निश्चित समय सीमा के भीतर शुरू किया जाना चाहिए और आम नागरिकों के लिए एक किफायती यात्रा योजना तैयार कर उस पर तत्काल कार्रवाई की जानी चाहिए। यह स्वागत योग्य है कि सरकार व्यापार के दृष्टिकोण से बंदरगाहों का विकास कर रही है; लेकिन यात्री जल परिवहन शुरू करने से इन बंदरगाहों का पूरा उपयोग होगा। इससे आम लोग कम खर्च में और प्रदूषण मुक्त यात्रा का आनंद ले सकेंगे। इसलिए सरकार को इस मांग को प्राथमिकता देनी चाहिए, ऐसी अपेक्षा परिषद ने व्यक्त की है।

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