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गुजरात में बच्चों को पढ़ाया जा रहा, ‘वैदिक काल में थी मोटर कारें’

श्रावण शुक्ल पक्ष चतुर्थी, कलियुग वर्ष ५११६

गांधीनगर(गुजरात) – प्रदेश के प्राथमिक विद्यालयो मे बच्चों को ‘३० अक्टबूर १९४८ को महात्मा गांधी की हत्या की गई थी’, ‘दूसरे विश्व युद्ध में जापान ने अमरीका पर परमाणु हमला किया था’ और ‘देश के विभाजन के बाद इस्लामिक इस्लामाबाद देश अस्तित्व में आया था’ यह पढ़ाने के बाद गुजरात सरकार ऎसी पाठयपुस्तक स्कूलों मे लागू करने जा रही है जिसमें बच्चों को पढ़ाया जाएगा की महाभारत काल से मूल कोशिका तकनीक चली आ रही है।

एक अंग्रेजी वेबसाइट पर छपी खबर के अनुसार, आरएसएस की शिक्षा इकाई विद्या भारती के राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य दीनानाथ बत्रा द्वारा लिखी गई इस किताब के आठ सेट को गुजरात स्कूल टेक्सट बोर्ड ने गुजराती भाषा मे छपवाकर तैयार किया गया है। माना जा रहा है कि हिंदू विचारधारा को बढ़ावा देने के लिए ऎसा किया गया है।

किताब के माध्यम से गुजरात के प्राथमिक और सेकेंडरी के छात्रों को यह विश्वास दिलाया जाएगा की मूल कोशिका तकनीक १०० कौरवों के पैदा होने से शुरू हुई।

दीनानाथ बत्रा द्वारा १२५ पन्नो की लिखित "तेजोमय भारत" में कहा गया है कि अमरीका मूल कोशिका के आविष्कार श्रेय लेना चाहता है। लेकिन, सच यह है कि भारत के डॉक्टर बालकृष्णा गणपत मातापुरकर ने शरीर के अंगों का पुनर्जन्म करने का पेटेंट करवा लिया है।

किताब में आगे कहा गया है कि आपको यह जानकर हैरानी होगी की यह खोज नई नहीं है और डॉक्टर मातापुरकर महाभारत से प्रेरित हुए। कुंती के पास सूर्य जैसी तेज का बेटा था, जबकि गांधारी के शादी के दो साल बाद भी कोई औलाद नहीं हुई थी। उसे जब कुंती की औलाद के बारे में पता चला तो उसने गर्भपात करवा लिया। उसके गर्भ से बहुत बड़ा मांस का टुकड़ा निकला। ऋषि दवाइपायन व्यास को बुलाया गया। उन्होने मांस का अध्यनन करने के बाद एक ठंडी कुंड मे विशेष दवाओ के साथ संभाल कर रख दिया। व्यास ने बाद मे मांस के १०० टुकड़े करके १०० अलग अलग कुंडों में घी के साथ दो साल के लिए संभालकर रख दिया। दो साल बाद १०० कौरवों का जन्म हुआ। इसे पढ़ने के बाद मातापुरकर को सिद्ध हुआ की मूल कोशिका उनकी इजात नहीं है। इसकी खोज भारत में हजारो साल पहले कर ली गई थी।

किताब में वाहन तकनीक के बारे में बताया गया है, जिसपर स्कूली बच्चे विश्वास करें। हम जो आज जानते हैं कि मोटर कार का वेदिक काल मे वाहनो का अस्तित्व था। उसे अनशवा रथ के नाम से जाना जाता था। आमतौर पर रथ को घोड़े खींचते हैं, लेकिन अनशवा रथ का मतलब है कि वह रथ जो बिना घोड़ों की मदद से चलता है। ऋग्वेद में इसका उल्लेख है।

जब गुजरात के शिक्षा मंत्री भूपेंद्रसिंन चुदासामा ने बताया कि यह किताबें सिर्फ बच्चो के संदर्भ के लिए हैं ताकि उन्हें भारतीय संस्कृति के बारे में जान सकें। ये किताबें अनिवार्य नहीं हैं और न ही पाठयक्रम का हिस्सा हैं।

मंत्री ने आगे कहा कि किताबों को वापस लेने का सवाल ही नहीं है क्योंकि ये अनिवार्य नहीं हैं।

स्त्रोत : पत्रिका

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