न्यायालयद्वारा संतोंकी अपकीर्ति करनेवाले ‘संतसूर्य तुकाराम’ एवं ‘लोकसखा ज्ञानेश्‍वर’ ये प्रकाशनोंपर प्रतिबंध लगानेकी मांग

ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष चतुर्दशी, कलियुग वर्ष ५११६

 .संतोंकी अपकीर्ति करनेवाले आनंद यादवके साथ तथाकथित विद्रोहियोंको सनसना तमाचा !

 .वारकरियों एवं हिंदुओ, इस सफलताके विषयमें श्री विठ्ठलके चरणोंमें कृतज्ञता व्यक्त करे ! 
 . वारकरियोंकी वैधानिक लडाईको भव्य सफलता ! संतोंकी अपकीर्ति करनेवाले व्यक्तियोंपर न्यायालय कठोर कार्यवाही करे, ऐसी हिंदुओंकी अपेक्षा है !

 . हिंदुओ आपके आस्थास्थानोंका अवमान करनेवाले लोगोको पाठ पढाने हेतु वारकरियोंके इस लढाईका आदर्श आखोंके समक्ष रखे एवं धर्मके लिए सक्रिय हों !


देहूगाव-पुणे(महाराष्ट्र) : प्रथमवर्ग न्यायदंडाधिकारी के.पी. जैनद्वारा २७ मईको ऐसा आदेश दिया गया है कि संतशिरोमणी तुकाराम महाराज एवं संतश्रेष्ठ ज्ञानेश्‍वर महाराजके संदर्भमें आनंद यादवलिखित ‘संतसूर्य तुकाराम’ एवं ‘लोकसखा ज्ञानेश्‍वर’ पुस्तकमें कपोलकल्पित एवं अपकीर्तिजनक लेखन किया गया है । इस संदर्भमें लेखक एवं प्रकाशक २० सहस्र रुपये दंड भरे एवं कथित पुस्तके फाडकर नष्ट करें । (वारकरियोंद्वारा वैधानिक मार्गसे किए गए संषर्षकी महत्वपूर्ण सफलता ! वारकरी संप्रदायका आदर्श लेकर सर्वत्रके हिंदुओंको अपने आस्थास्रोतोंके अवमानके विरोधमें लडाई तीव्र करे ! – संपादक, दैनिक सनातन प्रभात) वाङ्मयीन क्षेत्रके विषयमें भारतमें इस प्रकारका यह प्रथम ऐतिहासिक परिणाम है । (इस परिणामसे सीख लेकर अभिव्यक्ति स्वतंत्रताके नामपर हिंदुओंके आस्थास्रोतोंकी अपकीर्ति करनेवाले क्या बुद्धिमान हो जाएंगे अथवा क्या स्वतंत्रताके नामपर उन्हें भी न्यायालयीन प्रक्रियाकी कार्यवाहीकी आवश्यकता है ? – संपादक, दैनिक सनातन प्रभात) संत तुकाराम महाराजके वारिस ह.भ.प. जयसिंग महाराज मोरेने संतोंकी अपकीर्तिका प्रकरण उजागर किया । (करोडों वारकरी एवं हिंदुओंके आस्थास्रोतोंके अवमानके संदर्भमें वैधानिक मार्गसे सफलतापूर्वक लडाई करनेवाले ह.भ.प. जयसिंग महाराज मोरे समान धर्माभिमानी सर्वत्र
हों ! – संपादक, दैनिक सनातन प्रभात) 

१. ह.भ.प. मोरेद्वारा २ एप्रिल २००९ को न्यायालयमें यादव, मेहता पब्लिशिंगके मालिक सुनील मेहता एवं अधिकारपूर्ण स्वाती यादवके विरुद्ध एक करोड रुपयोंका दावा प्रविष्ट किया गया था तथा इन प्रकाशनोंपर स्थायी रूपसे प्रतिबंध लगानेकी मांग भी की गई थी ।
२. न्यायालयने यादव एवं प्रकाशक सुनील मेहताको पुस्तकके लेखनके प्रमाण प्रस्तुत करनेके आदेश दिए; परंतु वे उन्हें प्रस्तुत नहीं कर पाए । इसलिए उपर्युक्त परिणाम घोषित किया गया ।
३. यद्यपि इस पुस्तकमें स्वाती यादवका नाम अधिकारपूर्ण रूपमें है, तब भी उनके पास इस अधिकारका कोई प्रमाण न रहनेके कारण उन्हें निर्दोष मुक्त किया गया ।
४. परिवादकर्ताद्वारा शशिकांत पुराणिक, विनायक कुलकर्णी, ह.भ.प. संभाजी महाराज मोरे, ह.भ.प. जालिंदर मोरे, दिनेश रंधवे, ह.भ.प. माधव महाराज शिवनीrकर, रमेश बावकर, विलास दिक्षीत, दीपक वर्मा, ह.भ.प. नरहरी महाराज चौधरी, ह.भ.प. ज्ञानेश्‍वर महाराज नामदास आदि १२ गवाहोंकी जांच की ।
५. संदर्भके रूपमें अनेक पुस्तकोंका उपयोग किया गया । ये सब साक्ष्यप्रमाण जांच  करनेके पश्चात न्यायाधीशद्वारा लेखक एवं प्रकाशकको अपराधी सिद्ध कर उन्हें १५ सहस्र रुपयोंकी प्रतिभूती एवं उतनीही राशिका बॉन्ड देनेका घोषित किया गया है ।
६. साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता आनंद यादवके संतसूर्य तुकाराम पुस्तकके विरोधमें महाराष्ट्रमें इससे पूर्व प्रचंड विवाद मचा था । उसीप्रकार हिंदुनिष्ठ संगठन एवं वारकरी संप्रदायने साहित्य सम्मेलन उध्वस्त करनेकी धमकी देनेके कारण यादवको अखिल भारतीय साहित्य सम्मेलनका अध्यक्षपद छोडना पडा था ।

‘संतसूर्य तुकाराम’ उपन्यासमे आनंद यादवने क्या लिखा था ?

१. तुकाराम महाराज गांजा पीते थे !
२. वे जुगारके अड्डेपर जाते थे !
३. वे विलासी एवं बाहेरख्याली मानसिकताके थे !
४. वे आवारा थे !
५. मद्यपी मित्रोंकी बडबड सुननेमें एवं उनमें लडाई करानेमें आनंद लेते थे !
६. मित्रोंके औरतोंकी समस्याएं, बदफैली वर्तनकी चित्रकथाएं सुननेमें  रस लेते थे !
७. कौन किस बाईके साथ है, उसे मिलकर चालाकी सुननेमें उन्हें मजा आता  था !

यह पढकर जिनका रक्त नहीं खौलता, वे हिंदु ही नहीं है !

आनंद यादवकी उद्दंडताको रोक !

जिस समय यह अभियोग प्रविष्ट किया गया, उस समय आनंद यादवने अत्यधिक उद्दंडतासे प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि क्या उन्हें कादंबरीका अर्थ समझमें आता है ? ऐसा प्रश्‍न करनेवाले यादवके साथ उन्हें उस समय साथ देनेवाले तथाकथित अभिव्यक्ति स्वतंत्रता वाले व्यक्तियोंको इस परिणामसे सनसनी तमाचा मिला है ।
स्त्रोत : दैनिक सनातन प्रभात

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