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राम नवमी : श्रीराम के आदर्शों को अपनाकर रामराज्य की ओर कदम बढाएं

रामराज्य एक आदर्श समाज का प्रतीक है। ऐसा समाज जो धर्म पर आधारित हो, जहां सत्य की विजय हो और न्याय की स्थापना हो।

आज जब समाज में भ्रष्टाचार, अन्याय और धर्म की उपेक्षा बढती दिखाई दे रही है, इसलिए अब रामराज्य का आदर्श पहले से भी अधिक आवश्यक हो गया है।

इस राम नवमी पर संकल्प लें कि, हम अपने दैनिक जीवन में श्रीराम के गुणों को अपनाकर तथा धर्म को सामर्थ्यवान बनाकर रामराज्य की दिशा में एक कदम बढाएंगे।

रामराज्य क्या है ?

रामराज्य केवल आदर्श शासन नहीं है, अपितु यह धर्म पर आधारित आचरण करने की पद्धति है। यह ऐसा समाज है जहां सत्य का पालन होता है, न्याय मिलता है और जनता का कल्याण सबसे महत्वपूर्ण होता है।

रामराज्य में सभी लोग अनुशासन, ईमानदारी, आपसी सम्मान और धर्म के अनुसार जीवन जीते हैं। जब व्यक्ति ऐसे मूल्यों को अपनाता है, तो समाज अपने आप धर्म के मार्ग पर चलने लगता है।

भगवान श्रीराम के शासनकाल में रामराज्य वास्तव में स्थापित था। हर निर्णय धर्म के अनुसार लिया जाता था और प्रजा का कल्याण सर्वोपरि था।

श्रीराम की अनुपस्थिति में भी भरतजी ने पूरी निस्वार्थ भावना से शासन किया। उन्होंने सिंहासन पर श्रीराम की पादुकाएं रखीं और स्वयं को राजा नहीं, अपितु सेवक माना।

आज समाज में स्वार्थ, भ्रष्टाचार, कानून की अवहेलना और धर्म की उपेक्षा बढ रही है। ऐसे समय में रामराज्य की आवश्यकता और भी अधिक है। किंतु रामराज्य केवल सरकार बदलने से नहीं आएगा।

रामराज्य का प्रारंभ तब होता है जब व्यक्ति अपने जीवन में श्रीराम के आदर्श अपनाना आरंभ करता है।

प्रभु श्रीराम – अनुसरण करने योग्य आदर्श

श्रीराम धर्म के साक्षात स्वरूप हैं। वे आदर्श पुत्र, आदर्श पति, आदर्श बंधु, आदर्श राजा तथा एक आदर्श पुरुष हैं।

उन्होंने अपने जीवन से सिखाया –

  • अपने फायदे की अपेक्षा हमेशा सत्य का मार्ग चुनें
  • आराम से पहले कर्तव्य चुनें
  • व्यक्तिगत लाभ अर्थात स्वार्थ की अपेक्षा पहले धर्म चुनें।

इसी कारण उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है — अर्थात जो अनुशासन, संयम, सत्य, न्याय, सम्मान और वचनपालन का सर्वोत्तम उदाहरण हैं। ये केवल प्रशंसा करने के गुण नहीं हैं, अपितु जीवन में अपनाने के मूल्य हैं। जब व्यक्ति इन गुणों को अपनाता है, तो समाज अपने आप न्यायपूर्ण और धर्मपरायण बन जाता है। किंतु रामराज्य केवल व्यक्तिगत प्रयास से नहीं बनेगा। इसके लिए सामूहिक संकल्प भी आवश्यक है। ये संकल्प है – श्रीराम के आदर्शों पर चलने का, धर्म की रक्षा करने का और आध्यात्मिक रूप से सामर्थ्यवान बनने का।

आइए, इस राम नवमी पर हम श्रीराम के आदर्शों को जीवन में उतारने का पहला कदम उठाएं।

रामराज्य की ओर बढने के लिए क्या करें?

1. भ्रष्टाचार और बेईमानी का समर्थन न करें

रामराज्य का पहला चरण भ्रष्टाचार मुक्त समाज बनाना है। रिश्वत न दें, न लें और गलत कामों को अनदेखा न करें। अपनी हर जिम्मेदारी प्रामाणिकतासे निभाएं।

2. धर्म तथा देवताओं का अनादर रोकें

धर्मो रक्षति रक्षितः – जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।

यदि हमारे देवता, संत, परंपरा या धर्म का अनादर होता है तो उसके विरूद्ध संयमित मार्ग से आवाज उठाएं। चुप रहना गलत को बढावा देना है।

3. सोशल मीडिया का उपयोग धर्मजागृति के लिए करें

अनावश्यक कंटेट देखने की अपेक्षा धर्म, संस्कृति और परंपरा से जुडी अच्छी बातें साझा करें। अपने सोशल मीडिया का उपयोग हिंदुओं को जागृत करने, प्रेरित करने और उनको संगठित करने के लिए करें। धर्म के सामने खडी चुनौतियों के बारे में समाज में जागरूकता बढाएं तथा हिंदुओं को संगठित होकर उनका सामना करने के लिए प्रेरित करें।

4. अनुशासन और संयम का पालन करें

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के आदर्श को अपनाते हुए अपने जीवन में अनुशासन लाएं। समय का सदुपयोग करें, अनावश्यक मोबाइल उपयोग कम करें और नियमित दिनचर्या अपनाएं। इस बात का ध्यान रखें कि, आप अपना समय कैसे व्यतीत करते हैं, और उन आदतों से दूर रहें जो आपके ध्येय और चरित्र को कमजोर करती हैं।

5. सदा सत्य बोलें तथा ईमानदारी से व्यवहार करें

ईमानदारी और विश्वास पर बना समाज ही सामर्थ्यवान समाज होता है। झूठ बोलना, बढा-चढाकर बात करना तथा गलत पद्धति अपनाना, ऐसा करने से बचें। सदा सत्य का साथ दें, चाहे वह कठिन ही क्यों न हो। वाणी और आचरण दोनों में सत्यता रखना धर्म के सबसे महत्वपूर्ण स्तंभों में से एक है।

6. सभी के साथ सम्मान से व्यवहार करें

जहां सभी लोग एक-दूसरे के साथ सम्मान से व्यवहार करते हैं, वही रामराज्य की नींव बनती है। प्रभु श्रीराम के आदर्श को अपनाते हुए हमें अपने परिवारजन, मित्र, पडोसी एवं अपने अधीन कार्य करने वालों के साथ भी न्यायपूर्ण और सम्मानपूर्ण व्यवहार करना चाहिए।

7. अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करें

श्रीराम के आदर्श को ध्यान में रखते हुए, जिन्होंने हर भूमिका में धर्म का पालन किया, हमें भी अपने सभी कर्तव्यों को पूरी निष्ठा और जिम्मेदारी से निभाना चाहिए। चाहे हम विद्यार्थी हों, कर्मचारी हों, परिवार के सदस्य हों या एक नागरिक। कर्तव्यनिष्ठ और जिम्मेदार व्यक्ति ही रामराज्य की मजबूत नींव बनाते हैं।

8. अपना वचन हमेशा निभाएं

जो व्यक्ति अपना वचन निभाता है, वही समाज में विश्वास और सम्मान प्राप्त करता है। श्रीराम ने “प्राण जाए पर वचन न जाए” इस आदर्श को अपने जीवन में निभाया। इसी से प्रेरणा लेकर हमें भी अपने वचन तथा जिम्मेदारियों को प्रत्येक परिस्थिति में निभाना चाहिए, चाहे वह कार्यक्षेत्र हो, परिवार हो या समाज।

9. भक्ति के माध्यम से समाज को आध्यात्मिक रूप से सामर्थ्यवान बनाएं

श्रीराम का नाम केवल जप नहीं है, अपितु आध्यात्मिक शक्ति का स्रोत है।

प्रतिदिन कम से कम 30 मिनट श्रीराम नाम जप करें।

साथ ही राम भजन, रामायण पाठ और सामूहिक नामजप जैसे कार्यक्रमों में भाग लें और समाज को आध्यात्मिक रूप से सामर्थ्यवान बनाएं।

जब व्यक्ति साधना करता है, तो उसका मन शुद्ध होता है और उसके कर्म धर्ममय हो जाते हैं। केवल आध्यात्मिक रूप से जागृत समाज ही रामराज्य स्थापित कर सकता है।

रामराज्य की शुरुआत आपसे होती है!

इस राम नवमी, श्रीराम के मार्ग पर चलने का संकल्प लें।

हमें रामराज्य की प्रतिक्षा नहीं करनी है। हमे अपने आचरण से रामराज्य का निर्माण करना हैं।

याद रखें, रामराज्य का आरंभ हमसे ही होती है।

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