रासायनिक लेपन का कडा किया विरोध
मूर्ति संरक्षण के नाम पर विठ्ठल जी के ‘चरणस्पर्श’ या ‘अभिषेक’ पर प्रतिबंध लगाने का प्रयास स्वीकार नहीं किया जाएगा

महाराष्ट्र के आराध्य देव, पंढरपुर के श्री विठ्ठल मूर्ति को घिसने से बचाने के लिए पुरातत्व विभाग द्वारा एक बार फिर रासायनिक लेपन या स्टोन पाउडर पद्धति का प्रयास किया जा रहा है। इससे पहले कोरोना काल के दौरान किए गए रासायनिक लेपन के बारे में दावा किया गया था कि यह 8 से 10 साल तक चलेगा, लेकिन महज 4-5 साल में ही मूर्ति को दोबारा लेपन की आवश्यकता पड़ना यह सिद्ध करता है कि यह प्रक्रिया पूरी तरह दोषपूर्ण है। कृत्रिम रसायनों के कारण पत्थर का प्राकृतिक श्वसन (Breathing of Stone) रुक जाता है, जिससे मूर्ति के अंदर से खोखली या नाजुक होने का संकट रहता है। इसलिए, ऐसी रासायनिक और हानिकारक प्रक्रियाओं को तुरंत रोक दिया जाना चाहिए। वारकरी संतों-महंतों और विशेषज्ञों का मार्गदर्शन लेकर धर्मशास्त्र के अनुसार ही लेपन किया जाए, अन्यथा तीव्र जनआक्रोश का सामना करना पड़ेगा, यह चेतावनी महाराष्ट्र मंदिर महासंघ के राष्ट्रीय संगठक श्री सुनील घनवट ने दी है। इस संबंध में एक ज्ञापन जिलाधिकारी और श्री विठ्ठल रुक्मिणी मंदिर समिति के सह-अध्यक्ष व कार्यकारी अधिकारी को सौंपा गया है।
श्री घनवट ने आगे कहा कि, विठ्ठल मूर्ति का संरक्षण केवल एक भौतिक विषय नहीं है, बल्कि यह करोड़ों भक्तों की आस्था और आध्यात्मिक भावनाओं से जुड़ा हुआ है। इसलिए, संरक्षण के लिए कृत्रिम रसायनों या स्टोन पाउडर में इस्तेमाल होने वाले रासायनिक बाइंडर्स के बजाय, प्राचीन आगम ग्रंथों और हिंदू धर्मशास्त्रों में बताए गए उपायों पर विचार किया जाना चाहिए। देहू के जगद्गुरु तुकाराम महाराज संस्थान और धुले के राम मंदिर में इसी तरह की प्राकृतिक प्रक्रियाओं से मूर्तियों का सफल संरक्षण किए जाने का उदाहरण भी इस ज्ञापन में दिया गया है। इसके साथ ही, मूर्ति के घिसने का बहाना बनाकर सैकड़ों वर्षों की परंपरा वाले श्री विठ्ठल के ‘चरणस्पर्श’ या ‘अभिषेक’ पर किसी भी प्रकार का प्रतिबंध लगाना इसका समाधान नहीं हो सकता, यह दृढ़ रुख भी इस ज्ञापन में व्यक्त किया गया है।
श्री विठ्ठल मूर्ति के संबंध में कोई भी निर्णय बंद कमरे में जल्दबाजी में न लिया जाए। यह निर्णय वारकरी संप्रदाय के संतों-महंतों, शंकराचार्य, मूर्तिशास्त्र के विद्वानों और आध्यात्मिक क्षेत्र के विशेषज्ञों के मार्गदर्शन में ही लिया जाना चाहिए। चूंकि यह विषय महाराष्ट्र की धार्मिक अस्मिता से जुड़ा है, इसलिए प्रशासन को सभी आपत्तियों का निराकरण करने के बाद ही आगे कदम उठाना चाहिए। करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं की अनदेखी कर यदि इस संबंध में कोई एकतरफा निर्णय लिया गया, तो महाराष्ट्र में तीव्र जनआक्रोश पैदा हो सकता है, ऐसी चेतावनी प्रशासन को दी गई है।








