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इफ्तार पार्टी में हिन्दुओं के नाम बदलने का ट्रेंड : धर्मनिरपेक्षता या बौद्धिक धर्मांतरण?

रमजान की इफ्तार पार्टियों के दौरान हाल ही में एक वायरल ट्रेंड ने सोशल मीडिया पर तहलका मचा दिया है। मुस्लिम दोस्तों द्वारा आयोजित इफ्तार पार्टियों में शामिल होने वाले युवा हिंदू लडके और लडकियां खेल-खेल में मुस्लिम उपनाम (सरनेम) अपना रहे हैं। व्यापक रूप से साझा किए गए इंस्टाग्राम रील्स और वीडियो में, हिन्दू अपना परिचय हर्ष खान, जया सुल्तान, अंजलि खातून, प्रिया शेख, श्रद्धा अली और इसी तरह के संयोजनों के रूप में दे रहे हैं। इन क्लिप्स को मनोरंजन के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, जो रमजान महीने के दौरान कथित रूप से “हिंदू-मुस्लिम भाईचारा”, दोस्ती और एकता को बढावा देते हैं। समर्थक इसे प्रगतिशील धर्मनिरपेक्षता और अंतरधार्मिक संबंधों के एक चमकदार उदाहरण के रूप में इसकी प्रशंसा कर रहे हैं।

इससे पहले कि, हम इसे प्रगतिशील धर्मनिरपेक्षता मानकर इसका जश्न मनाने में जल्दबाजी करें, एक मौलिक प्रश्न ईमानदारी से पूछना चाहते है – क्या मुस्लिम भी हिंदू त्योहारों के दौरान इसी तरह अपना नाम बदलने के लिए तैयार हैं? क्या हम वास्तविक रूप से दिवाली मिलन, होली उत्सव या गणेश चतुर्थी में मुस्लिमों के एक समूह की कल्पना कर सकते हैं, जो हंसी-मजाक और सद्भाव के लिए अपना परिचय अफजल चतुर्वेदी, जुबैदा जोशी या अब्दुल शर्मा के रूप में दे रहे हों? यदि आप अपने दिल पर हाथ रखकर विचार करें, तो उत्तर निश्चित रूप से एक जोरदार “नहीं” होगा। दुर्भाग्य से, एकता के लिए यह “नाम बदलना” एकतरफा ही बना हुआ है।

यही कारण है कि, कई लोगों ने इस प्रवृत्ति को “बौद्धिक धर्मांतरण” की ओर पहला कदम या “लव जिहाद” का अग्रदूत तक कहा है।

सच्चे धर्मनिरपेक्षता (secularism) का अर्थ है कि, लोग एक-दूसरे के धार्मिक आचरण में हस्तक्षेप न करें, सभी धर्मों के साथ समान व्यवहार करें, और किसी एक समुदाय से प्रतीकात्मक या जबरन समझौते की अपेक्षा न रखें। यह विचार आपसी सम्मान और स्वतंत्रता पर आधारित है।

हिंदू समाज ने सदियों से इस प्रकार के बहुलवाद (pluralism) को अपनाया है, जहां विभिन्न मान्यता, परंपरा और पूजा-पद्धतियों को अपनाने की अनुमति दी गई है।

उत्पीडित समुदाय जैसे यहूदी, पारसी, सीरियाई ईसाई और तिब्बती इन्होंने इस भूमि पर शरण मिली। उन्होंने यहां अपने धर्म का खुलकर पालन किया और अपने त्योहारों को आनंद के साथ मनाया। ऐसा करते समय किसी भी हिंदू को अपनी सहिष्णुता सिद्ध करने के लिए अपना नाम, पहनावा या धार्मिक परंपराए बदलने की आवश्यकता नहीं पडी।

ईद पर अपने मुस्लिम मित्रों को “ईद मुबारक” कहना या मिठाई बांटना एक अपनापन और पड़ोसी-धर्म का उदाहरण है। किंतु मजाक में भी मुस्लिम उपनाम (surname) अपनाना अनावश्यक आत्म-क्षीणता (self-dilution) की ओर बढना माना जा सकता है। इससे यह संकेत जा सकता है कि, व्यक्ति अपनी ही पहचान में उतना दृढ नहीं है, और यह धारणा बन सकती है कि पहचान के प्रतीक जैसे नाम, परंपरा या सांस्कृतिक संकेत कम महत्व के हैं या आसानी से बदले जा सकते हैं।

इस एकतरफा धर्मनिरपेक्ष प्रदर्शन के पीछे के मुख्य कारण

1. धर्म के प्रति जागरूकता और गर्व का अभाव

कई युवा हिंदू “आधुनिक”, “पश्चिमी” या “प्रगतिशील” दिखने को प्राथमिकता देते हैं। अपनी ही धर्म-परंपरा (धर्म), उसके गहरे दर्शन, समृद्ध इतिहास और संस्कृति की व्यापकता से अनजान रहते हुए, वे बाहरी विचारधाराओं से प्रभावित हो जाते हैं, जो धर्मनिरपेक्षता को अल्पसंख्यकों के प्रति केवल प्रतीकात्मक इशारों से जोड देती हैं। ऐसे कदम कभी-कभी सामाजिक स्वीकृति पाने का आसान तरीका बन जाते हैं, भले ही इससे अपनी सांस्कृतिक आत्म-गरिमा कमज़ोर पड़ जाए।

2. बाहरी नैरेटिव का डर

दशकों से प्रभावशाली रहे कुछ धर्मनिरपेक्ष, वामपंथी और तथाकथित तर्कवादी विचार-विमर्श ने कुछ हिंदुओं की सोच को इस तरह प्रभावित किया है कि, वे इन समूहों से स्वीकृति (approval) पाने का प्रयास करने लगते हैं। स्वयं को लगातार परखे जाने की भावना के कारण वे अपनी उदारता दिखाने के लिए कभी-कभी आ‌वश्यकता से अधिक और दिखावटी पद्धति अपनाते हैं, ताकि उन्हें “सांप्रदायिक” न कहा जाए। इस प्रक्रिया में एक चक्र बन जाता है, जहां सामाजिक स्वीकार्यता, सराहना या नैतिक श्रेष्ठता प्राप्त करने के लिए हिंदू पहचान को लचीला या समझौता करने योग्य मान लिया जाता है।

3. बाहर की बातों का अधिक प्रभाव

अन्य समुदायों में, नेता और प्रभावशाली व्यक्ति अपने विश्वास के प्रति अपमानजनक मानी जाने वाली कृतियों के खिलाफ तुरंत आवाज उठाते हैं। किंतु, हिंदू धार्मिक और राजनीतिक हस्तियां अक्सर मीडिया, तर्कवादी या धर्मनिरपेक्षतावादियों के विरोध के डर से हिचकिचाते हैं। यह चुप्पी लोगों को वही काम बार-बार करने के लिए बढावा देती है, क्योंकि उन्हें कोई रोकता-टोकता नहीं है और वे मान लेते हैं कि यह गलत नहीं, अपितु अच्छा है।

4. सामान्य हिंदुओं में आत्मकेंद्रितता

सामान्य हिंदू लोग अपने करियर, परिवार और रोज़मर्रा की ज़िंदगी में इतने व्यस्त रहते हैं कि वे धर्म और संस्कृति की व्यापक जिम्मेदारी पर ध्यान नहीं दे पाते। परंपराओं की शिक्षा अक्सर केवल घर के रीति-रिवाजों तक सीमित रह जाती है, जिससे नई पीढी ऐसे ट्रेंड्स के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाती है जो उनकी पहचान को हल्का या कमजोर कर सकते हैं।

तात्पर्य तथा आगे की दिशा

यह प्रवृत्ति केवल मजाक या हल्की-फुल्की बात नहीं है; यह धीरे-धीरे एक असमान धर्मनिरपेक्षता को मजबूत करती है, जहां एक समुदाय को अधिक झुकना पडता है। समय के साथ यह विचार सामान्य हो सकता है कि, हिंदू पहचान समाज में स्वीकार्यता पाने के लिए लचीली हो सकती है, जबकि अन्य समुदाय अपनी पहचान में दृढ रहते हैं।

आपसी सम्मान तथा एक-दूसरे के त्योहारों को बिना अपनी पहचान मिटाए मनाने पर सच्चा अंतरधार्मिक (interfaith) मेल-जोल चलता है। यदि यह आपसी नहीं है, तो इसे एकता नहीं, अपितु असमान दबाव कहा जाएगा।

हिंदुओं को अपने बहुलवाद और सहिष्णुता को सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं है। सहस्राब्दियों से सताए गए लोगों को शरण देने का हमारा इतिहास किसी भी वायरल क्लिप से अधिक गूंजता है।

इस एकतरफा प्रवृत्ति का मुकाबला करने के लिए

  • अपने बच्चों और साथियों को हमारे धर्म और संस्कृति की महानता और गहराई के विषय में शिक्षित करें।
  • जब आप अपने आस-पास या ऑनलाइन ऐसे दिखावटी व्यवहार देखें, तो आवाज उठाएं।

  • सबसे महत्वपूर्ण बात, अपनी पहचान पर विश्वास रखें। अपने हिंदू त्योहारों को खुले मन से मनाए और दूसरों को आमंत्रित भी करें किंतु अपनी जडों और परंपराओं के साथ समझौता न करें।

जागो हिंदुओं!

अपने बच्चों को धर्म के विषय में शिक्षित करें।

उन लोगों से स्वीकृति मत खोजें, जो कभी इसे लौटाकर नहीं देंगे।

तुम्हारा नाम किसी “लाइक” या धर्मनिरपेक्षता के अंक के लिए नहीं है।
यह तुम्हारी पहचान है।
यह तुम्हारी विरासत है।
इसे गर्व से अपनाओ, अन्यथा यह धीरे-धीरे कमजोर हो जाएगी।

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