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महाराष्ट्र सरकारद्वारा पंढरपुर के श्री विठ्ठल-रुक्मिणी मंदिर समिति के २८ परिवार देवताओंके मंदिरोंके सरकारीकरण की प्रक्रिया आरंभ !

मंदिरोंका सरकारीकरण अर्थात शासकीय भ्रष्टाचारियोंको मंदिर का धन लूटने के लिए प्राप्त खुला मार्ग !

हिन्दुओ, अबतक मंदिर सरकारीकरण के कारण हुई मंदिरोंकी हुई दुःस्थिति के संदर्भ में जानें तथा भाजपा शासन को इन मंदिरोंको भक्तोंके अधिकार में देने के लिए विवश करें !

पंढरपुर (महाराष्ट्र) : २ मई से यहां के श्री विठ्ठल-रुक्मिणी मंदिर समितिद्वारा शहर के विभिन्न २८ परिवार देवताओंके मंदिर अधिकार में लेने की प्रक्रिया आरंभ हो गई है। मंदिर समिति के कार्यकारी अधिकारी शिवाजी कादबाने के मार्गदर्शन में व्यवस्थापक विलास महाजन तथा अन्य कर्मचारियोंने २८ परिवार देवताओंके मंदिर बलपूर्वक अधिकार में लिए। (मंदिर सरकारीकरण हुए कोल्हापुर के श्री महालक्ष्मी देवस्थान में किया गया करोडों रुपए का भ्रष्टाचार हाल ही में सामने आया है। अतः सरकारीकरण किए गए विठ्ठल-रुक्मिणी मंदिर के साथ अन्य मंदिरों में यदि भ्रष्टाचार नहीं हो, तो ही आश्चर्य की बात होगी ! इस के लिए भक्तोंको प्रयास पूर्वक विरोध करना चाहिए। – संपादक, दैनिक सनातन प्रभात)

उस अवसर पर कादबाने ने बताया, कि गत वर्ष सर्वोच्च न्यायालय ने बडवे, उत्पात, साथ ही सेवाधारियोंके मंदिर के अधिकार के संदर्भ में याचिका अस्वीकृत कर दी थी। अतः मंदिर के बडवे, उत्पात तथा सेवाधारियोंके सर्व अधिकार समाप्त हो गए। तदुपरांत श्री विठ्ठल-रुक्मिणी मंदिर पूरी तरह से शासन के अधिकार में दिया गया तथा वर्तमान में मंदिर का कार्य श्री विठ्ठल-रुक्मिणी मंदिर समिति के अधिकार में है।

शहर के विभिन्न क्षेत्रों में देवताओंके मंदिर हैं, उन मंदिरोंके देवताओंको परिवार देवता के रूप में पहचाना जाता है। इन मंदिरोंको बडवे मंडलियोंकी ओर से अपने अधिकार में लेने की प्रक्रिया आरंभ हुई है। इस परिवार के देवताओंकी पूजाविधि के लिए विशेष पुजारी एवं सेवकोंकी नियुक्ति की गई है।

अधिकार में लिए गए मंदिरोंके नाम इस प्रकार हैं –

पंढरपुर शहर के महाद्वार का श्री खंडोबा मंदिर, श्री शाकंभरीदेवता मंदिर, श्री एकवीरादेवी मंदिर, श्री अंबाबाई मंदिर, श्री व्यासनारायण मंदिर, प्राचीन श्री विष्णुपद मंदिर, रिद्धिसिद्धि श्री गणेश मंदिर, श्री काळा मारुति मंदिर तथा अन्य, इस प्रकार कुल मिलाकर २८ परिवार देवताओंके मंदिर अधिकार में लिए गए हैं।
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स्त्रोत : दैनिक सनातन प्रभात

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