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शिक्षा पद्धति में परिवर्तन करते समय सर्वप्रथम आदर्श शिक्षक निर्माण करना आवश्यक ! – पू. डॉ. चारुदत्त पिंगले

हिन्दू जनजागृति समिति के राष्ट्रीय मार्गदर्शक पू. डॉ. चारुदत्त पिंगले

कर्णावती ( गुजरात) : वर्तमान शिक्षा पद्धति में आमूल परिवर्तन होना आवश्यक है; परंतु उस के साथ ही सर्वप्रथम संस्कारक्षम पीढी का निर्माण करनेवाले आदर्श शिक्षक निर्माण करना भी अत्यंत आवश्यक है। हिन्दू जनजागृति समिति के राष्ट्रीय मार्गदर्शक पू. डॉ. चारुदत्त पिंगले ने ऐसा प्रतिपादन किया। वर्तमान में भारतीय शिक्षा पद्धति में आवश्यक परिवर्तन करने के संदर्भ में केंद्रशासन प्रयास-रत है। इस संदर्भ में रामनगर तथा साबरमती के हेमचंद्राचार्य संस्कृत विद्यालय अर्थात ‘गुरुकुलम्’ में विविध क्षेत्रोंके मान्यवरोंके लिए एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इस कार्यक्रम में पू. डॉ. पिंगले बोल रहे थे।

इस कार्यक्रम का आयोजन २ सत्रों में किया गया था। प्रथम सत्र में शैक्षणिक क्षेत्र के जिन सूत्रों में परिवर्तन करना अपेक्षित है, उस पर आधारित एक चिंतन विषय एवं ‘भारतीय शैक्षणिक नीति में प्रत्येक का कर्तव्य’ यह विषय उपस्थित लोगोंके समक्ष प्रस्तुत किया गया। यह विषय भारतीय शिक्षा मंडलद्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क प्रमुख श्री. अनिरुद्ध देशपांडे, सहसंगठन मंत्री श्री. मुकुलजी कानिटकर एवं शिक्षा संस्कृति समिति के राष्ट्रीय सचिव श्री. अतुलभाई कोठारी ने प्रस्तुत किया। द्वितीय सत्र में कार्यक्रम में उपस्थित संत एवं मान्यवरोंद्वारा उन के शिक्षा क्षेत्र में चल रहा कार्य एवं संकल्पना प्रस्तुत की गई।

पू. डॉ. पिंगले ने अपने मार्गदर्शन में सनातन संस्था एवं हिन्दू जनजागृति समिति की आदर्श शिक्षा पद्धति की संकल्पना, शिक्षा पद्धति का व्यापकत्व एवं शैक्षणिक नीति, एकत्रित कुटंबपद्धति का महत्त्व, भारतभर के सनातन के आश्रमोंके माध्यम से गुरुकुल पद्धति द्वारा निर्माण होनेवाली भावी पीढी, इस शिक्षा का उन पर होनेवाला सकारात्मक परिणाम इत्यादि बातोंकी जानकारी दी तथा आदर्श शिक्षक एवं समाज का निर्माण करने हेतु सनातन संस्था तथा हिन्दू जनजागृति समितिद्वारा चल रहे कार्य के विषय में बताया।

तेलंगाना कि ब्राह्म महाविद्यालय के ब्रह्मानंद ने बताया कि उन के महाविद्यालयद्वारा वेदों का तत्त्वज्ञान, संस्कृत की महत्ता एवं उस का ज्ञान आदि बातोंकी शिक्षा वहां आनेवाले विद्यार्थियोंको दिया जाता है।

स्वामिनी सुलभानंदजी ने गुजरात राज्य के चुनिंदे विद्यालयोंके विद्यार्थियों में नैतिक मूल्योंके संस्कार कैसे बोए जाते हैं एवं इस संदर्भ में उन का भावी नियोजन के विषय में जानकारी दी।

उसीप्रकार इस अवसर पर राजकोट के गोपालन के विषय में जागृति करनेवाले श्री. मनसुखभाई, भौतिकशास्त्र के प्राध्यापक एवं शिक्षा पद्धति में संस्कृत का प्रभाव बढाने हेतु कार्यरत डॉ. पी.डी. लेले, पिछले अनेक वर्षोंसे शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत श्री. मफतलाल पटेल एवं हेमचंद्राचार्य संस्कृत विद्यालय के संचालक श्री. उत्तमभाई शाह ने भी अपने विचार प्रस्तुत किए।

क्षणिकाएं

१. कार्यक्रम के आरंभ में गुरुकुल के विद्यार्थियोंने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की।

२. साबरमती के हेमचंद्राचार्य संस्कृत पाठशाला अर्थात गुरुकुलम् का वातावरण प्राचीन गुरुकुल पद्धति के अनुसार प्रयास किया जा रहा है।

३. इस पाठशाला के सभी वर्ग की दीवारें, भूमि इत्यादि गोमाता के गोबर से लिपी हुई थी तथा ऐसा प्रतीत हुआ कि विद्यार्थी इस वातावरण में शिक्षा का आनंद ले रहे हैं। पाठशाला की वास्तु में ठंड भी प्रतीत हुई।

स्त्रोत : दैनिक सनातन प्रभात

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