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हिन्दी और प्रादेशिक भाषाओं में दो शिक्षा : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

चैत्र कृष्णपक्ष दशमी / एकादशी, कलियुग वर्ष ५११६

आरएसएस की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की वार्षिक बैठक – नागपुर

नागपुर (महाराष्ट्र) : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने केंद्र की बीजेपी सरकार और राज्य सरकारोंसे कहा है कि बच्चोंको उनकी मातृभाषा में या संवैधानिक तौर पर मान्यता प्राप्त राज्य की भाषाओं में शिक्षा प्रदान की जानी चाहिए। आरएसएस ने कहा कि विदेशी भाषा में शिक्षित लोग अपनी संस्कृति और परंपराओंसे कट जाते हैं। संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा ने रविवार को इस संबंध में प्रस्ताव पारित किया।

प्रस्ताव के अनुसार, ‘विदेशी भाषाओं में शिक्षित छात्र अपने परिवेश, परंपराओं, संस्कृति और जीवन मूल्योंसे कट जाता है और कई बार तो वह अपने प्राचीन ज्ञान, विज्ञान और साहित्य से बेखबर होकर अपनी पहचान भी खो देता है।’ प्रस्ताव के मुताबिक महात्मा गांधी, मदन मोहन मालवीय, रवींद्रनाथ टैगोर, बी. आर. आंबेडकर और एस. राधाकृष्णन जैसे प्रतिष्ठित विचारकों और सी. वी. रमन, पी. सी. रे, जे सी बोस जैसे वैज्ञानिकोंने कहा था कि मातृभाषा में शिक्षा देना वैज्ञानिक और स्वाभाविक दोनों है। प्रतिनिधि सभा ने कहा कि राधाकृष्णन आयोग और कोठारी आयोग जैसे कुछ आयोगोंने भी इस तरह की सिफारिशें की थीं।

प्रस्ताव के अनुसार, ‘अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा केंद्र और राज्य सरकारों से मांग करती है कि अपनी मौजूदा भाषा नीतियोंकी समीक्षा करें और मातृभाषा में या संवैधानिक तौर पर मान्यता प्राप्त राज्य की भाषाओं में शिक्षा प्रदान करने की प्रभावी व्यवस्था सुनिश्चित करें। इसके साथ ही शिक्षा, प्रशासन और न्याय प्रणाली में भारतीय भाषाओंके इस्तेमाल की दिशा में पहल करें।’

प्रस्ताव में कहा गया है कि संघ विदेशी भाषाओं समेत अनेक भाषाओंकी स्टडी का पूरी तरह से पक्षधर है लेकिन उसकी सोची समझी राय है कि स्वाभाविक ट्रेनिंग के लिए और सांस्कृतिक सोच को बढ़ावा देने के लिए शिक्षा खासतौर पर प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में या प्रदेश की भाषाओं में होनी चाहिए। नरेंद्र मोदी सरकार बनने के बाद से ही संघ शिक्षा नीति को लेकर लगातार सरकार के साथ इस प्रक्रिया में लगा हुआ है। विपक्ष ने इसे शिक्षा के भगवाकरण कहकर इसकी निंदा की है।

स्त्रोत : नवभारत टाइम्स

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