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कहां हिन्दुओंकी शून्य फलनिष्पत्ति देनेवाली कार्यपद्धति, तो कहां धर्मांधोंकी परिणामकारक कार्यपद्धति ! – प. पू. डॉ. आठवले

फाल्गुन शुक्ल पक्ष पंचमी, कलियुग वर्ष ५११६

परात्पर गुरु डॉ. आठवले

‘कर्नाटक राज्य के मैसूर नगर में रानी बहादुर प्रेक्षागृह में विविध शासकीय कर्मचारी संगठनोंद्वारा १५ फरवरी २०१५ को एक कार्यशाला का आयोजन किया गया था। इस कार्यशाला में प्रा. के.एस. भगवान नामक व्यक्ति ने, ‘मैं भगवद्गीता जला दूंगा’, हिन्दुओंको उद्विग्न करनेवाला ऐसा वक्तव्य दिया। उन्होंने कहा कि यदि सभा के अध्यक्ष ने अनुमति नहीं दी, तो अभी उस को जला दूंगा। यदि अनुमति नहीं दी गई, तो मैं मन में ही गीता को जला दूंगा तथा भविष्य में प्रत्यक्ष रूप से जला दूंगा।

उपर्युक्त समाचार आने पर हिन्दुओंद्वारा सदा की भांति पुलिस को निवेदन देना, पत्रकार परिषद आयोजित करना, निषेध मोर्चा निकालना इत्यादि फलनिष्पत्तिशून्य पद्धतियोंका उपयोग किया गया। फलनिष्पत्ति शून्य होने का एकमात्र कारण है, शासन एवं पुलिस प्रशासन, सभी राजनीतिक पक्षोंका संवेदनाशून्य होना।

इसके विपरीत यदि कुराण के संदर्भ में ऐसी कुछ घटनाएं होतीं, तो उन्हें उपर्युक्त पद्धतियोंको प्रयुक्त किए बिना ऐसी पद्धतियोंका उपयोग किया होता कि सभी राजनीतिक पक्ष, शासन एवं पुलिस प्रशासन को हडबडाकर जागृत होकर तत्परता से कृत्य करना ही पडता।

 – (परात्पर गुरु) डॉ. आठवले (२१.२.२०१५)

स्त्रोत : दैनिक सनातन प्रभात

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