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यदि साधु-संतोंने शिक्षणक्षेत्र का कार्य आगे बढाने का नेतृत्व किया, तो निश्चित ही देश को पुर्नवैभव प्राप्त होगा ! – डॉ. कुसुमलता केडिया

फाल्गुन कृष्ण पक्ष सप्तमी, कलियुग वर्ष ५११६

भोपाल में ‘राष्ट्रीय शिक्षानीति की नवरचना,’ इस विषय पर विचारविमर्श !

दार्इं ओर से सर्वश्री रामेश्वर मिश्र, त्रिभुवननाथ शुक्ल, डॉ. देवेन्द्र दीपक, पू. डॉ. चारुदत्त पिंगळे तथा श्री. मोहनलाल छीया

भोपाल (मध्यप्रदेश) : धर्मपाल शोधपीठ, भोपाल तथा गांधी विद्या संस्थान, काशी की संयुक्त विद्यमानता से ‘राष्ट्रीय शिक्षा की नवरचना,’ इस विषय पर स्वराज भवन, पॉलिटेक्निक चौक, भोपाल में आयोजित विचारविमर्श के अनावरण सत्र के समय गांधी विद्या संस्थान की संचालिका डॉ. कुसुमलता केडिया ने ऐसा वक्तव्य दिया था। उस समय उन्होंने अपने वक्तव्य में यह प्रतिपादित किया कि ‘शिक्षण क्षेत्र में सुधार लाने हेतु साधु- संतों को सक्रिय होकर नेतृत्व करना चाहिए। वर्तमान में जो शिक्षण क्षेत्र का नेतृत्व कर रहे हैं, वे उच्चाधिकारी ही इस क्षेत्र में अज्ञानी होते हैं। साथ ही नेताओंको राजनीति के कारण समय का भी अभाव रहता है, जिससे नीति-नियम निश्चित करने का कार्य साधु-संतों पर आ गया है। अतः वे मार्गदर्शन कर देश को पुनवैभव प्रदान करें।’

डॉ. कुसुमलता केडिया

इस कार्यक्रम के लिए पूरे देश से शिक्षणतज्ञ, शिक्षणक्षेत्र में कार्य करनेवाले मान्यवरोंके साथ अध्यात्मक्षेत्र में कार्य करनेवालोंको भी आमंत्रित किया गया था।

इस कार्यक्रम के लिए अध्यक्ष के रूप में हिन्दू जनजागृति समिति के राष्ट्रीय मार्गदर्शक पू. डॉ. चारुदत्त पिंगळे की वंदनीय उपस्थिति प्राप्त हुई। साथ ही पावन चिंतन धारा के संस्थापक एवं राजनीतिशास्त्र ज्योतिषी श्री. पवन सिन्हा, अटलबिहारी वाजपेयी हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलगुरु श्री. मोहनलाल छीया, हरिद्वार के पतंजली योगपीठ के श्री. ललित मिश्र, वरिष्ठ शिक्षाविद डॉ. देवेन्द्र दीपक, काशी के ज्योतिष शास्त्र के अभ्यासी शालिनी कृष्णन्, मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी के त्रिभुवननाथ शुक्ल तथा डॉ. विजय शर्मा इत्यादि मान्यवर उपस्थित थे।

वर्तमान में शिक्षणक्षेत्र ही व्यावसायिक क्षेत्र बन गया है ! – पू. डॉ. चारुदत्त पिंगळे

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पू. डॉ. चारुदत्त पिंगळे

शिक्षणक्षेत्र की वर्तमान पद्धति के कारण छात्रोंकी अधोगति हो रही है। परिणामस्वरूप देश की भी अपरिमित हानि हो रही है। शिक्षण में पूरी तरह से परिवर्तन लाने की आवश्यकता है। केवल वर्तमान की शिक्षणपद्धति के कारण पढे-लिखे मूर्ख सिद्ध हो रहे हैं। शिक्षण को रोजगार के साथ जोडने का प्रयास करने के कारण उसका परिणाम यह हुआ है कि वर्तमान में शिक्षणक्षेत्र ही व्यावसायिक क्षेत्र बन गया है; किंतु वास्तव में शिक्षण जीविका (रोजगार) का साधन होने की अपेक्षा उसका परिवर्तन ‘दंड में’ अर्थात बेरोजगारी में हुआ है। ‘जिस शिक्षण के कारण व्यक्ति की विश्लेषणात्मक (उचित-अनुचित, धर्म-अधर्म का भेद ज्ञात होनेवालोंकी) बुद्धि का विकास होता है, वास्तव में वही शिक्षण है।’ शिक्षण की यही परिभाषा दे सकते हैं/ऐसे ही परिभाषित कर सकते हैं।

स्त्रोत : दैनिक सनातन प्रभात

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