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नदियों का प्रदूषण रोकने में प्रशासन विफल – सुराज्य अभियान

  • सर्वोच्च न्यायालय और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के निर्देशों की घोर अनदेखी !

  • उजनी-भीमा नदी प्रदूषण रोकने के लिए ‘सुराज्य अभियान’ का संघर्ष !

बाएं से अधिवक्ता चंद्रशेखर वारद, श्री दत्तात्रय पिसे और श्री राजन बुणगे

सोलापुर – उजनी जलाशय और भीमा नदी का बढ़ता प्रदूषण अब लाखों नागरिकों के स्वास्थ्य, पेयजल, कृषि और पर्यावरण से जुड़ा अत्यंत गंभीर विषय बन गया है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB), विभिन्न अनुसंधान संस्थानों और विशेषज्ञों ने इस विषय पर गंभीर रिपोर्टें प्रस्तुत की हैं, फिर भी महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण मंडल तथा संबंधित शासकीय विभागों द्वारा अपेक्षित ठोस कार्रवाई नहीं की जा रही है। यह आरोप ‘सुराज्य अभियान’ के श्री दत्तात्रय पिसे ने ‘उजनी-भीमा नदी प्रदूषण’ विषय पर आयोजित पत्रकार परिषद में लगाया। इस अवसर पर अधिवक्ता चंद्रशेखर वारद तथा हिंदू जनजागृति समिति के श्री राजन बुणगे उपस्थित थे।

पत्रकार परिषद में यह प्रश्न भी उठाया गया कि “पंढरपुर की चंद्रभागा नदी में दिखाई देने वाले झागयुक्त और प्रदूषित पानी के कारण क्या निर्दोष वारकरियों के जीवन से खिलवाड़ किया जाएगा?”

बिना उपचार के औद्योगिक रासायनिक अपशिष्ट से नदियाँ बन रही हैं ‘बहता हुआ ज़हर’ !

श्री पिसे ने कहा कि उजनी जलाशय सोलापुर सहित आसपास के लाखों लोगों के पेयजल का प्रमुख स्रोत है, जबकि भीमा नदी इस क्षेत्र की जीवनरेखा मानी जाती है। किंतु बिना शोधन छोड़ा जा रहा घरेलू सीवेज, औद्योगिक रासायनिक अपशिष्ट तथा अन्य प्रदूषणकारी तत्वों के कारण यह जलस्रोत धीरे-धीरे ‘बहता हुआ ज़हर’ बनता जा रहा है।

इसका प्रभाव केवल जल तक सीमित नहीं है, बल्कि नागरिकों के स्वास्थ्य, कृषि, भूमि की उर्वरता, पशुधन और जैव विविधता पर भी गंभीर रूप से पड़ रहा है।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की वर्ष 2025 की रिपोर्ट के अनुसार महाराष्ट्र में 54 प्रदूषित नदी खंड दर्ज किए गए हैं, जो देश में सर्वाधिक हैं। भीमा, मूला, मुठा, इंद्रायणी, पवना और चंद्रभागा नदियों को ‘गंभीर प्रदूषण श्रेणी’ में रखा गया है।

साथ ही, बिना उपचार किए किसी भी प्रकार का अपशिष्ट जल जलाशयों में न छोड़ने संबंधी सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का खुलेआम उल्लंघन किया जा रहा है।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के निर्देशों को भी ठंडे बस्ते में डाला गया !

‘सुराज्य अभियान’ ने इस विषय से संबंधित लगभग 2,000 पृष्ठों के दस्तावेजों का अध्ययन कर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में याचिका दायर की है।

आयोग ने महाराष्ट्र के स्वास्थ्य विभाग तथा महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण मंडल को इस मामले में की गई कार्रवाई की विस्तृत रिपोर्ट (ATR) प्रस्तुत करने के निर्देश दिए थे। इसके लिए आयोग ने लगातार तीन बार स्मरण-पत्र भी भेजे; किंतु आज तक संबंधित विभागों ने कोई रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की। इसे प्रशासन की गंभीर निष्क्रियता बताया गया।

सुराज्य अभियान की प्रमुख मांगें

  • केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड तथा अन्य अधिकृत रिपोर्टों में सुझाए गए सभी प्रदूषण नियंत्रण उपायों को तत्काल लागू किया जाए।
  • महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण मंडल BOD, COD, Heavy Metals तथा अन्य महत्वपूर्ण मानकों का मूल (Raw) डेटा 30 दिनों के भीतर सार्वजनिक करे।
  • पुणे से सोलापुर तक का समस्त घरेलू एवं औद्योगिक अपशिष्ट जल पूर्ण उपचार के बाद ही नदी में छोड़ा जाए।
    सभी सीवेज उपचार संयंत्रों पर OCEMS (Online Continuous Effluent Monitoring System) स्थापित कर उसका डेटा नागरिकों के लिए सार्वजनिक किया जाए।
  • केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड तथा स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति द्वारा महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण मंडल की सैंपलिंग प्रक्रिया का स्वतंत्र ऑडिट कराया जाए तथा प्रदूषण फैलाने वालों पर ‘Polluter Pays Principle’ के अनुसार कार्रवाई की जाए।
    उजनी क्षेत्र के प्रभावित गाँवों में नागरिकों की विशेष रक्त जांच कर शरीर में Heavy Metals की मात्रा का परीक्षण कराया जाए।
  • NEERI अथवा IIT जैसी स्वतंत्र राष्ट्रीय संस्थाओं से नदी के गाद (Sludge) का Toxicity Audit कराया जाए।
  • प्रदूषण नियंत्रण में लापरवाही के लिए जिम्मेदारी तय कर संबंधित अधिकारियों एवं विभागों के विरुद्ध आवश्यक कानूनी कार्रवाई की जाए।
  • सुराज्य अभियान ने चेतावनी दी है कि यदि इन मांगों पर शीघ्र ठोस कार्रवाई नहीं की गई, तो व्यापक जनआंदोलन खड़ा किया जाएगा और जिम्मेदार सरकारी विभागों के विरुद्ध कानूनी संघर्ष को और अधिक तीव्र किया जाएगा।

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