मंदिर महासंघ और वारकरी संगठनों की याचिका पर ऐतिहासिक फैसला

पंढरपुर: करोड़ों श्रद्धालुओं के आराध्य देव पंढरपुर की श्री विठ्ठल-रुक्मिणी मूर्ति पर प्रस्तावित रासायनिक वज्रलेप पर पंढरपुर के दीवानी न्यायालय (कनिष्ठ स्तर) ने तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। श्री विठ्ठल रुक्मिणी मंदिर समिति और पुरातत्व विभाग की ओर से 23 और 24 जून को यह लेपन प्रक्रिया की जाने वाली थी। इस निर्णय को चुनौती देते हुए वारकरी संप्रदाय, श्री. बालकृष्ण डिंगरे और महाराष्ट्र मंदिर महासंघ के श्री. पुरुषोत्तम (गणेश) लंके ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। इस मुकदमे पर सुनवाई करते हुए न्यायाधीश श्रीमती सोनाली राऊल ने प्रशासन को सख्त हिदायत देते हुए अगले आदेश तक किसी भी प्रकार के लेपन पर पाबंदी लगा दी है।
इस सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता सुधीर रानडे ने मूर्ति की पवित्रता और संरक्षण में मौजूद तकनीकी खामियों को लेकर न्यायालय में विस्तृत और प्रभावशाली दलीलें पेश कीं। हिंदू धर्मशास्त्र के अनुसार, यह स्पष्ट किया गया कि मूर्ति केवल एक पाषाण शिल्प नहीं है, बल्कि उसमें साक्षात देवत्व (प्राण) होता है और वह सजीव मानी जाती है; इसलिए उस पर की जाने वाली कोई भी संरक्षण प्रक्रिया धर्मशास्त्र और पारंपरिक पद्धति के अनुसार ही होनी चाहिए। मंदिर समिति और पुरातत्व विभाग द्वारा ‘इपॉक्सी’ और अन्य कृत्रिम रासायनिक पदार्थों का उपयोग करके मूर्ति की दरारें भरने की संभावना थी। विशेष रूप से यह ध्यान में लाया गया कि इससे पहले चार बार किया गया रासायनिक लेपन विफल साबित होने के बावजूद प्रशासन उसी प्रक्रिया पर अड़ा हुआ है। कृत्रिम रसायनों के कारण पाषाण का प्राकृतिक श्वसन रुक जाता है, जिससे मूर्ति के अंदर से खोखली और नाजुक होने का गंभीर खतरा है।
🚩 विजय!
⚖️ पंढरपूर येथील श्री विठ्ठल-रुक्मिणी मूर्तीवर करण्यात येणाऱ्या रासायनिक लेपनास न्यायालयाची तात्काळ स्थगिती!🛕वारकरी संघटना व @mandirmahasangh च्या याचिकेला मोठे यश!
मूर्तीचे पावित्र्य, परंपरा आणि धर्मशास्त्रीय तत्त्वे जपण्यासाठी घेतलेल्या भूमिकेला न्यायालयाची मान्यता pic.twitter.com/mQIZjUpL0c
— Mandir Mahasangh (@mandirmahasangh) June 22, 2026
इस कानूनी लड़ाई में उज्जैन के ‘महाकालेश्वर मंदिर’ मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्देशों का महत्वपूर्ण संदर्भ दिया गया। सर्वोच्च न्यायालय पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि प्रशासन को ऐसा कोई निर्णय लेने का अधिकार नहीं है जिससे भक्तों की धार्मिक भावनाएं आहत हों और परंपराओं का उल्लंघन हो। इसके साथ ही, करवीर पीठ के जगद्गुरु शंकराचार्य द्वारा इस रासायनिक लेपन के स्पष्ट विरोध और तत्संबंधी आधिकारिक पत्र को न्यायालय में प्रस्तुत किया गया। न्यायालय ने इन सभी बातों का अत्यंत गंभीरता से संज्ञान लेते हुए लेपन पर रोक लगा दी।
Jai Shri Vitthal! Jai Shri Rukmini! धर्मजय!
The Ld.Joint Civil Judge, Pandharpur has passed a Temporary Injunction staying the proposed chemical (epoxy) coating on the sacred Swayambhu Shri Vitthal-Rukmini idols, which was scheduled to be undertaken on 23rd and 24th June 2026.… pic.twitter.com/2abcv8769J
— Amita Sachdeva, Advocate (@SachdevaAmita) June 23, 2026
इस निर्णय का स्वागत करते हुए महाराष्ट्र मंदिर महासंघ के राष्ट्रीय संगठक श्री. सुनील घनवट ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि लगभग अट्ठाईस युगों से ईंट पर सुरक्षित खड़े पांडुरंग की मूर्ति के पैरों में कोरोना लॉकडाउन के दौरान गड्ढा कैसे पड़ गया और रुक्मिणी माता के पैर कैसे खराब हो गए, इसका कोई भी वैज्ञानिक और संतोषजनक उत्तर मंदिर समिति अब तक नहीं दे पाई है। जिलाधिकारी की उपस्थिति में हुई बैठक में केवल राय दर्ज की गई, लेकिन वास्तविक संरक्षण प्रक्रिया में किन रसायनों का उपयोग किया जाएगा, इस पर प्रशासन ने अत्यधिक गोपनीयता बरती। अचानक प्रेस विज्ञप्ति निकालकर मंदिर बंद रखने का निर्णय घोषित करने से भक्तों में भारी भ्रम पैदा हो गया था। श्री. घनवट ने स्पष्ट किया कि रासायनिक लेपन के बजाय ‘आयुर्वेदिक वज्रलेप’ मूर्ति संरक्षण के लिए अधिक सुरक्षित और परंपरा के अनुरूप है। उन्होंने अपेक्षा व्यक्त की है कि भविष्य में मंदिर समिति कोई भी एकतरफा निर्णय न लेते हुए वारकरी संप्रदाय, धर्माचार्यों और हिंदुत्वनिष्ठ संगठनों की भावनाओं का सम्मान करते हुए ही कदम उठाएगी।
पंढरपुर : विठ्ठल मूर्ति को नुकसान हुआ, तो दर्ज कराएंगे आपराधिक मामला – मंदिर महासंघ और वारकरी संगठन की कडी चेतावनी
मूर्ती पर जबरन रासायनिक लेपन करने का प्रकरण
मंदिर समिति और पुरातत्व विभाग को चेतावनी

पंढरपुर : पंढरपुर स्थित करोड़ों हिंदुओं के आराध्य देव ‘स्वयंभू’ श्री विठ्ठल-रुक्मिणी की मूर्ति पर पुरातत्व विभाग द्वारा 23-24 जून को प्रस्तावित रासायनिक वज्रलेपन प्रक्रिया (Epoxy/Silicon) का वारकरी संप्रदाय और महाराष्ट्र मंदिर महासंघ ने कड़ा विरोध किया है। प्रशासन ने दावा किया था कि कोरोना काल के दौरान किया गया लेपन अगले 10 वर्षों तक चलेगा; लेकिन महज 4-5 सालों में ही मूर्ति को दोबारा लेपन की आवश्यकता पड़ना, इस रासायनिक प्रक्रिया की विफलता को साबित करता है। युगों-युगों से ईंट पर सुरक्षित खड़े पांडुरंग की मूर्ति के पैरों में कोरोना लॉकडाउन के दौरान गड्ढा कैसे हो गया और श्री रुक्मिणी माता के पैर क्यों खराब हुए, इसका कोई भी वैज्ञानिक उत्तर अभी तक मंदिर समिति या पुरातत्व विभाग नहीं दे पाया है।

कृत्रिम रसायनों के कारण पाषाण (पत्थर) का प्राकृतिक श्वसन रुक जाता है और मूर्ति के अंदर से खोखली व नाजुक होने का गंभीर खतरा रहता है। ऐसे में वारकरी संतों-महंतों और मूर्ति विशेषज्ञों को विश्वास में लिए बिना यदि प्रशासन ने एकतरफा कदम उठाया, तो पूरे महाराष्ट्र में जन-आक्रोश भड़क उठेगा। इसके उपरांत यदि रासायनिक लेपन थोपने का प्रयास किया गया, तो हम श्री विठ्ठल-रुक्मिणी मंदिर समिति और पुरातत्व विभाग के विरुद्ध अदालत में याचिका दायर करेंगे। यह चेतावनी महासंघ के राष्ट्रीय संगठक श्री. सुनील घनवट ने एक पत्रकार वार्ता में दी। इस संबंध में मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, जिलाधिकारी और मंदिर समिति को ज्ञापन सौंपा गया है।
पंढरपूर येथील श्री विठ्ठलाच्या मूर्तीला हानी पोहोचल्यास मंदिरे समिती व पुरातत्त्व विभागावर फौजदारी खटला दाखल करू !
🎙️ – श्री. @SG_HJS , महाराष्ट्र महासंघाचे राष्ट्रीय संघटक#Vitthal #Pandharpur #Varkari #VitthalMauli #TempleProtection pic.twitter.com/uhD3VQBF1f
— Mandir Mahasangh (@mandirmahasangh) June 17, 2026
इस अवसर पर वारकरी पाइक संघ के ह.भ.प. रामकृष्ण हनुमंत महाराज वीर, प्रज्ञापुरी ज्ञानपीठ अक्कलकोट के पीठासीन धर्माधिकारी श्री. प्रसाद पंडित, हिंदू राष्ट्र समन्वय समिति के जिला संयोजक श्री. चंद्रकांत रमणशेट्टी, महाराष्ट्र मंदिर महासंघ के श्री. विनोद रसाल और हिंदू जनजागृति समिति के श्री. राजन बुणगे उपस्थित थे।
10 साल पहले कोल्हापुर की श्री महालक्ष्मी देवी के लिए जैविक लेपन, तो पंढरपुर में रासायनिक लेपन की जिद क्यों?
10 वर्ष पहले जब कोल्हापुर की श्री महालक्ष्मी देवी की मूर्ति पर केंद्रीय पुरातत्व विभाग के अधिकारी एम.आर. सिंह ने 22 जुलाई से 6 अगस्त 2015 के दौरान वज्रलेप किया था, तब मूर्ति के मूल पत्थर के पाउडर का एक निश्चित अनुपात में मिश्रण मूर्ति में डाला गया था। उस प्रक्रिया में बहेड़ा, दूर्वा का अर्क और भिलावे (बिब्बा) के तेल जैसे जैविक मिश्रण का उपयोग किया गया था। यदि तब श्री महालक्ष्मी देवी के लिए जैविक (Organic) लेपन प्रक्रिया अपनाई गई थी, तो अब पंढरपुर के श्री विठ्ठल के लिए रासायनिक लेपन की जिद क्यों की जा रही है? यदि तत्कालीन कार्रवाई सही थी, तो वर्तमान कार्रवाई को गलत ही कहना होगा। बेहद कम खर्च में होने वाले जैविक लेपन के बजाय खर्चीले और अवैज्ञानिक रासायनिक लेपन पर अड़े रहकर पुरातत्व विभाग के अधिकारी विलास वहाने क्या हासिल करना चाहते हैं? कहीं यह अधिक फंड खर्च करने की कोई साजिश तो नहीं है? ऐसा संदेह करने की पूरी गुंजाइश है!
मूर्ति पर रासायनिक लेपन करना गलत! – श्री स्वामी जगद्गुरु शंकराचार्य पीठ, करवीर
इस संदर्भ में करवीर पीठ के श्री स्वामी जगद्गुरु शंकराचार्य ने अपनी राय व्यक्त करते हुए कहा, “‘यथा देहे तथा देवे’ (जैसा शरीर वैसा ही देवता) के सिद्धांत के अनुसार, जिस तरह कोई भी रसायन हमारे शरीर को जलाता या नुकसान पहुंचाता है, उसी तरह रासायनिक वज्रलेप से मूर्ति को भी नुकसान पहुंचता है। इसलिए हमारा स्पष्ट मत है कि रासायनिक वज्रलेप नहीं किया जाना चाहिए।” इस अवसर पर यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या पुरातत्व विभाग के अधिकारियों को शंकराचार्य जैसे आध्यात्मिक रूप से अधिकार संपन्न व्यक्ति से अधिक ज्ञान है?
वारकरी पाइक संघ के ह.भ.प. रामकृष्ण हनुमंत महाराज वीर ने कहा , “पिछले कुछ वर्षों में मूर्ति पर 4 से 5 बार रासायनिक प्रयोग किए जा चुके हैं, जिसके परिणामस्वरूप मूर्ति को स्पष्ट रूप से नुकसान पहुंच रहा है। कोल्हापुर की श्री महालक्ष्मी देवी की मूर्ति पर की गई रासायनिक प्रक्रिया के कारण मूर्ति को भारी नुकसान हुआ था, यह इतिहास हमारे सामने है, फिर भी पंढरपुर में वही गलती दोहराई जा रही है। किसी भी वैज्ञानिक प्रक्रिया से पहले इसकी दीवानी और आपराधिक जवाबदेही (Legal Liability) तय होना आवश्यक है। यदि इस प्रक्रिया में विठ्ठल या रुक्मिणी माता की मूर्ति को कोई भी क्षति पहुंचती है, तो धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने और राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोप में संबंधित अधिकारियों और मंदिर समिति के विरुद्ध सीधे आपराधिक मामला दर्ज कराने के लिए वारकरी और हिंदू संगठन अदालत का रुख करेंगे।”
यवतमाळ में विविध स्थानों पर ज्ञापन प्रस्तुति

ज्ञापन सौंपते समय महाराष्ट्र मंदिर महासंघ के विधिक सलाहकार अधिवक्ता राजेंद्र गटलेवार, ‘हिंदुस्तानी देवी मंदिर’ (आठवडी बाजार) के श्री आनंद त्रिवेदी, रेणुका माता मंदिर के श्री महादेवराव काचोरे, नृसिंह सरस्वती दत्तात्रय संस्थान के श्री चंद्रकांत पानपट्टीवार तथा महाराष्ट्र मंदिर महासंघ के श्री दत्तात्रय फोकमारे आदि मान्यवर उपस्थित थे।
बाभूलगांव (जिला यवतमाल) में भी महासंघ की ओर से तहसीलदार सौ. मीरा पागोरे को यह ज्ञापन सौंपा गया। इस अवसर पर महाराष्ट्र मंदिर महासंघ के सदस्य सर्जेराव वाईकर, यादवरावजी खेरडे, श्रीकृष्ण उरकुडे, पंकजराव देशमुख, प्रदीप शिंदे तथा महासंघ के बाभूलगांव तालुका संयोजक मोतीराम उरकुडे उपस्थित थे।








