
सहारनपुर (उत्तर प्रदेश) — यहां ‘सनातन संस्कार सेवा संघ’ की ओर से आयोजित ‘विराट हिंदू सम्मेलन’ में धर्मप्रेमी नागरिकों ने सनातन संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन का संकल्प लिया। गत वर्ष दिल्ली में सनातन संस्था द्वारा आयोजित ‘सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सव’ से प्रेरणा लेकर संघ ने शारदानगर क्षेत्र स्थित ‘बजाज इंटरनेशनल स्कूल’ में इस सम्मेलन का आयोजन किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता श्री संजय सैनी ने की। सम्मेलन में पूज्य स्वामी राघवेंद्र तथा हिन्दू जनजागृति समिति के राष्ट्रीय मार्गदर्शक सद्गुरु डॉ. चारुदत्त पिंगळे की विशेष उपस्थिति रही।

‘सनातन संस्कार सेवा संघ’ के अध्यक्ष श्री मुकेश तलवार, महासचिव श्री सनोज रोहिला तथा सभी कार्यकारी सदस्यों ने कार्यक्रम को सफल बनाने में सक्रिय सहभाग किया। श्री रविन्द्रनाथ शर्मा, श्री शरद माहेश्वरी और सरदार सत्यपाल का भी विशेष योगदान रहा।
Sadguru @hjsdrpingale, National Guide of @HinduJagrutiOrg addressed a ‘Virat Hind Sammelan’ at Saharanpur.
From the ancient Kuru kingdom to the sacred Shivaliks of Maa Shakumbhari Devi, Saharanpur stands as a testament to #Hindu resilience through the ages 🚩#HinduDharma pic.twitter.com/N1z4yZxQnm
— HJS_Delhi-NCR (@HJS_Delhi) February 23, 2026
झलकियां
कार्यक्रम में सहारनपुर के विधायक राजीव गुंबर तथा प्रसिद्ध समाजसेविका सुषमा बजाज की उपस्थिति उल्लेखनीय रही।
सम्मेलन के माध्यम से समाज को धर्म, संस्कृति और राष्ट्रीय चेतना के पुनर्जागरण का सशक्त संदेश दिया गया।
स्वरक्षा के साथ धर्मरक्षा भी आवश्यक – पू. स्वामी राघवेंद्र
आज के समय में युवाओं को केवल संगीत और नृत्य तक सीमित न रहकर स्वसंरक्षण की आसान पद्धतियां भी सीखनी चाहिए। स्वामीजी ने मंच से लाठी प्रहार का प्रात्यक्षिक प्रस्तुत कर यह सिद्ध किया कि दृढ़ निश्चय और अभ्यास से आयु बाधा नहीं बनती। उन्होंने कहा कि स्वरक्षा के साथ अपने धर्म की रक्षा करना भी आवश्यक है।

धर्म और संस्कृति का पालन किए बिना सामाजिक परिवर्तन असंभव — सद्गुरु डॉ. चारुदत्त पिंगळे

हिंदू धर्म केवल जन्म से नहीं, बल्कि आचार, विचार और मूल्यों से विकसित होता है। पारंपरिक तिथियों, विधियों और भारतीय संस्कृति के अनुरूप जीवनशैली अपनाने का महत्त्व बताया गया। धर्म, चार पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष), चार आश्रम, 16 संस्कार तथा कर्मफल सिद्धांत का ज्ञान आवश्यक है।
आज समाज में आत्मबोध, धर्मबोध और सांस्कृतिक जागरूकता अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। भारतीय नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से आरंभ होता है — इसे स्वीकार कर अपने कुल, परंपरा, गोत्र और सांस्कृतिक पहचान को समझते हुए साधना करना आवश्यक है। जब तक व्यक्ति अपने मूल से जुड़कर धर्म और संस्कृति का पालन नहीं करेगा, तब तक व्यापक सामाजिक परिवर्तन संभव नहीं है।








