भारतीय शस्त्र परंपरा तथा पारंपरिक शस्त्रों का देहली में भव्य संग्रहालय बनाएंगे ! – श्री. कपिल मिश्रा जी, संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री, देहली

नई देहली – नई देहली में सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सव के उपलक्ष्य में १३ दिसंबर को भारत मंडपम् में लगाई गई ऐतिहासिक शिवकालीन शस्त्रों की प्रदर्शनी का उद्घाटन दिल्ली के संस्कृति एवं पर्यटनमंत्री श्री. कपिल मिश्रा जी के हस्तों दीपप्रज्वलन कर हुआ ।
इस अवसर पर ‘सुदर्शन’ समाचार चैनल के संस्थापक तथा मुख्य संपादक डॉ. सुरेश चव्हाणके जी, ‘सेव कल्चर सेव भारत फाऊंडेशन’ संस्था के प्रमुख श्री. उदय माहुरकर जी, विश्व का प्रथम ओटीटी चैनल ‘प्राच्यम्’ के संस्थापक तथा प्रमुख कैप्टन प्रवीण चतुर्वेदी जी, प्रसिद्ध लेखिका श्रीमती शेफाली वैद्य जी, सनातन संस्था के संस्थापक सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवले जी की आध्यात्मिक उत्तराधिकारिणियां श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळ जी एवं श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळ जी उपस्थित थीं ।


इन शस्त्रों के संग्राहक श्री. राकेश धावडे जी ने श्री. कपिल मिश्रा जी से अनुरोध करते हुए कहा, ‘‘देश में कहीं भी इन शिवकालीन शस्त्रों का संग्रहालय नहीं है, तो क्या आप ऐसा संग्रहालय बनाएंगे ?’ उस पर श्री. कपिल मिश्रा जी ने देहली के मध्यभाग में भारतीय शस्त्र परंपरा एवं पारंपरिक शस्त्रों का भव्य संग्रहालय बनाने का आश्वासन दिया ।
नई देहली में फ्लैक्स के माध्यम से इस शिवकालीन शस्त्रप्रदर्शनी का प्रचार किया गया था, उसके कारण दिल्लीवासियों में इस प्रदर्शनी के प्रति उत्सुकता है । इस प्रदर्शनी में केंद्र सरकार की ओर से राष्ट्रीय गीत ‘वन्दे मातरम्’ को १५० वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में भी प्रदर्शनी लगाई गई है ।
इस दुर्लभ शिवकालीन शस्त्र प्रदर्शनी के संग्राहक श्री. राकेश धावडे जी ने प्रसारमाध्यमों के प्रतिनिधियों को इन शस्त्रों की निर्मिति , उनका उपयोग तथा उन्हें बनाने के लिए आवश्यक धातु की विस्तृत जानकारी दी । संग्राहक श्री. राकेश धावडे जी स्वयं छत्रपति शिवाजी महाराज के अंगरक्षकों के वंशजों की १३ वीं पीढी के वंशज हैं ।
सैकडों शस्त्रों की दुर्लभ प्रदर्शनी



छत्रपति शिवाजी महाराज जी के काल की शस्त्रपरंपरा के ये शस्त्र हैं तथा यह प्रदर्शनी अत्यंत अद्भुत है । भारत की ज्ञानपरंपरा एवं शस्त्रपरंपरा का इतिहास बहुत बडा है । भारत के वीरों का पराक्रम सभी को ज्ञात होना आवश्यक है । अब तक विद्यालय के पाठ्यक्रम में केवल मुगलों का ही इतिहास बताया जाता था । वास्तव में देखा जाए, तो मराठों की अनुमति के बिना मुगल लाल किले के बाहर नहीं निकल सकते थे । अंग्रेजों ने दिल्ली मुगलों से नहीं ली, अपितु मराठों से प्राप्त की थी । दिल्ली का सच्चा इतिहास गुलामी का इतिहास नहीं है, अपितु वह वीरता एवं पराक्रम का है, जिसे अब तक छिपाया गया ।








