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कोयला घोटाला: कोर्ट ने खारिज की सीबीआई की क्‍लोजर रिपोर्ट, मांगा मनमोहन का बयान

नई दिल्‍ली : कोयला घोटाले में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से पूछताछ होगी। दिल्‍ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने उनका बयान रिकॉर्ड करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने मंगलवार को कुमार मंगलम बिड़ला की हिंडाल्‍को को खदान आवंटन से जुड़े मामले में क्‍लोजर रिपोर्ट खारिज करते हुए आगे जांच करने के लिए कहा और तत्‍कालीन कोयला मंत्री का बयान दर्ज करने के भी आदेश दिए। उस समय कोयला मंत्रालय मनमोहन सिंह के जिम्‍मे था। यह मामला वर्ष २००५ का है। कोर्ट ने इस मामले में सीबीआई से 2७ जनवरी को आगे की जांच के संबंध में स्टेट्स रिपोर्ट मांगी है और इसी दिन मामले की अगली सुनवाई होगी।

किस मामले में सुनवाई
ओडिशा में २००५ में हिंडाल्को को तालाबीरा २ और ३ कोयला ब्लॉक आवंटन किए जाने से संबंधित मामले में उद्योगपति कुमार मंगलम बिड़ला, पूर्व कोयला सचिव पीसी पारेख और अन्य के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई थी। इसी मामले की सुनवाई करते हुए मंगलवार को कोर्ट ने तत्‍कालीन कोयला मंत्री का बयान मांगा।

क्या है कोयला घोटाला
१७ अगस्त, २०१२ को कोयला ब्लॉक आवंटन को लेकर कैग की रिपोर्ट संसद में पेश की गई। रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा गया कि कोल ब्लॉक आवंटन में बड़े पैमाने पर घोटाला हुआ है। कैग की रिपोर्ट के बाद ही यह मामला कोर्ट तक पहुंचा और अब जांच का घेरा पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तक पहुंच गया है। कैग की रिपोर्ट में इन बिंदुओं का जिक्र किया गया था।

– रिपोर्ट के मुताबिक, कोल ब्लॉक आवंटन में निजी कंपनियों को १ लाख ८६ हजार करोड़ का फायदा पहुंचाया गया था। यानी हजारों करोड़ रुपए का घाटा सरकार को हुआ। कैग का यह आकलन २०१०-११ के मूल्य पर आधारित है।

– रिपोर्ट में कहा गया कि आवंटन के लिए खुली बोली नहीं लगाई गई और इससे प्राइवेट कंपनियों को फायदा हुआ। क्यों उनका सीधा नामांकन किया गया?

– रिपोर्ट में निजी क्षेत्र की २५ कंपनियों के नाम का उल्लेख करते हुए कहा गया कि इन्हें सीधे नामांकन के जरिए कोल ब्लॉक आवंटित किए गए। जिन कंपनियों के रिपोर्ट में नाम हैं, उनमें इनमें एस्सार पावर, हिन्डाल्को इंडस्ट्रीज, टाटा स्टील, टाटा पावर और जिंदल स्टील एंड पावर शामिल हैं।

– रिपोर्ट के मुताबिक, यदि पूर्व प्रक्रिया को ही अपनाया गया होता तो यह घोटाला रोका जा सकता था।

– हैरानी की बात यह है कि कोल ब्लॉक आवंटन के लिए प्रतिस्पर्धी बोलियों की नीति साल २००४ में ही तय कर ली गई थी, लेकिन इस पर अमल के तौर-तरीके विकसित नहीं किए जा सके। कैग ने कहा कि यदि ये नीति अमल में लाई गई होती तो देश के खजाने को इतना घाटा नहीं उठाना पड़ता।

स्रोत : दैनिक भास्कर

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