
चैन्नर्इ – मद्रास उच्च न्यायालय में उनकी जमानत याचिका पर सुनवाई चल रही है । इस सुनवाई के समय न्यायमूर्ती एस. वैद्यनाथन ने कहा की, त्योहार के समय विशेष क्षेत्रों में कृत्रिम तालाब बनाकर उसमें प्रतिमाएं विसर्जित करने का काम किया जा सकता है।
प्रतिमा विसर्जन के नाम पर जल स्रोतों का प्रदूषण होने से रोकने का यह निश्चित ही एक उपयोगी उपाय है।
(हिंदूंआें, कृत्रित तालाब में मूर्ती विसर्जित करना यह धार्मिक परंपरा के विरुद्ध है । हिंदूआें के धार्मिक परंपराआें पर न्यायालय ऐसे वक्तव्य कैसे कर सकता है ? – हिन्दूजागृति)
न्यायालय ने आगे कहा की, विसर्जन के समय मिट्टी, बांस, घास, लकड़ी, धातु, जूट, रंग, रंगे हुए कपड़े, फूल, धूप-अगरबत्ती, कपूर और राख जैसी चीजें भी पानी में मिल जाती हैं। मूर्ति बनाने में जिन विषेलै अर्थात जहरीले रसायनों का उपयोग होता है वह विसर्जन के बाद पानी में मिल जाते हैं और जल स्रोतों के लिए गंभीर संकट निर्माण करते हैं । पानी की पहले से ही कमी है। ऐसे में उसे और प्रदूषित करना तार्किक और समझदारी नहीं है। पानी और जल स्रोतों के प्रति इस मूर्खतापूर्ण व्यवहार को समाप्त कर दिया जाना चाहिए।
पानी और जल स्रातों का प्रदूषण वर्ष में एक बार किए मूर्ती विसर्जन से नहीं अपितु कारखानों द्वारा प्रतिदिन बहाए जा रहे लाखो लिटर रासायनिक पानी से होता है । इसे बंद करने के प्रयास होने चाहिए ना की धार्मिक परंपराआें को । अब हिंदूंआें को यह बात प्रमाणों सहित न्यायालय को बतानी चाहिए । – सम्पादक, हिन्दूजागृति








