
झुंझुनूं (राजस्थान) – शिक्षा क्षेत्र को नौकरी का नहीं, तो सेवा का क्षेत्र समझना चाहिए । शिक्षणसंस्था और अध्यापक दोनोंको इसी दृष्टीसे कार्य करना चाहिए । इस सेवावृत्तीसे ही अध्यापकों की ज्ञानशक्ती एवं गरिमा बढेगी, जिसका लाभ विद्यार्थीआें को होगा । प्राचीन काल में कभीभी शिक्षाक्षेत्र राजसत्ता के नियंत्रण में नहीं था । मॅकोले के कारण हमारी गुरुकूल परंपरा को तोड कर शिक्षा क्षेत्र राजसत्ता के हात में चला गया । इस गुरुकूल परंपरा का इतना महत्त्व हैं की, भविष्य में विदेश में भी इसका प्रारंभ हो, तो उसमें आश्चर्य नहीं हैं, ऐसा प्रतिपादन बीकानेर के संवित् श्री सोमगिरिजी महाराजने यहांपर किया । वे श्री चावो दादी विद्या कुंज की औरसे आयोजित गीता शिक्षा विषयक संगोष्टी को संबोधित कर रहे थे । इस समय मंचपर श्री चावो दादी मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष श्री. काशीनाथजी खेतान एवं झुंझुनूं अॅकॅडमी के अध्यक्ष श्री. दिलीपजी मोदी उपस्थित थे । इस कार्यक्रम का संचालन श्री चावो दादी विद्या कुंज की प्रधानाचार्य श्रीमती चेतना शर्मा ने किया । श्री चावो दादी विद्या कुंज के संचालक श्री. उमेश खेतान इनके प्रयत्नोंसे आयोजित इस कार्यक्रम में नगर के प्रबुद्धजन, ३० अध्यापक एवं विद्यार्थी उपस्थित थे ।
संवित् स्वामी सोमगिरिजी महाराज के प्रखर उद्गार
- महाभारत घर में रखी तो विवाद होता हैं, ऐसा कुप्रचार कर हिन्दूआेंसे उसे दूर रखा गया । इसके कारण गीता भी दूर हो गयी । गीता ये ग्रंथ नहीं अपितु हमारी माता हैं । इसलिए गीता को समझे और उसे जीवन में लाए ।
- सनातन संस्कृति को भूलने के कारण आज लडका और लडकी इनमें भेद किया जाता हैं । वस्तुतः आत्मा एकही हैं, यह अपनी संस्कृति सिखाती हैं ।
- देव, धर्मग्रंथ, संत इनको समझे बिना इनका पूजन करनेकी प्रथा, यह एक मिथ्याचार हैं ।
- गीता का शैक्षणिक स्वरूप में नहीं, तो श्रद्धापूर्वक अभ्यास करें, तो उसका लाभ होगा ।
- सनातन धर्म में जन्म से लेकर अंत्येष्टी तक की व्यवस्था उसका अहंभाव मिटाने के लिए की गई हैं ।









