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अफगानिस्तान में बढ रही तालिबानी हिंसा और भारत के लिए बढता खतरा

काबुल : काबुल में आतंकी हमले लगातार बढ रहे हैं। गत वर्ष नाटो सेनाओं के अफगानिस्तान छोडऩे से पहले तक लड़ाई देश के बाहरी इलाकों तक ही सीमित थी लेकिन अब यह देश की राजधानी काबुल तक पहुंच चुकी है।

रमजान का महीना शुरू होने के बाद से काबुल में हुए दूसरे बड़े हमले में ३० जून को १७ लोग जख्मी हुए। इस हमले में अफगानिस्तान में बची-खुची नाटो सेनाओं, सैन्य वाहनों तथा आम लोगों को क्षति पहुंचाने वाला धमाका अमेरिकी दूतावास तथा देश के सर्वोच्च न्यायालय के निकट स्थित एक व्यस्त शॉपिंग एरिया में हुआ।

गत सप्ताह आतंकवादियों ने  संसद पर उस समय हमला किया था जब कानून निर्माता नए रक्षा मंत्री पर वोट करने जा रहे थे। तालिबान ने रमजान के दौरान युद्धविराम के आग्रह को भी ठुकरा दिया था जबकि इस महीने में तो किसी को गाली देना भी इस्लाम विरोधी कार्य माना जाता है।

ऐसे में इस पर भी किसी को आश्चर्य नहीं हुआ कि करीब एक महीने पहले तक अफगानी सरकार तथा तालिबान के बीच कतर में शांति के प्रयासों के अंतर्गत हुई वार्ता के बावजूद उन्होंने आतंकी हमले करने जारी रखे हैं।

अफगानी सेना के एक कर्नल ए.एच. मदजई का कहना है, ‘‘यदि तालिबानी केवल ए.के.४७ से गोलियां बरसा रहे होते तो हम इतने चिंतित नहीं होते लेकिन हमें पता है कि अब उनके पास एम-१६ हैं।’’

एक अफगानी अधिकारी स्वीकार करता है कि इस बात के सबूत मिले हैं कि रात के समय तालिबानियों द्वारा प्रशिक्षित गधों को खुला छोड़ दिया जाता है जो खुद नाकों की ओर चले जाते हैं। वहां तैनात पुलिस वाले उन पर अपने हथियार लाद कर वापस तालिबानियों के पास भेज देते हैं। तालिबानी उन हथियारों से अपराध करने के बाद सुबह उन्हें इसी तरीके से नाकों पर पुलिस वालों को लौटा देते हैं।

हो सकता है कि ऐसी कुछ कहानियां सच्ची न भी हों लेकिन फिर भी यह तथ्य बरकरार है कि उत्तम गुणवत्ता वाले हथियारों का बड़ा जखीरा तालिबान के हाथों में पहुंच चुका है। अमेरिकी सेना की लापरवाही अब कई अफगानियों और भारतीयों की जान लेने का सबब बन सकती है क्योंकि काबुल पर कब्जा करने के बाद तालिबान की योजना कश्मीर में भारतीय सीमा की ओर बढऩे या फिर इस इलाके में पाक प्रशिक्षित आतंकियों को ये हथियार सौंप देने की है।

स्रोत :पंजाब केशरी

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