महाराष्ट्र मंदिर महासंघ के निरंतर प्रयासों को मिली सफलता !
अपर जिलाधिकारी, अमरावती के न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय !

अमरावती – चांदूरबाजार तालुका के फुबगांव स्थित ‘श्री भगवानपुरी संस्थान, कुरळपूर्णा’ नामक पंजीकृत (रजिस्टर्ड) ‘सार्वजनिक धार्मिक ट्रस्ट’ की स्वामित्ववाली कृषि भूमि को हडपने के षड्यंत्र को महाराष्ट्र मंदिर महासंघ के सजग एवं कानूनी प्रयासों के कारण विफल कर दिया गया है । अमरावती के अपर जिलाधिकारी ने इस मामले में संस्थान के पक्ष में निर्णय सुनाते हुए अवैध म्यूटेशन (फेरफार) प्रविष्टियों को निरस्त कर दिया है और राजस्व विभाग ने 7/12 खतौनी (उतारा) पर पुनः संस्थान का नाम आधिकारिक रूप से प्रविष्ट कर दिया है ।
१. यह कृषि भूमि पंजीकृत संस्थान के स्वामित्व की है । वर्ष २०२३ में ५० वर्ष पुराने और निरस्त किए जा चुके एक आदेश का अनुचित लाभ उठाकर राजस्व अधिकारियों को भ्रमित किया गया था । उसी के आधार पर म्यूटेशन रिकॉर्ड से संस्थान का नाम हटाकर स्वर्गीय गुलाबराव हंबीरजी चर्जन के नाम पर मालिकाना हक प्रविष्ट कर दिया गया था । इसके विरुद्ध संस्थान द्वारा उपविभागीय अधिकारी, अचलपुर के समक्ष प्रविष्ट की गई अपील निरस्त हो जाने से जमीन हडपने का रास्ता साफ हो गया था ।
२. इस अन्याय के विरुद्ध संस्थान के ट्रस्टियों ने महाराष्ट्र मंदिर महासंघ से संपर्क किया । महासंघ के राज्य पदाधिकारी श्री. अनूप जायसवाल ने जब इस मामले के मूल कागदपत्रों का गहन अध्ययन किया, तो एक चौंकानेवाली सच्चाई सामने आई ।
३. ३१ जनवरी १९६६ के जिस आदेश का आधार बनाकर क्रय प्रमाण पत्र (खरीद प्रमाणपत्र) दिखाया गया था, उस आदेश को तत्कालीन उपविभागीय अधिकारी ने ३१ अक्टूबर १९६८ को ही निरस्त कर दिया था । १८ फरवरी १९७० को पुनः जांच के उपरांत अतिरिक्त तहसीलदार सह कृषि भूमि अधिकरण (ट्रिब्यूनल) ने निर्णय सुनाया था कि यह भूमि पंजीकृत धार्मिक संस्थान की है और इससे होनेवाली आय का उपयोग देवस्थान के कार्यों के लिए ही किया जाता है ।
४. किरायेदारी कानून (कुळ कायदा) के नियमों के अनुसार ऐसे धार्मिक संस्थान की जमीनों को काश्तकार (कुळ) को जबरन हस्तांतरित नहीं किया जा सकता । वर्ष १९७० का यह आदेश अंतिम होने के उपरांत भी, निरस्त किए जा चुके दस्तावेजों के आधार पर अवैध म्यूटेशन प्रविष्टियां स्वीकृत करा ली गई थीं ।
५. इन दृढ कानूनी प्रमाणों को सामने रखते हुए महासंघ के सहयोग से अपर जिलाधिकारी के न्यायालय में अपील प्रविष्ट की गई । मामले के वास्तविक तथ्यों और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायिक निर्णयों को ध्यान में रखते हुए अपर जिलाधिकारी गोविंदा दाणेज ने संस्थान के पक्ष में निर्णय सुनाया । उन्होंने उपविभागीय अधिकारी के आदेश और अवैध म्यूटेशन प्रविष्टियों को निरस्त करने का निर्देश दिया ।
६. इस आदेश के अनुसार राजस्व विभाग ने २३ जुलाई २०२६ को नई म्यूटेशन प्रविष्टि मंजूर करके 7/12 खतौनी (उतारा) पर ‘श्री भगवानपुरी संस्थान’ का नाम आधिकारिक रूप से बहाल कर दिया है ।
७. इस कानूनी लडाई में संस्थान की ओर से अध्यक्ष श्री. गजानन चिठोरे और सचिव श्री. अमोल वासनकर ने पक्ष रखा । महाराष्ट्र मंदिर महासंघ की दृढ पैरवी के कारण मंदिर की हडपी गई करोडों रुपये की जमीन सुरक्षित हो गई है और हर तरफ इस कार्रवाई का स्वागत हो रहा है ।








