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कोंकण के हापुस आम के संकट पर महाराष्ट्र सरकार तत्काल श्वेतपत्र जारी करे – सुराज्य अभियान

  • सूचना के अधिकार (RTI) से प्राप्त जानकारी के आधार पर हिंदू जनजागृति समिति के ‘सुराज्य अभियान’ का गंभीर आरोप

  • कोंकण का हापुस आम संकट में, जबकि सरकारी तंत्र का कामकाज संदिग्ध !

  • संबंधित विभागों की उच्चस्तरीय जांच की मांग

(बाएं से) श्री. राजेंद्र पाटील, सद्गुरु सत्यवान कदम, संबोधित करते हुए डॉ. रविकांत नारकर, श्री. भास्कर खाडिलकर, श्रीकृष्ण दुधवडकर तथा रवींद्र कारेकर।

देवगढ – कोंकण के हापुस आम उत्पादकों को प्रतिवर्ष विभिन्न कारणों से होने वाली हानि के लिए मुआवजे की घोषणा की जाती है; लेकिन केवल मुआवजा देना इस समस्या का समाधान नहीं है। इन संकटों का स्थायी समाधान विकसित किया जाना चाहिए। किसानों को नुकसान न हो, इसके लिए वैज्ञानिक, कानूनी रूप से मान्य तथा निर्यात-योग्य उपाय विकसित करना अनुसंधान संस्थानों, कृषि विश्वविद्यालयों और सरकारी तंत्र का मूल दायित्व है; किंतु इस दिशा में गंभीर कमियां रही हैं। परिणामस्वरूप, कोंकण का हापुस आम संकट में है और सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली संदेह के घेरे में है।

यह अत्यंत गंभीर विषय है। इसकी स्वतंत्र जांच कर दोषियों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई की जाए तथा कोंकण के हापुस आम संकट पर महाराष्ट्र सरकार तत्काल श्वेतपत्र प्रकाशित करे, ऐसी मांग हिंदू जनजागृति समिति के ‘सुराज्य अभियान’ के जिला समन्वयक डॉ. रविकांत नारकर ने यहां आयोजित पत्रकार परिषद में सूचना के अधिकार से प्राप्त आधिकारिक दस्तावेजों के आधार पर की।

यह पत्रकार परिषद ‘सुराज्य अभियान’ के अंतर्गत शहर के पवनचक्की स्थित होटल वेदा में आयोजित की गई थी।

इस अवसर पर सनातन संस्था के धर्मप्रचारक सद्गुरु सत्यवान कदम, हिंदू जनजागृति समिति के श्री. राजेंद्र पाटील, ‘सुराज्य अभियान’ के श्री. भास्कर खाडिलकर, तोरसोळे के आम उत्पादक श्री. रवींद्र कारेकर तथा वाडातर के श्री. श्रीकृष्ण दुधवडकर उपस्थित थे।

डॉ. नारकर ने सूचना के अधिकार से प्राप्त दस्तावेज, डॉ. बाळासाहेब सावंत कोंकण कृषि विश्वविद्यालय की दैनंदिनी-2026, सरकार द्वारा नियुक्त मैंगो टास्क फोर्स की रिपोर्ट, कृषि विभाग के पत्र, केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड एवं पंजीकरण समिति, यूरोपीय संघ की RASFF (Rapid Alert System for Food and Feed) प्रणाली तथा राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय शोधों का हवाला देते हुए कई गंभीर तथ्य सामने रखे।

डॉ. रविकांत नारकर द्वारा उठाए गए प्रमुख मुद्दे

1. केंद्र सरकार द्वारा 3 अक्टूबर 2023 से कीटनाशक (प्रतिबंध) आदेश, 2023 लागू किए जाने के बावजूद, प्रतिबंधित अथवा संबंधित कीट के लिए अधिकृत “लेबल क्लेम” (उत्पाद पर अंकित कानूनी जानकारी) न रखने वाले कुछ कीटनाशकों की अनुशंसा डॉ. बाळासाहेब सावंत कोंकण कृषि विश्वविद्यालय की दैनंदिनी-2026 तथा सरकार की मैंगो टास्क फोर्स रिपोर्ट में की गई है। यह अत्यंत गंभीर विषय है और इसकी स्वतंत्र जांच कर दोषियों पर कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए।

2. सूचना के अधिकार से प्राप्त मैंगो टास्क फोर्स की रिपोर्ट के अनुसार फ्लक्सामेटामाइड, फ्लोनिकामिड, फिप्रोनिल, आयसोसायक्लोसेराम, सायन्ट्रेनिलीप्रोल तथा ब्रोफ्लैनिलाइड इन छह कीटनाशकों के उपयोग की अनुशंसा की गई है; जबकि उसी रिपोर्ट में स्पष्ट उल्लेख है कि आम के फूलों पर लगने वाले थ्रिप्स (फूलकिड) के नियंत्रण हेतु इन दवाओं का अधिकृत लेबल क्लेम उपलब्ध नहीं है। साथ ही किसानों को इन्हें अपने जोखिम पर उपयोग करने की सलाह दी गई है। सरकारी समिति स्वयं अनुशंसा करती है और जिम्मेदारी किसानों पर डालती है, यह अत्यंत गंभीर मामला है।

3. सूचना के अधिकार के अंतर्गत APEDA (Agricultural and Processed Food Products Export Development Authority) से प्राप्त जानकारी के अनुसार, क्लोरपायरीफॉस के अवशेष मिलने के कारण यूरोपीय संघ द्वारा अस्वीकृत भारतीय आमों के कुछ मामलों में “Source of Produce – Maharashtra” स्पष्ट रूप से दर्ज है। इससे महाराष्ट्र की गलत अथवा अपूर्ण वैज्ञानिक अनुशंसाओं के कारण कोंकण हापुस की वैश्विक प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचने की आशंका है।

4. क्लोरपायरीफॉस जैसे ऑर्गेनोफॉस्फेट कीटनाशकों के लंबे समय तक संपर्क का संबंध पार्किन्सन रोग सहित विभिन्न तंत्रिका संबंधी बीमारियों से हो सकता है। UCLA Health, Science Daily तथा अन्य शोधों में इसका उल्लेख किया गया है। इसलिए कृषि नीति बनाते समय किसानों, खेत मजदूरों तथा उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए।

5. देवगढ़ तालुका स्थित रामेश्वर आम अनुसंधान केंद्र में वैज्ञानिक एवं तकनीकी पद कई वर्षों से रिक्त हैं। निर्यात के लिए महत्वपूर्ण फल मक्खी नियंत्रण जैसे विषयों पर अनुसंधान में भी गंभीर कमियां हैं।

6. कृषि विभाग ने सूचना के अधिकार के अंतर्गत स्पष्ट किया है कि वर्ष 2019 से आम में कीट एवं रोगों से हुई क्षति का समेकित आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध ही नहीं है। जब आवश्यक आंकड़े ही उपलब्ध नहीं हैं, तो अनुसंधान और तकनीकी अनुशंसाएं किस आधार पर की गईं?

इस अवसर पर आम उत्पादक श्री. रवींद्र कारेकर एवं श्री. श्रीकृष्ण दुधवडकर ने कहा कि “आम अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिकों को किसानों के साथ समन्वय बनाकर कार्य करना चाहिए; लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। इसलिए अब आम उत्पादक किसानों को स्वयं अधिक सतर्क रहने की आवश्यकता है।”

सुराज्य अभियान की प्रमुख मांगें

  • पिछले 10 वर्षों के अनुसंधान, सार्वजनिक धन के उपयोग तथा तकनीकी अनुशंसाओं की स्वतंत्र जांच कराई जाए।
  • मैंगो टास्क फोर्स की सभी अनुशंसाएं तथा उनके वैज्ञानिक आधार सार्वजनिक किए जाएं।
  • अनुसंधान केंद्रों में रिक्त वैज्ञानिक एवं तकनीकी पदों को तत्काल भरा जाए।
  • केवल वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित, कानूनी रूप से मान्य तथा निर्यात-योग्य कीटनाशकों पर आधारित राज्य की नई कीट प्रबंधन नीति घोषित की जाए।

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