
हिंदू जनजागृती समिति ने ‘कॉर्पोरेट जिहाद’ मामले की आरोपी निदा खान को जमानत देते समय की गई कथित तुलना पर कड़ा विरोध दर्ज कराया है। समिति का कहना है कि यह नाशिक पुलिस को अप्रत्यक्ष रूप से ‘कंस’ के रूप में चित्रित करने जैसा है, जो अत्यंत वेदनादायी है।
हिंदू जनजागृती समिति के राष्ट्रीय प्रवक्ता श्री. रमेश शिंदे ने स्पष्ट किया कि हमारा न्यायव्यवस्था पर पूर्ण विश्वास है, परंतु कॉर्पोरेट जिहाद मामले की आरोपी निदा खान के गर्भधारण की तुलना भगवान श्रीकृष्ण के जन्म से करना अत्यंत वेदनादायी है, जिससे करोड़ों हिंदुओं की धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं। समिति ने रेखांकित किया कि हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, देवकी के आठवें पुत्र द्वारा अपने वध की भविष्यवाणी के भय से कंस ने निष्पाप देवकी और वसुदेव को कारागार में डाल दिया था। अतः इस मामले की तुलना भगवान श्रीकृष्ण के जन्म से करने पर नाशिक पुलिस की तुलना ‘कंस’ से होने का आभास होता है। ऐसी धार्मिक उपमाएं न केवल जांच यंत्रणा का मनोबल गिराती हैं, बल्कि जनभावनाओं को भी ठेस पहुंचाती हैं।
आरोपी निदा खान पर नाशिक स्थित टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेस (TCS) की महिला कर्मचारियों के यौन शोषण, मानसिक प्रताड़ना और सख्ती से धर्मांतरण कराने के गंभीर आरोप हैं। वह लगभग 40 दिनों तक फरार थी और जांच में सहयोग नहीं कर रही थी।
समिति ने आरोपी को दी जा रही विशेष रियायत पर प्रश्नचिह्न लगाते हुए एनसीआरबी (NCRB) की 2024 की ‘प्रिझन स्टैटिस्टिक्स’ रिपोर्ट के आंकड़े प्रस्तुत किए हैं। भारत के कुल कारागृही कैदियों में लगभग 4.1 प्रतिशत महिला कैदी हैं। देशभर में 1,537 महिला कैदियों के साथ 1,764 बच्चे कारागृह में रह रहे हैं। इसके अतिरिक्त, पश्चिम बंगाल राज्य की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, 4 वर्षों में 62 महिला कैदियों ने न्यायालयीन कोठडी में रहते हुए बालकों को जन्म दिया है। इन आंकड़ों का हवाला देते हुए समिति ने पूछा है कि फिर इस कॉर्पोरेट जिहाद मामले में आरोपी को अलग और विशेष व्यवहार क्यों दिया जा रहा है? कानून के सामने सभी समान होने चाहिए।
समिति ने महाराष्ट्र शासन से मांग की है कि इस जमानत आदेश का कानूनी अभ्यास कर उसे उच्च न्यायालय में चुनौती दी जाए। साथ ही यह भी अपील की है कि न्यायालयीन टिप्पणियों में ऐसी धार्मिक तुलनाएं टाली जानी चाहिए, जिनसे अनावश्यक वाद निर्माण होता है।








