धर्मांतरण-विरोधी कानून के तहत कार्रवाई न होना, राज्य के लिए बड़ी हानि! – अधिवक्ता वीरेंद्र इचलकरंजीकर
पुलिस द्वारा आरोपियों के खिलाफ दर्ज मामलों में ‘धर्मांतरण का प्रयास’ शब्द जानबूझकर हटाना गंभीर बात !

मुंबई – नाशिक स्थित ‘टी.सी.एस.’ में ‘लव जिहाद’ के मामले में दर्ज किए गए अपराध से ‘धर्मांतरण का प्रयास’ शब्द जानबूझकर हटाया गया प्रतीत होता है। इस अपराध का स्वरूप केवल छेड़छाड़ तक सीमित नहीं है, अपितु इसके पीछे धर्मांतरण की एक बड़ी साजिश (पैटर्न) दिखाई देती है। हाल ही में महाराष्ट्र के बजट सत्र में लालच, धोखाधड़ी, बलपूर्वक आदि तरीकों से होने वाले धर्मांतरण को रोकने के लिए ‘धर्मस्वातंत्र्य विधेयक’ पारित किया गया है।
विधानमंडल में विधेयक पारित होने के बावजूद यदि राजपत्रित अधिसूचना जारी न होने के कारण इस मामले में धर्मांतरण से संबंधित अपराध दर्ज नहीं किया जा रहा है, तो यह राज्य के लिए बड़ी हानि है। ऐसा कहते हुए हिंदू विधिज्ञ परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष अधिवक्ता वीरेंद्र इचलकरंजीकर ने ‘टी.सी.एस.’ मामले में धर्मस्वातंत्र्य कानून के तहत कार्रवाई करने की अपील की है।
इस मामले में अब तक 9 अपराध दर्ज किए जा चुके हैं, फिर भी पुलिस ने धर्मस्वातंत्र्य कानून का उपयोग क्यों नहीं किया, ऐसा प्रश्न भी अधिवक्ता वीरेंद्र इचलकरंजीकर ने उठाया है।

क्या कानून की जानबूझकर अनदेखी की जा रही है?
धर्मस्वातंत्र्य विधेयक के प्रावधानों के अनुसार, यदि आरोपी बार-बार वही अपराध करता है, तो उसके लिए कड़ी सजा का प्रावधान है। इन मामलों में कुछ आरोपी बार-बार वही अपराध करने वाले हैं। यदि इस मामले में धर्मस्वातंत्र्य कानून के अनुसार कार्रवाई की जाती, तो जिस संस्था में ये घटनाएं हुईं, उस पर भी कार्रवाई हो सकती थी। संस्था को बचाने के लिए क्या इस कानून की जानबूझकर अनदेखी की जा रही है? ऐसा संदेह भी अधिवक्ता वीरेंद्र इचलकरंजीकर ने व्यक्त किया।








